जागरण, गोरखपुर में एक दशक से प्रमोशन का इंतजार कर रहे हैं कुछ पत्रकार

कल यानी 13 मार्च को दैनिक जागरण में ट्रेनी रिपोर्टरों, ट्रेनी सब एडिटर एवं रिपोर्टर व सब एडिटर पोस्‍ट पर कार्यरत कर्मियों की प्रमोशन के लिए ऑनलाइन परीक्षा ली गई. जागरण की यह पहल तो अच्‍छी है फिर भी तमाम यूनिटों से परीक्षा देने वालों के चयन को लेकर नाराजगी और कुंठा की बात सामने आ रही है. प्रमोशन के लिए परीक्षा लेना तो अच्‍छी बात है पर खबर है कि ये परीक्षा वही लोग दे पाए, जो तमाम यूनिटों में प्रबंधन के खास रहे, जिन पत्रकारों की प्रबंधन में पैठ नहीं रही वे परीक्षा नहीं दे पाए. 

दैनिक जागरण के गोरखपुर यूनिट में भी असंतोष की बात सामने आ रही है. यहां के जिला एवं तहसीलों में तैनात पत्रकारों के साथ प्रबंधन का नजरिया काफी भेदभाव वाला बताया जा रहा है. इन्‍हीं लोगों के साथ के जो पत्रकार यू‍निट यानी हेड ऑफिसों में काम कर रहे हैं उनके प्रमोशन तो हो रहे हैं, पर इन लोगों का नहीं हो रहा है. अब तो यहां के पत्रकार अपनी भाषा में एक दूसरे को चिढ़ाने भी लगे हैं कि ''तेल लगाओ प्रमोशन पाओ.''

बताया जा रहा है गोरखपुर में तैनात दो पत्रकारों को अभी हाल ही में प्रमोशन मिला है. ये परीक्षा के माध्‍यम से एक बार फिर लाइन में आ गए हैं. वहीं इन दोनों के पहले से काम कर रहे बस्‍ती जिले में नीरज श्रीवास्‍तव, देवरिया में विवेकानंद शुक्‍ल, प्रभात पाठक, सहजनवा में विजय पाण्‍डेय, बडहलगंज में गोपाल त्रिपाठी, पडरौना में राघवेंद्र मल्‍ल, डुमरियागंज में पप्‍पू रिजवी, मुहम्‍मद रिजवी, बरहज में विवेकानंद, चौरीचौरा में चंद्रभूषण ओझा, निचलौल में विजय सिंह, सोनौली में आरपी सिंह आदि कई ऐसे पत्रकार हैं, जो पूरी निष्‍ठा और लगन के साथ संस्‍थान में लम्‍बे समय से काम कर रहे हैं, लेकिन प्रबंधन इनके प्रमोशन के बारे में नहीं सोच रहा है.

बताया जा रहा है कि जागरण में बहुत से ऐसे पत्रकार हैं जो दस से पंद्रह सालों से एक ही पद पर सड़ रहे हैं, इनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है. जब केके शुक्‍ला संपादकीय प्रभारी बने तो पत्रकारों में उम्‍मीद जगी थी कि अब उनके साथ न्‍याय होगा, उनका प्रमोशन हो जाएगा. पर सभी की उम्‍मीदों पर पानी फिर गया. उन्‍होंने केवल दो से तीन लोगों को प्रमोट किया. अब परीक्षा के माध्‍यम से वे फिर से प्रमोशन की लाइन में लग गए हैं. नए संपादक उमेश शुक्‍ला से भी उन्‍होंने उम्‍मीद बांधी थी, परन्‍तु यहां भी उन्‍हें निराशा ही हाथ लगी. इन लोगों को इस परीक्षा में बैठने का मौका नहीं दिया गया. काम करने वाले पत्रकार कुंठित हैं.

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