जिस जिले ने प्रदेश को रोशन किया वहां है सबसे ज्‍यादा अंधियारा

यहाँ मैं ऐसे जिले के बारे में जिक्र करने जा रहा हूँ जिससे सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश सुविधाएँ लेता है। उत्तर प्रदेश के अलावा देश के अन्य भाग भी इससे सुविधायें प्राप्त करते हैं। मैं बात कर रहा हूँ उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले का। भौगोलिक दृष्टि से सोनभद्र देश का एकमात्र जिला है जिसकी सीमायें चार राज्यों को छूती हैं। सम्पूर्ण उत्‍तर प्रदेश व भारत के कई क्षेत्र यहाँ की बिजली परियोजनाओं से रोशन होते हैं। इस जिले में स्थापित सीमेन्ट फैक्ट्रियों, एल्युमिनियम फैक्ट्रियों, यहाँ के गिट्टी व बालू इत्यादि मटेरियल्स से सम्पूर्ण उप्र व देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार होते हैं।

इस जिले के सीने को चीरकर जो कोयला निकलता है उससे सम्पूर्ण उप्र व देश की अनेकों बिजली परियोजनायें संचालित होती हैं। जितना हो सकता है, उप्र व देश, इस जिले का दोहन कर रहे हैं। देश व प्रदेश को इससे कोई मतलब नहीं रह गया है कि यहाँ के निवासी किस हाल में जी रहे हैं। आइये देखते हैं कि किस तरह यह जिला देश व प्रदेश की सेवा में लगा है।

परियोजना परिचय:-

1. रिहन्द डैम    पिपरी  300 मेगावाट  रिजर्वायर

2. रेनूसागर पावर परियोजना  रेनूसागर 887.2 मेगावाट विद्युत परियोजना

3. ओबरा डैम  ओबरा  99 मेगावाट  विद्युत परियोजना

4. उ॰ प्र॰ रा॰ वि॰ उ॰ नि॰ लि॰  ओबरा  1550 मेगावाट विद्युत परियोजना

5. उ॰ प्र॰ रा॰ वि॰ उ॰ नि॰ लि॰  अनपरा  1630 मेगावाट विद्युत परियोजना

6. सिंगरौली सुपर थर्मल पॉवर स्टेशन शक्तिनगर 2000 मेगवाट विद्युत परियोजना

7. रिहन्द थर्मल पावर प्रोजेक्ट बीजपुर  2000 मेगावाट विद्युत परियोजना

8. कनोरिया केमिकल्स पावर प्लांट रेनुकूट  50 मेगावाट विद्युत परियोजना

9. एन॰सी॰एल॰, ककरी परियोजना ककरी  कोयला खदान

10. एन॰सी॰एल॰, बीना परियोजना बीना   कोयला खदान

11. हिण्डालको इन्डस्ट्रीज लिमिटेड रेनुकूट  

12. डाला सिमेन्ट फैक्ट्री,  डाला सीमेन्ट

13. डाला बारी क्रशर उद्योग डाला  बोल्डर, गिट्टी

अब यह भी जान लें कि प्रदेश व देश को खुशहाली की राह पर ले जाने वाले इस जिले की परियोजनाओं के कारण यहाँ के निवासियों को क्या कीमत अदा करनी पड़ती है? देश व प्रदेश यहां से सुविधायें प्राप्त करने के बाद यहाँ के निवासियों के क्या सुविधायें देता है? इतनी सारी बिजली परियोजनायें होने के बावजूद यहां 12 घण्टे भी बिजली नहीं मिलती। जबकि पॉवर प्लान्ट के आवासीय परिसर के लोग 24 घण्टे बिजली का आनन्द उठाते हैं। यदि गांवों की बात करें तो गांव के लोग बिजली नाम की चीज ही नहीं जानते। ये अपने गांव के टीले पर खड़े होकर चमचमाते हुए पॉवर प्लान्ट के अद्भूत नजारे को देखते हैं।

जिले की बिजली परियोनाओं के कारण यहाँ की वायु सदैव प्रदूषित रही है जो दिनों दिन और भी ज्यादा प्रदूषित होती जा रही है। हाल में ही विश्व के सबसे प्रदूषित स्थानों में इस क्षेत्र को शामिल किया गया है। यही ‘‘तमगा’’ मिला है इस जिले के निवासियों को देश व प्रदेश की सेवा करने के बदले। यहाँ की परियोजनाओं से निकलने वाले केमिकल कचरे के कारण यहाँ का जल इतना प्रदूषित हो चुका है कि जीवन देने के बजाय जीवन ले रहा है। मजबूरी में यहाँ के निवासी बिना पानी पीये कुछ दिनों में मरने की बजाय प्रदूषित पानी पीते हुए हुए कुछ वर्षों में मरना बेहतर समझते हैं। कहने को जिले के एकाध क्षेत्रों के इक्का-दुक्का हैण्ड पम्पों में वाटर फिल्टर सिस्टम लगाया गया हैं। किन्तु यह उंट के मुंह में जीरा के समान हैं।

हर महीने सड़क दुर्घटना में घायल होने के पश्चात यहां के निवासियों को उचित इलाज न होने के कारण अपनी जान से हाथ धोना पड़ता हैं। साधारण बीमारी से पीड़ित मरीज भी उचित इलाज के अभाव में दम तोड़ देता है। स्वास्थ्य सुविधाओं की दृष्टि से यह जिला शायद विश्व का सबसे पिछड़ा क्षेत्र होगा। प्राईवेट चिकित्सकों को तो छोड़िए सरकारी चिकित्सक भी मलेरिया व टाइफाइड जैसी साधारण बीमारी से ग्रसित व्यक्ति को भी नहीं बचा पाते। बीमारी अगर थोड़ा भी गंभीर रूप ले लेती है तो ये डाक्टर तत्काल ही वाराणसी के लिए रेफर कर देते हैं। रेफर भी तब करते हैं जब सारे प्रयोग आजमा लेते हैं और मरीज के दम तोड़ने में घंटे 2 घंटे ही रह जाते हैं। 10 में से। मरीज ही वाराणसी पहुंच पाता है अन्य रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं क्योंकि यहां सड़क भी गड्डों में तब्दील हो चुकी है।

कहने को तो केन्द्र सरकार के अन्तर्गत आने वाली एन॰सी॰एल॰ और एन॰टी॰पी॰सी॰ के आवासीय परिसर में चिकित्सालय बने हैं। किन्तु यहाँ के चिकित्सक मात्र परियोजनावासियों की चिकित्सा को ही अपना एकमात्र लक्ष्य समझते हैं। इनकी चिकित्सा तो वो पूरे मनोयोग से करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सा हेतु अन्यत्र ले जाने की बात आती है तो उन्हें हवाई एम्बुलेंस तक उपलब्ध करा देते हैं। किन्तु बात जब आम निवासियों, आदिवासियों की आती है तो उन्हे दुत्कार कर भगा देते हैं। काफी अनुनय-विनय करने के बाद यदि भर्ती भी कर लेते हैं तो केवल इलाज की खानापूर्ति ही करते हैं और मामूली बीमारी के लिए भी हजारों रुपये की फिजूल की दवाईयों की खरीददारी कराते हैं। मरीज अगर सीरियस हो जाय तो रेफर के नाम पर उसे अपने हाल पर छोड़ देते हैं।

इतनी परियोजनाएं होने के बावजूद टेक्निकल व मेडिकल शिक्षा के नाम पर यहां कुछ भी न ही हैं। यह जिला, प्रदेश को सर्वाधिक राजस्व देने वाले जिलों में से एक है। लेकिन सुविधाएं देने की बात आती है तो प्रदेश सरकार यहाँ के निवासियों को ठेंगा दिखा देती है। यहाँ तत्काल एक विश्वविद्यालय खोजे जाने की आवश्यकता है। लेकिन शायद ऐसा कभी हो नहीं पायेगा क्योंकि न तो अखिलेश सिंह यादव और नही राहुल गाँधी यहाँ के सांसद हैं क्योंकि सारी जन कल्याणकारी सुवधिायें तो इन वीआईपी नेताओं के क्षेत्र के लिए ही आरक्षित है। क्या सरकार यहाँ के लोगों को सदैव आदिवासी ही बनाये रखना चाहती है। सरकार का नारा है सब पढ़ें, सब बढ़ें। क्या यहाँ के लोगों को पढ़ने व बढ़ने का अधिकार नही है?

लखनऊ और दिल्ली में बैठे लोगों को क्या कहें जब अपने ही क्षेत्र के सांसद और विधायकों ने मात्र स्वयं के विकास को ही यहां का विकास समझा और बाहरियों की तरह इन्होंने भी यहाँ के संसाधनों का उपभोग किया। जैसे महान व्यक्तियों को अपनी महानता की कीमत अदा करनी पड़ती है शायद उसी तरह यह जिला भी दूसरों को विकशित करने की कीमत अदा करा रहा है। चिराग तले अंधेरा जैसी कहावते ऐसे ही नहीं कही गयी हैं। यहां के निवासी इस आस में जिये जा रहे हैं कि शायद यहां की धरती भी कभी किसी अखिलेश या राहुल को पैदा कर सकी तो यहां भी विकास की गंगा बहेगी।

लेखक अनूप द्विवेदी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. इनसे संपर्क ई मेल anoopdwivedi99@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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