जिस दिन लिखने पर आ गया…वापस बेगूसराय भागना पड़ेगा सर : मयंक सक्सेना

Mayank Saxena : "साले तुम से एक स्पेलिंग ठीक नहीं लिखी जाती…चूतिए हो…तुम भी और तुम्हारा वो चूतिया मयंक सक्सेना भी…नौकरी से निकाल दूंगा…जाओ और उन्ही बूंद के चूतियों के साथ काम करो…" ये एक राष्ट्रीय टीवी चैनल के न्यूज़ रूम में एक महान सम्पादक की भाषा है…दर्शक ज़रा ग़ौर करें…पत्रकार भी…प्रशिक्षु पत्रकार भी…हिंदी मीडिया कैसे लोगों के हाथों में है…

Mayank Saxena : शरीफ हूं इसलिए शांत रहता हूं…तमीज़ से मिलता हूं… वरना जिस दिन लिखने पर आ गया…वापस बेगूसराय भागना पड़ेगा सर…समझ रहे हैं न…जिसे कुछ खोने का डर न हो, बहुत ख़तरनाक आदमी होता है…थोड़ा संभल कर रहिए…बुढ़ापे की चोटें ठीक नहीं होती…खासकर प्रतिष्ठा पर लगी चोटें…

Mayank Saxena : न्यूज़ मीडिया की एक रवायत है…सम्पादक कितनी भी मज़बूत स्थिति में हो…वो भले ही कितने साल से सम्पादक हो…कितने ही पुरस्कार पा चुका हो…वो एक अदने से कर्मचारी से भी डर जाता है अगर वो उसके सामने सच बोलने की हिम्मत रखता हो…उससे बेहतर सोच और लिख लेता हो…लेकिन उसकी कोई औक़ात न हो…मालूम है क्यों…गोरख की एक कविता इसका जवाब देती है…

वे डरते हैं
किस चीज से डरते हैं वे
तमाम धन-दौलत
गोला-बारूद पुलिस-फौज के बावजूद ?
वे डरते हैं
कि एक दिन
निहत्थे और गरीब लोग
उनसे डरना
बंद कर देंगे

युवा पत्रकार और एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

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