‘जातिपॉश’ में फंस गयी सपा सरकार, मुलायम कुनबे तक पहुंची आरक्षण की तपिश

उ0प्र0 में हाईकोर्ट ने जाति आधारित रैलियों व सम्मेलनों पर तो रोक लगा दी है। लेकिन इसी प्रदेश में अब ‘जातिवाद’ का एक बहुत घिनौना स्वरूप प्रकट हो रहा है। आरक्षण के नाम पर ऐसी गंदी राजनीति राजनीतिक पार्टियां कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में सभी जातियों को आपस में लड़ाया जा रहा है राजनीति करने के लिये। यह बहुत खतरनाक प्रवृत्ति जन्म ले रही है। समाज की अत्यंत पिछड़ी जातियों को आगे बढ़ाने के लिये सरकारी सेवाओं में व्यवस्था की गयी पर यह ‘आरक्षण व्यवस्था’ राजनीति का औजार बन गयी है। अधिक से अधिक सुविधा बटोरने के लिए जातियां लामबंद हो रही हैं। पॉलिटिक्स करने वाले उसका लाभ उठा रहे हैं। यह ‘वाद’ टूटने की बजाय और मजबूत हो रहा है।

जातियां ‘गैंग’ के रूप में ‘वार’ कर रही हैं। वोट बटोरने के लिए जातियां मुख्य आधार बन गयी हैं। यूपी में ‘वाद’ के तिलस्म के आगे साम्यवाद की वर्गीय राजनीति औंधे मुॅह गिर गयी लगती है। वर्गों में समायीं भिन्न-भिन्न जातियां अब आपस में वर्चस्व की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं। सपा सरकार के आरक्षण के नये फार्मूले से जो तूफान उठा है, उसमें पिछड़े वर्ग में ही अलग-अलग जातियों की भयंकर नाराजगी गौरतलब है, जिसे देख समाजवादी नेता मुलायम सिंह का पूरा कुनबा सहमा हुआ है। स्थिति यहां तक आ गयी कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को आरक्षण के नये फार्मूलेे से पीछे हटना पड़ा। उन पर ‘यादववाद’ का आरोप लगा, अन्य पिछड़ी जातियां खुलेआम पक्षपात के खिलाफ बगावती तेवर अख्तियार कर रही हैं।

सवर्ण प्रतियोगी छात्र इसे अपनी जीत मानकर कितना ही जश्न मनाएं, लेकिन हकीकत यह नहीं है। लोक सेवा आयोग कार्यालय के सामने इलाहाबाद में हुए आरक्षण विरोधी उग्र प्रदर्शन से इस सरकार को फर्क पड़ने वाला नहीं था। जबरदस्त ‘यादववाद’ के आक्षेप से घिरे इस सत्तालोलुप कुनबे को जब पार्टी का ‘बेस वोट बैंक’ खिसकता नजर आया तो आनन-फानन में आरक्षण के नये फारमूले को वापस ले लिया गया। यह बात इन्हें तब पता चली जब आरक्षण समर्थकों के दल से यादव प्रतियोगी छात्रों को छोड़, पिछड़े वर्ग की अन्य जातियांे ने रणनीतिक तरीके से दूरी बना ली। यही नहीं अन्य पिछड़ी जातियों के प्रतियोगी छात्र अब मुलायम के पूरे कुनबे को पानी पी-पी कर गरिया रहे हैं।    

देश की आन्तरिक दुर्बलताओं में कई तरह के ‘वाद’ राष्ट्रीय पतन के कारण बने हैं। ये ऐसे रोग हैं, जो भारतीय समाज को घुन की तरह अन्दर से खोखला कर रहे हैं। जातिवाद ने तो असाध्य रोग का रूप धारण कर लिया है। आरक्षण के नये फार्मूले से इस समय जातियों, उपजातियों में शीत युद्ध छिड़ा हुआ है। पिछले 15 दिन से इलाहाबाद शहर अराजकता की आग में जल रहा है। पहले जहां चारों तरफ आरक्षण विरोधी छात्रों का तांडव तारी था तो वहीं अब आरक्षण समर्थक बवाल काट रहे हैं। पुलिस प्रशासन बेचारा बना हुआ है। लोकसभा चुनाव सिर पर है। बेरोजगारी भत्ता व लैपटॉप वगैरह से सपा के पक्ष में जो थोड़ा बहुत माहौल बन रहा था, उसमें पलीता लग गया है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की हालत- भइ गति सांप-छछुन्दर केरी, उगलत, निगलत प्रीति घनेरी जैसी हो चुकी है। सरकार न तो आरक्षण विरोधियों को नाराज करना चाहती है और न ही समर्थकों को ही। इधर आरक्षण के नये फार्मूले को वापस लिया तो उधर काफी विरोध के बावजूद डा0 अनिल कुमार यादव को पुनः लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। स्थिति बेहद नाजुक है। कई शहरों में छात्रों के बीच आपस में टकराव व हिंसा के आसार हैं। सपा के बड़े-बड़े नेता, मंत्री, सांसद, विधायक सहमे हुए हैं। आक्रोशित प्रतियोगी छात्र लाठी-डंडा लेकर सपा नेताओं के घरों-दफ्तरों पर धावा बोल रहे हैं। इस क्रोधाग्नि में आरक्षण विरोधियों व समर्थकों में अजीब किस्म की साम्यता है। दोनों के टारगेट पर सपा नेता हैं।

अखिलेश सरकार के आशिर्वाद से निकला आरक्षण का भस्मासुर विकराल तांडव कर रहा है। पूरा यूपी ‘जातिवाद’ के मझधार में फंसा है। कैसे निकलें इससे। ‘जाति’! हाय री जाति! जाति-जाति रटते, जिनकी पूंजी केवल पाखंड। महात्मा बुद्ध के समय से इस कुप्रथा पर चोट मारी जा रही है। जाति मिटाने को बड़े-बड़े आन्दोलन चले। अनेक समाज सुधारकों ने इस पर करारा प्रहार किया। कबीर से लेकर नानक, रैदास तक ने इस कीचड़ से उपर उठने के लिये लोगों की आत्मा को झकझोरा । महर्षि दयानंद, विवेकानंद, रामा स्वामी, महात्मा फुले, डा0 अम्बेडकर, गांधी जी, इन सब ने अपने-अपने ढंग से जाति प्रथा को समाप्त करने की कोशिश की। जिसे कभी  मुलायम सिंह अपना गुरु बताते थे, उन डा0 राममनोहर लोहिया ने स्वयं जाति तोड़ो का नारा दिया। आधुनिक भारत में जेपी व डा0 लोहिया दोनों ने ही आजीवन जातिविहीन समाज बनाने का प्रयास किया। पर यह ऐसा रोग है कि दूर होने का नाम ही नहीं लेता।

आरक्षण प्रक्रिया में बदलाव से आपसी सद्भावना का माहौल बिगड़ रहा है। यह पाक रमाजान का महीना है। तीज-त्योहारों का मौसम सावन भी सबाब की ओर है। एक तरफ रोजेदार इबादत में मशगूल हैं तो दूसरी ओर शिव भक्त कांवरियों का बोल बम, बोल बम गुंजायमान है। संगम नगरी का समाज बहुभाषी, बहुसंस्कृति और बहुधर्मी रहा है। गंगा-जमुनी तहजीब की नगरी प्रयाग की यही विशेषता रही है। सनातन धर्म के साथ-साथ ढाई हजार वर्ष से बौद्ध व जैन धर्म यहां रहा है। सैकड़ों सालों से ईसाई व पारसी धर्म के मानने वाले यहां शांति चैन से रहे हैं। इस्लाम भी सैकड़ों सालों से इस शहर में है। इसी इलाहाबाद से अंग्रेजों के खिलाफ हिन्दू-मुसलमान और सभी ने मिलकर संघर्ष किया। पर अंग्रेज जाति और धर्म के नाम पर इंसानों के बीच दरार पैदा करने में सफल हुए। जाति और धर्म के नाम पर देश को बांटने तथा राज करने की नीतियां चलायीं। उसी समय से धर्म के नाम पर कटुता फैली, नतीजतन दंगे होने लगे। हिन्दू-मुसलमानों के बीच मारकाट होने लगी। जातियां आपस में लड़ गईं। आजादी के बाद भी धर्म व जाति के नाम पर राजनीति बंद नहीं हुई। कालांतर में यह मुद्दे राजनीति का औजार बन गये। मंदिर-मस्जिद के झगड़े, रामसेतु का झगड़ा, गोधरा कांड, मूर्तियां विखंडित करने के कुत्सित प्रयासों ने समाज को बहुत तोड़ा है। अब सामाजिक विघटन की प्रक्रिया को और आगे बढ़ा रहा है यह ‘जातिवाद’। जातीय टकराहट अब भारतीय राजनीति की सबसे बेस्ट पॉलिसि और खतरनाक शतरंजी चाल है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अब समाज को तोड़ने वाली अधिकांश घटनाओं के पीछे राजनीति का ही हाथ है। लोग मिलजुल कर रहना चाहते हैं पर राजनेता और धर्म नेता अपने निहित स्वार्थों के कारण शांति और सद्भावना का वातावरण विगाड़ते रहते हैं।

क्या कारण है इस महामारी का? उसका जवाब शायद डा0 लोहिया के एक वक्तव्य से मिल सकता है। 1961 में उन्होंने कहा था ‘‘ संप्रति धर्म और राजनीति का सम्बंध बिगड़ गया है। धर्म दीर्घकालीन राजनीति है तो राजनीति अल्पकालीन धर्म’’ है। धर्म श्रेय के लिये तो राजनीति बुराई के खिलाफ लड़ती है। आज बुराई के खिलाफ लड़ाई में धर्म प्राणहीन हुआ है तो राजनीति बहुत ही कलह की और बेमतलब हुई है। वह कहते थे कि सामंती शोषण के तीन हथियार हैं-जाति, भाषा और दाम नीति। उन्हीं दिनों उन्होंने नारा दिया-अंग्रेजी हटाओ, ‘‘जाति तोड़ो’’ और दाम बांधों। लेकिन उनके अनुयायी यह क्या कर रहे हैं। जाति-धर्म के नाम पर ऐसी आपसी नफरत पैदा की जा रही है जिसका परिणाम भयावह है।

नई आर्थिक नीति ने इस नफरत की अग्नि में घी डालने का काम किया है। खेती को घाटे का सौदा साबित कर कृषि पर आधारित लघु उद्योगों को बर्बाद कर दिया गया। हमारी सदियों की आत्मनिर्भरता छिन्न-भिन्न हो गयी। नतीजतन अब गांव-गांव में बेरोजगारों की विशाल फौज खड़ी हो गयी। कोई स्वरोजगार न होने से वे केवल और केवल नौकरी पर आश्रित हो गये हैं। उनकी चेतना इस कदर कुन्द कर दी गयी है कि अब उन्हें लग रहा है नौकरी नहीं होगी तो वह भूंखें मर जायेंगे। उनका सारा पुरषार्थ एक अदद नौकरी के लिये संघर्ष कर रहा है। इसके लिये वह आज कुछ भी करने को तैयार हैं। राजनीति के चतुर खिलाड़ी युवाओं की इस लाचारी, मजबूरी को समझ चुके हैं। तो नौकरी के लिए महासंग्राम तो होना ही है। जगह-जगह गृहयुद्ध जैसी परिस्थितियां चल रही हैं। जियो हे यूपी के लाला……

इलाहाबाद से राजीव चन्देल की रिपोर्ट.

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