जिन्‍हें निकाला गया है, वे सब इतनी जल्‍दी सड़क पर नहीं आएंगे

Abhishek Srivastava : अफ़सोस कि मैं शाम छह बजे यानी मीडिया कर्मचारियों की छंटनी के खि़लाफ़ आज हुए प्रदर्शन के समय से चार घंटा देर से दिल्‍ली पहुंचा। तस्‍वीरें देखीं अभी, सारे टैग किए हुए पोस्‍ट भी पढ़ डाले। यह शुरुआत अच्‍छी है और कारगर हो सकती है, बशर्ते इसे नेटवर्क 18 समूह के कर्मचारियों तक सीमित न रख कर व्‍यापक शक्‍ल दी जाय और मीडिया के कॉरपोरेट स्‍वामित्‍व, उसके निहितार्थों व उससे पत्रकारों के बदलते चरित्र की तह तक ले जाया जाय।

जिन्‍हें निकाला गया है, वे सब इतनी जल्‍दी सड़क पर नहीं आएंगे क्‍योंकि सबको मकान और गाड़ी की किस्‍त चुकानी है और इसलिए अगली नौकरी का जुगाड़ भी करना है। इनकी सलीब कोई और ढोये यह लंबे समय तक नहीं चलने वाला, फिर भी इंसानियत के नाते इनकी मजबूरियां भी हमें समझनी चाहिए।

एक बात साफ है कि जिनका कॉरपोरेट घरानों की नौकरियों में कोई स्‍टेक नहीं है, वे ही इस पहल को आगे बढ़ा सकते हैं। इस पहल को मेरा पूरा समर्थन है, आगे की कार्रवाइयों में भागीदारी रहेगी। बस दो सतर्कताएं बरतनी होंगी। एक, यह लड़ाई नौकरी पाने/बचाने तक सीमित होकर ना रह जाय। दूसरी, आइडेंटिटी क्राइसिस के मारे कुछ गुरुमुखी वामपंथी युवक इसे अपनी नेतागिरी चमकाने का औज़ार ना बना डालें। आखिरी बात: इस मुद्दे को ''पत्रकारों'' से आइडेंटिफाई न किया जाय, ''मीडिया मज़दूर'' एक बेहतर शब्‍द हो सकता है। बुरा लगता हो तो मीडियाकर्मी कहें। यह मूलत: लेबर इश्‍यू है, पत्रकारों का मसला नहीं।

अभिषेक श्रीवास्तव के फेसुबक वॉल से.

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