जस्टिस काटजू के सामने लखनऊ के पत्रकारों ने खोली एक दूसरे की दलाली की पोल

: आपस में ही भिड़ गए हिसाम और अनिल : शर्मसार हुई पत्रकारिता : प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मारकंडेय काटजू के सामने लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकारों ने जो शर्मनाक हरकत की उससे पूरे प्रदेश में पत्रकारों की खासी फजीहत हो रही है। एनेक्सी के मीडिया सेंटर में काटजू के सामने ही पत्रकारों ने न सिर्फ अभद्र भाषा का प्रयोग किया बल्कि मारपीट तक उतारू हो गए। राज्य मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के अध्यक्ष हिसामुल सिद्दीकी की जितनी फजीहत सार्वजनिक रूप से हुई उतनी शायद उनके पत्रकारिता के जीवन में कभी नहीं हुई होगी। काटजू सहित प्रेस काउंसिल के बाकी सदस्यों ने कहा कि इस आचरण की वह कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

काटजू की प्रेस कांफ्रेंस में कक्ष खचा-खच भरा हुआ था। होना तो यह चहिए था कि काटजू से प्रेस काउंसिल से सम्बन्धित सवाल ही पूछे जाने चाहिए थे। मगर कुछ ऐसे पत्रकार जो पत्रकारिता में कम और बाकी धंधों में ज्यादा लिप्त रहते हैं, उन्होंने काटजू से उनके सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से सम्बन्धित सवाल पूछना शुरू कर दिए, जिससे बाकी पत्रकारों में नाराजगी भी हुई और लोगों ने कहा भी कि प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष से पत्रकारिता और पत्रकारों से संबंधित सवाल ही पूछे जाने चाहिए। काटजू की इस संबंध में कुछ पत्रकारों से तीखी बहस भी हुई। काटजू अपने साथ सूचना निदेशक बादल चटर्जी को भी लेकर आए थे।

मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के अध्यक्ष हिसामुल सिद्दीकी ने जब मायावती और उनके अफसरों पर कुछ तीखे सवाल किये और सूचना निदेशक बादल चटर्जी को भी इसमें लपेटा तो बादल चटर्जी भी आपा खो बैठे और उन्होंने काटजू के बराबर में डायस पर बैठे-बैठे हिसामुल सिद्दीकी से कहा कि मेरा मुंह मत खुलवाइये वरना स्थिति खराब हो जायेगी। इतना सुनते ही हिसामुल सिद्दीकी के चेहरे की हवाइयां उड़ गई। इस पर कुछ पत्रकारों ने चटर्जी से कहा कि पत्रकारों को ब्लैकमेल मत करिए और जो कहना है खुलेआम कहिए। इस पर बादल चटर्जी ने हिसामुल सिद्दीकी से कहा कि आप लखनऊ, दिल्ली और मुम्बई तीन जगह से अखबार निकालते हैं और तीनों जगहों पर खबरें एक जैसी होती हैं और तीनों अखबारों के लिए विज्ञापन अलग-अलग लेते हैं, तो यह धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?

चटर्जी के इतना कहते ही हिसामुल की हवाइयां उड़ गयीं और वह कहने लगे कि वह तो मायावती के शीर्ष अफसरों के लिए कह रहे थे। चटर्जी ने गलत तरीके से यह बात अपने उपर समझ ली। इसके बाद पत्रकारों ने सार्वजनिक रूप से कहा कि सूचना विभाग मात्र पत्रकारों का उत्पीडऩ कर रहा है। पहली बार पत्रकारों के मान्यता कार्ड सिर्फ छह महीनों के लिए नवीनीकरण किए गए। विज्ञापन मनमर्जी तरीके से कुछ चुंनिदा अखबारों को दिए जाते हैं। बड़ी प्रेस कांफ्रेंस आदि में सभी अखबार के प्रतिनिधियों को नहीं बुलाया जाता। इस पर काटजू ने बादल चटर्जी को निर्देश दिए कि तत्काल पत्रकारों की मान्यता समिति और विज्ञापन समिति बनाई जाय, जिसमें अध्यक्ष किसी पत्रकार को बनाया जाए और सचिव किसी नौकरशाह को और इसमें भी अधिकतर संख्या पत्रकारों की ही होनी चाहिए।

इस सुझाव के बाद पत्रकार अनिल त्रिपाठी ने कहा कि इससे पहले इस तरह की समिति में ऐसे लोग नामित कर दिए गए थे, जिनका पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं था और वह शराब की पेटी और दस हजार रुपये लेकर मान्यता दे दिया करते थे। बड़ी संख्या में पत्रकारों ने इस बात का समर्थन किया कि पत्रकारों में भी इस तरह के दलाल लोग आ गए हैं, जो पत्रकारिता के नाम पर बाकी सब तो करते हैं मगर पत्रकारिता नहीं करते। इस पर हिसामुल सिद्दीकी ने कहा कि लगता है बादल चटर्जी श्री त्रिपाठी को समझाकर लाए हैं। इस पर अनिल त्रिपाठी और प्रभात आग बबूला हो गए। उन्होंने सार्वजनिक रूप से हिसामुल सिद्दीकी पर दलाली करने और गुंडा गर्दी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि हिसाम का पिछला सारा इतिहास चेक कर लिया जाए तो पता चल जायेगा कि कौन दिल्ली की दलाली करता है। उन्होंने यह भी कहा कि उन पत्रकारों का भी आचरण देखा जाए जो खुद तो सरकारी मकान में रहते हैं और सरकार को झूठा शपथ पत्र दिया है कि उनके पास कोई मकान नहीं है और अपना मकान किराए पर उठाकर खुद सरकारी मकान का फायदा उठाते हैं।

इस बात पर इतना हंगामा मच गया कि लगा कि अब इस कक्ष में मारपीट ही हो जाएगी। यह हंगामा लगभग दस मिनट तक चलता रहा और काटजू तथा उनकी टीम हतप्रभ होकर यह देखती रही कि क्या यही राज्य स्तर के मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं, जिनका आचरण सड़क के छुटभइये गुंडों जैसा लग रहा है। बाद में कई वरिष्ठों के समझाने पर मामला जैसे-तैसे शान्त हुआ। वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार ने काटजू से क्षमा मांगते हुए कहा कि हम तो यह सुनने आये थे कि आपने दो दिन में लखनऊ में पत्रकारों के हित में क्या किया, मगर यहां तो हम लोग आपस में ही उलझ गए। उन्होंने कहा कि वह चालीस वर्ष से पत्रकारिता कर रहे हैं मगर इतना शर्मनाक वाक्या अभी तक उनके सामने नहीं आया। इस घटनाक्रम से पत्रकारों की राजनीति का छिछोरापन सबके सामने आ गया है, जो पत्रकार वास्तव में पत्रकारिता करते हैं उनका कहना है कि या तो मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ही खत्म कर दी जाय वरना इसमें ऐसे ही लोग चुने जाएं, जिनका सार्वजनिक जीवन में कोई दागदार रिकार्ड न हो। इस बीच पत्रकारों ने यह भी कहा कि मौजूदा समिति का कार्यकाल खत्म हो गया है, इसलिए तत्काल इसका भी चुनाव करवाया जाना चाहिए।

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