कुछ करोड़ लगाकर आए दिन खुलने वाले चैनल ना तो जनता का दुख दर्द बांट पा रहे हैं और ना ही ये रूट लेबल के पत्रकारों का कुछ भला कर पा रहे हैं. इन्हें ऐनकेन प्रकारेण बस पैसा कमाने की चिंता रहती है, चाहे वो स्ट्रिंगर किसी को ब्लैकमेल करके दे या ये लोग निर्मल बाबा जैसों का विज्ञापन चलाकर मिले. मझोले स्तर के चैनल में पत्रकारों का हाल कितना बुरा है ये उनसे बात करके ही पता लगाया जा सकता है. निम्नतम सेलरी, लेटलतीफ सेलरी, काम की अधिकता, तनाव-दबाव, नौकरी की अस्थिरता के बीच पत्रकारिता करने की मजबूरी है इन पत्रकारों के सामने.
चिटफंड या उल्टे-सीधे काम करने वाली कंपनियों के इस फील्ड में आने से स्थिति और बदतर हो गई है. ऐसे ही एक चिटफंड कंपनी जीएन ग्रुप के चैनल जीएनएन का यूपी में हाल है. चिटफंडिया ग्रुप ने चैनल को फ्रेंचाइजी दे दी है. पर कंपनी ने फ्रेंचाइजी देने से पहले चैनल के लिए काम करने वाले स्ट्रिंगरों का पैसा चुकता नहीं किया. अब बताया जा रहा है कि यूपी में चैनल की फ्रेंचाइजी लेने वाले जितेंद्र गुप्ता अपने हिसाब से लोगों को रख रहे हैं. जाहिर है पुराने स्ट्रिंगरों से उनका कोई सीधा लेना-देना भी नहीं है.
कुछ स्ट्रिंगरों का कहना है कि जितेंद्र जिसे भी स्ट्रिंगर रख रहे हैं उससे लेटर और आईडी के नाम पर पांच से दस हजार रुपये की वसूली कर रहे हैं. जबकि पुराने स्ट्रिंगरों को अब तक ना तो पैसा दिया गया है ना ही उनसे इस संदर्भ में कोई बात की जा रही है. उत्तराखंड में यही काम उनके लिए चन्ना नाम के शख्स कर रहे हैं. हालांकि इन आरोपों को जितेंद्र गुप्ता पूरी तरह नकारते हैं. जितेंद्र का कहना है कि लेटर या आईडी के नाम पर किसी से एक पैसा नहीं लिया जा रहा है. हम जिन लोगों को रख रहे हैं उनके उपर रिपोर्टिंग और बिजनेस दोनों की जिम्मेदारी दी जा रही है. जो पैसे लिए जा रहे हैं वो विज्ञापन के मद में हैं. हम अपने स्ट्रिंगरों से एग्रीमेंट भी करा रहे हैं, उन्हें प्रति खबर तीन सौ दिया जाएगा.





