जीनियस अमरेंद्र किशोर और जीवन के धूप-छांव

अमरेंद्र किशोर के बारे में लिखना मेरे लिए आसान नहीं है। बहुआयामी किरदार है, जीनियस है, मेहनती है, ईमानदार है, लेकिन चालू नहीं है, अक्सर धोखे का शिकार हो जाता है। अध्ययनशील है, किताबें पढ़-पढ़कर आंखें खराब की हैं, बौद्धिक संपदा से भरपूर है, व्यक्तित्व में गहनता है तो भीतर कहीं एक उद्दंड बालक भी बसता है, जो हर वय में एक नई शरारत करने को उकसाता रहा है। निकट हूं तो उसकी गहराई जानता हूं, दोस्त हूं तो कई ऐसे राज भी जानता हूं, जिसे शायद पूरी तरह उजागर करना मुनासिब ना हो। बेहतर है कि शुरू से चलें।

1994 का साल। भारतीय जनसंचार संस्थान का हिंदी पत्रकारिता विभाग। अमरेंद्र और हम पहली बार क्लासरूम में ही मिले थे। आगे वाली बेंच पर अमरेंद्र किशोर, रवीश कुमार, सर्वेश तिवारी, शालिनी कंचन (अब शालिनी जोशी), संगीता तिवारी, अमृता मौर्या का कब्जा हुआ करता था। अमरेंद्र निस्संदेह बैच का हीरो था, क्लीनशेव, स्मार्ट, चेहरे पर आधुनिक डिजाइन का चश्मा। क्लासरूम में बातचीत से लेकर कैंटीन में एक साथ चाय पीने तक ऊपर लिखे नाम ही एक साथ नजर आते थे। शुरू में ही हमारे कोर्स डायरेक्टर डॉ. रामजीलाल जांगिड ने हम लोगों से कहा था कि अखबारों के लिए लिखने की कोशिश करो, जिसका कुछ छपे, वो क्लासरूम के बाहर वाले बोर्ड पर उसकी कॉपी नत्थी कर दे।

इस कथन के अगले ही दिन अमरेंद्र का लेख राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर छपा, सगर्व उसने बोर्ड पर चिपकाया। हम सभी दर्शकों का वहां तांता लग गया और अमरेंद्र हीरो। दो दिन बाद नवभारत टाइम्स के संपादकीय पृष्ठ पर छपा लेख चिपकाया। कलेजे पर सांप लोट गया, क्योंकि सारा फोकस अरमरेंद्र पर था। लड़कियों की नजरें पहली बेंच से दाएं-बाएं जाती ही नहीं थीं। हम लोगों तक क्या पहुंचतीं, क्योंकि हम लोग पिछली बेंच के वासी थे। अमरेंद्र के हफ्ते में एक-दो और कभी कभी तीन चार लेख भी अखबारों में छप जाते थे, हम लोगों की छाती पर मूंग दलते हुए अमरेंद्र उसे बोर्ड पर चिपकाता था।

अब छपास रोग के हम सभी शिकार थे, कुछ भी हो, छपना चाहिए। मैंने प्रकाशन विभाग की किताब से प्रताप नारायण मिश्र पर लिखा एक लेख टीपा, भाषा बदल डाली, उनके जन्मदिन पर नवभारत टाइम्स में छपने के लिए दे दिया। संपादकीय पृष्ठ पर छपा, दिल को करार आया, विजेता की तरह लाकर मैंने भी बोर्ड पर चिपका दिया। गांधी शांति प्रतिष्ठान की पर्यावरण पर लिखी एक किताब में कॉपीराइट की जगह लिखा था कि चाहे जैसे इस्तेमाल कर सकते हैं इसकी सामग्री को। मैंने आयोडीन नमक पर एक लेख टीपा, भाषा बदली, राष्ट्रीय सहारा में छपा। अब अमरेंद्र से बातचीत होने लगी, लेकिन बस सलाम बंदगी तक।

अमरेंद्र किशोर
अमरेंद्र किशोर

एक दिन मैंने अमरेंद्र से पूछा कि पर्यवारण पर लेख लिखा है, भाई कहां छपने के लिए दूं। अमरेंद्र ने पहले तो घूरा, जैसे पात्रता तलाश रहा हो। फिर बोला-जनसत्ता में दे दो संपादकीय पेज के प्रभारी हैं जवाहरलाल कौल। मैं गया कौल साहब के पास। कौल साहब ने देखा तक नहीं कि क्या लिखा है, उन्होंने बेइज्जत करके भगा दिया कि कल के लौंडे जनसत्ता में संपादकीय पेज पर लिखेंगे। बाद में अमरेंद्र ने ही बताया कि वो उसने शरारत की थी, क्योंकि जवाहरलाल कौल ने उसके साथ भी यही किया था। एक दिन मैं तेजी से संस्थान की तरफ बढ़ रहा था। अमरेंद्र और शालिनी साथ निकले थे, कोई सेमिनार देखने। मुझसे बोला-प्रभाष जोशी आए हैं, दौड़कर जाओ। शालिनी ने भी वही कहा, जो अमरेंद्र ने कहा। मैं दौड़कर गया, पता चला कि दोनों ने मिलकर उल्लू बनाया है।

14 सितंबर 1994, हिंदी दिवस पर कार्यक्रम था। तमाम लोगों के पास लिखे भाषण थे, मुझे इस पर बोलने के लिए किसी तैयारी की जरूरत नहीं थी। पहली बार मंच से मैंने बात रखी, तालियां बजीं। अमरेंद्र समेत अगली पंक्ति में बैठे साथियों में उसी दिन पैठ बनी, इज्जत बनी और पिछली बेंच से मेरा ट्रांसफर आगे की बेंच पर हो गया। अमरेंद्र से दोस्ती गठ गई। घऱ आना जाना शुरू हुआ। अमरेंद्र को भीतर से जाना तो इज्जत बढ़ती गई। पट्ठा तो तबसे अखबारों में छप रहा था, जब उसने ग्रेजुएशन भी नहीं की थी। हिंदी में ही नहीं अंग्रेजी अखबारों औऱ पत्रिकाओं में भी लेख छपे थे। हैंड राइटिंग के तो क्या कहने। एक-एक अक्षर, जैसे मोती पिरोए हों। जैसी हिंदी, वैसी अंग्रेजी। आदिवासियों पर किशोरावस्था से ही अध्ययन शुरू कर दिया था, मूंछें उगने की उम्र में आदिवासियों पर अध्ययन में विशेषज्ञ बन चुका था।

पहली जनवरी से पहले हम दोनों ने योजना बनाई क्लास में स्लोगन लिखने की। मैं शेर-ओ-शायरी का मास्टर था, अमरेंद्र भी कम कलाकार नहीं। ऐसे-ऐसे स्लोगन चिपके कि लोगों को बरसों याद रहे। अमरेंद्र सभी अध्यापकों का प्रिय था, जांगिड साहब का भी, लेकिन उसने संस्थान के डायरेक्टर जेएस यादव का इंटरव्यू राष्ट्रीय सहारा में क्या छपवाया, जांगिड साहब के लिए अछूत हो गया। जांगिड साहब ये भी चाहते थे की उनका कोई भी प्रिय अमरेंद्र से न सटे। कुछ पर असर हुआ, कुछ पर नहीं भी हुआ।

वक्त बीतता गया, दोस्ती के खांचे भी बनने लगे। अमरेंद्र लिखने के मामले में तो फोकस्ड था, लेकिन जिंदगी में हमेशा फोकस आउट रहा। एक साथ दो तीन से इश्क फरमाने की कोशिशें कीं, शायद मकसद ये था कि कोई न कोई तो साथ आएगी। न साथ आई, न हाथ आई, साहब बहादुर हाथ मलते रह गए। एक भी तीर निशाने पर नहीं लगा। बकौल इश्कियां वाले नसीरुद्दीन शाह- इस बार का इश्क सच्चा है, अमरेंद्र ने किसी की बात मुझसे की। लड़की से मेरे अच्छे रिश्ते थे, बहन मानता था मैं उसे। मैंने बात आगे बढ़ाई। मुंह की खाई। लड़की ने जमकर डांट लगाई, मुझे भी, अमरेंद्र को भी। अमरेंद्र की सिट्टी-पिट्टी गुम। एक दिन तो बाहर मिले, अमरेंद्र ने हमेशा की तरह गर्मजोशी के साथ हाथ बढ़ाया- हल्लो विकास..। तभी उसकी नजर पड़ी उसी लड़की पर। उसने हाथ पीछे खींच लिया, मैंने पूछा-क्यों भाई, किसी गलत आदमी से मिल गए क्या। संस्थान में एक और लड़की रिसर्च करने आई थी। अमरेंद्र की बौद्धिकता पर फिदा हो गई। अमरेंद्र ने संस्थान की लाइब्रेरी से लेकर जेएनयू की झाड़ियों और पहाड़ियों की सैर करवाई। एक अधूरी सी कहानी थी, जिसका वितान तो बढ़िया था, लेकिन कहानी में क्लाइमेक्स नहीं था।

अमरेंद्र निश्चित रूप से बैच का टॉपर था, लेकिन जेएस यादव के इंटरव्यू का साइड इफेक्ट ये हुआ कि वो टॉप-3 में भी नहीं था। संस्थान से हम लोग अलग हो गए। अमरेंद्र अकेला था, जिसकी राष्ट्रीय सहारा में नौकरी लगी, दो हजार रुपये महीने पर। इम्तिहान सबने दिया था, कामयाबी सिर्फ अमरेंद्र को मिली थी। मैंने हिमालय दर्पण अखबार के दिल्ली ब्यूरो में ज्वाइन किया, लेकिन जब मुझे विचार मीमांसा में उत्तर प्रदेश ब्यूरो चीफ का ऑफर मिला तो मैंने अमरेंद्र को भी दिल्ली ब्यूरो में खींच लिया।
यहां से एक नए अमरेंद्र से परिचय हुआ। मैं और अमरेंद्र भोपाल पहुंचे मैग्जीन निकलवाने। रात भर काम करते थे। विचार मीमांसा के मालिक वीएस वाजपेयी हम लोगों को बहुत मानते थे। एक दिन पता चला कि अमरेंद्र ने जिस रिसर्च स्कालर को जेएनयू में तमाम मदद पहुंचाई थी, वो भोपाल में ही है। बात हुई, वाजपेयी ने सिएलो गाड़ी दी। हम दोनों मिलने पहुंच गए। एक कमरे में वो अपनी सहेली के साथ रहती थी। थोड़ी देर में अमरेंद्र उसे कार में लेकर झील के किनारे निकल गया। कमरे में मैं बचा, उसकी सहेली बची, जो मुझे जबरदस्ती गाना सुनाने पर आमादा थी।

वाजपेयी जी को पता चला कि इन सबकी दोस्त लड़की है, नौकरी के लिए बुलावा भेज दिया। लड़की खूबसूरत थी, वाजपेयी पुराने सहारा फैमिली के किरदार थे। लड़की पर लट्टू हो गए। किसी तरह वो पीछा छुड़ाकर वहां से निकली। वाजपेयी अमरेंद्र से बोले- यार इसे ज्वाइऩ करवा दो भोपाल में, जितनी तनख्वाह वो सोच नहीं पाएगी, उससे ज्यादा दूंगा। अमरेंद्र ने जब ये बात उस लड़की से कही तो वो भड़क गई। फिर शायद अमरेंद्र से उसकी मुलाकात नहीं हुई।

एक दिन कुछ ऐसी बात हुई कि अमरेंद्र ने विचार मीमांसा से इस्तीफा दे दिया। वाजपेयी जी ने मुझे मनाने भेजा, लेकिन अमरेंद्र नहीं माना। क्या बात हुई थी, ये बात मुझे अमरेंद्र ने तीन साल बाद बताई।

यहां से अमरेंद्र की एक नई शुरुआत हुई। अमरेंद्र ने आदिवासियों पर काम करने वाला एक एनजीओ ज्वाइऩ किया। इस एनजीओ के जरिए अमरेंद्र उन आदिवासियों के बीच पहुंचा, जिनके लिए वो बरसों से साधना कर रहा था। दक्षिण पूर्वी एशिया के करीब 14 करोड़ आदिवासियों के बारे में जानने की उत्सुकता अमरेंद्र को देश के अलावा बांग्लादेश, थाइलैंड, कंबोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम और फिलीपींस के जनजातीय दुर्गम और दुरूह इलाकों में ले गई।

इस दौरान अमरेंद्र किशोर ने कई शानदार किताबें लिखीं इनमें शामिल हैं- आजादी और आदिवासी (निबंध संग्रह), सत्ता समाज और संस्कृति (निबंध संग्रह), मां नाराज क्यों है (उपन्यास), पानी की आस (निबंध संग्रह), जंगल जंगल लूट मची है (निबंध संग्रह), ये माताएं अनब्याही (उड़ीसा की बिन ब्याही माताओं की केस स्टडी), बादलों के रंग, हवाओं के संग (लोक ज्ञान एंव कालातीत परंपरा की कहानी)।

अपनी इस जीवन यात्रा में एक तरफ अमरेंद्र किशोर को नोबल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस (बांग्लादेश) के साथ काम करने का मौका मिला तो वहीं उसने जान हथेली पर रखकर इंडोनेशिया के कलिमंटन द्वीप समूह में मुंड आखेटक आदिवासियों के साथ भी काम किया। अमरेंद्र को फोर्ड फाउंडेशन, वर्ल्ड फूड प्रोग्राम, जापान फाउंडेशन के साथ भी काम करने का अनुभव मिला।

अमरेंद्र ने सक्रिय पत्रकारिता से हटकर एक अलग लीक पकड़ी थी। सच्ची पत्रकरिता वही कर रहा था। उसके भीतर का जीनियस उसे लगातार बेचैन कर रहा था। उसकी विलक्षण प्रतिभा बेलगाम घोड़े की तरह उसे कामयाबी और शोहरत के रास्ते पर ले जा रही थी, लेकिन निजी जिंदगी में अमरेंद्र कई बार गच्चा खा गया। घऱ वालों ने इस आज्ञाकारी बालक की शादी करवा दी। बीवी ने पहले दिन से रंग दिखाना शुरू कर दिया। कुल तीन रात अमरेंद्र के साथ रही। चौथे दिन मायके। केस कर दिया। तलाक को लेकर समझौता हुआ। अमरेंद्र की सारी कमाई चली गई। बारह लाख रुपये लेकर बीवी ने पिंड छोड़ा। जिंदगी ने ब्लैक कॉमेडी की थी।

अमरेंद्र को निजी जिंदगी ही नहीं, कर्मक्षेत्र में भी धोखा मिला। जो अमरेंद्र स्कोडा कार में चलता था, वो अचानक पैदल हो गया। जिस संस्था को उसने खून पसीने से सींचा था, जिस एनजीओ को उसने अपनी प्रतिभा की बदौलत देश-विदेश से करोड़ों रुपये का अनुदान दिलवाया, उसी संस्था में उसके मान से मजाक किया गया। संन्यासी की तरह उसने मुंह फेर लिया, फिर पलटकर उधर नहीं देखा।

एक राह छूटी, दूसरी मिली। अमरेंद्र फिर धरती फाऊंडेशन से जुड़ गया। दिल के घाव गहरे थे, वक्त ने बस पपड़ी डाल दी थी, कोई आया, उसने पपड़ी हटाई, जख्म कुरेद दिया। एक इश्क और हुआ। यहां पत्नी नहीं थी, वहां पति नहीं था। एक दूसरे को एक दूसरे की जरूरत थी, दो जरूरतमंदों में रिश्ता हो गया, लेकिन एक बार फिर ये भ्रम था। वो रिश्ता नहीं सौदा था।

एक तरफ प्रेम की राह में पागल पथिक का प्यार था, तो उसके बरक्स स्वार्थ की भट्ठी पर पकाई हुई मुहब्बत। आखिर कितने दिन चलती। बहुत कुछ पाने की जिद, सब कुछ खत्म होने की तरफ था। मुहब्बत में सुहाने सपने क्या दिखाई देते, पुलिस वालों की खाकी वर्दी देखने को मिल गई।

अभी हाल ही में अमरेंद्र ने फेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट किया- आई एम इन ए रिलेशनशिप। बड़ी खुशी हुई हम सभी दोस्तों को। कुछ दिन बाद स्टेटस बदला- आई एम इन अ कॉंप्लीकेटेड रिलेशनशिप..। मैंने ज्योतिषी से उसकी कुंडली दिखवाई, जानना चाहा कि मुहब्बत में बार-बार इसके सात ऐसा क्यों होता है। पता चला कि काल सर्पयोग है। कुछ और योग है, जिसे ज्योतिषी जाने, भगवान जाने।

अमरेंद्र के बारे में बता दूं कि उसे प्रतिष्ठित मातृश्री अवार्ड, आराधक श्री अवार्ड, कलम का सिपाही अवार्ड, दिल्ली सरकार का साहित्यिक कृति सम्मान और बादलों के रंग हवाओं के संग के लिए देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय सम्मान (पुरस्कार राशि एक लाख रुपये) मिल चुका है।

अमरेंद्र किशोर इन दिनों धरती फाउंडेशन नाम के प्रसिद्ध एनजीओ से बतौर संस्थापक ट्रस्टी जुड़ा है। धरती फाउंडेशन जैविक मिशन, सोशियो इकोनॉमिक रिसर्च और जन जागरूकता का काम करता है। हिंदी, अंग्रेजी और उड़िया इन तीनों भाषाओं पर समान अधिकार रखने वाला अमरेंद्र किशोर राष्ट्रीय हिंदी और अंग्रेजी अखबारों, पत्रिकाओं में लगातार लिख रहा है। कई जाने माने प्रोडक्शन हाउस के साथ मिलकर कारपोरेट फिल्में भी बना रहा है।

अमरेंद्र ने अपना व्यक्तित्व खुद बनाया है, अपनी राह खुद बनाई है। माता-पिता के लिए वो आदर्श बेटा रहा। दोस्तों के लिए यारों का यार। वफा हर जगह निभाई, लेकिन इनवेस्टमेंट की तुलना में रिटर्न नहीं मिला। जिंदगी में कामयाबी ने कदमबोशी करने में कोताही नहीं की, लेकिन एक सच ये भी है कि बदकिस्मती ने भी कभी दामन नहीं छोड़ा। कहते हैं कि जिंदगी ताकतवर इंसान का ही कड़ा इम्तिहान लेती है। जिंदगी अमरेंद्र के कई इम्तिहान ले चुकी है। उम्मीद है कि अब जिंदगी उन इम्तिहानों के नतीजे भी घोषित करेगी। अमरेंद्र जैसा जीनियस जिंदगी के इम्तिहान में भी टॉप करेगा। अभी तो जिंदगी ने सिर्फ चार दशक देखे हैं। अभी तो कई कहानियां लिखी जानी हैं, कई रास्ते आने हैं, कई मंजिलें आनी बाकी हैं। अभी तो मध्यांतर हुआ है, मध्यांतर के बाद कहानी एक नया मोड़ लेगी। क्योंकि क्लाइमेक्स बाकी है मेरे दोस्त।


लेखक विकास मिश्र आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.  उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट इस प्रकार हैं…

Amarendra A Kishore विकास भाई– संस्थान के संगी की नौवीं क़िस्त लिखने के लिए तुम्हे धन्यवाद–मुझे यहाँ कई बातों से ऐतराज है–जो कही गयी न मुझसे वो जमाना कह रहा है–आधी हक़ीक़त आधा फ़साना हो गया है यह लेख। चलिए आपने अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह किया है-अब ये न पूछना कि लेख कैसा है—'हाथों में अंगारे रखकर पूछते हो कि अंगारे की तासीर क्या है ?' आगे क्या कहूँ– दोस्तों को कुछ भी कहने का अधिकार है। कुछेक बातों का जवाब बाद में विस्तार से दूंगा। भाई विकास– ढेरों बातें–कुछ याद सामने हैं और बहुत सारी बिसर गयीं। सबसे पहले तुम्हारी शैली को सलाम और मेरे प्रति तुम्हारे लगाव को मेरा सम्मान। मगर कहना चाहूंगा, जिनका स्वर्गारोहण हो जाये उनके लिए मौन हो जाना चाहिए– बाजपयी जी जैसे भी थे अपने गुण और अवगुण को साथ लेते गए। भारतीय जनसंचार संस्थान में कई लोग थे, सहपाठी और सहपाठिकाएं–हिंदी और अंगरेजी वालों से मेरी बनती थी। कोई भेद नहीं, मतभेद नहीं। हाँ उत्तरोत्तर मैं अंगरेजी वालों और विज्ञापन पाठ्यक्रम के मित्रों के साथ ज्यादा रहने लगा– आज भी सुरेश-राजेश और सूरज इसके उदाहरण हैं। तो हिंदी के आप सारे लोगों के साथ थोड़ी दूरी बढ़ गयी, वजह साफ थी, मैं अछूत घोषित किया जा चुका था, अपने पाठ्यक्रम निदेशक की ओर से। खैर वो आज भी मेरे लिए पूज्य हैं। ऐसा गलत है कहना कि मैं 'एक साथ दो तीन से इश्क फरमाने की कोशिशें कीं' इसका मतलब कि कन्यायों ने भी कोई इश्क़ का रोग पाल लिया था। ऐसा कुछ भी नहीं था। जिस 'बहन ' का प्रसंग तुम सुना रहे हो भाई, क्या उस पर कुछ कहना बाकी है? अब गड़ा मुर्दा उखाड़ोगे तो कुछ न कुछ तो निकलेगा ही। वो कोई रिसर्च स्कालर नहीं थी– माखन लाल संस्थान से इंटर्न करने सहारा आयी थी और मेरे डेस्क पर उसकी ड्यूटी थी। संपादक महोदय के कहने पर मैं उसे जनसंचार संसथान लेकर आया था, जहाँ तुम मिल गए। तुमने उसके साथ ४ घंटे तक शेरो शायरी की थी — और इसके पहले की महफ़िल बाजारू रूप लेता मैंने चलने का फरमान जारी किया था। भोपाल में वह एक कमरे में अपनी सहेली के साथ रहती थी। और वहाँ भी गीत शायरी का दौर चला। किसकी हिम्मत थी कि बाजपयी साहब के साम्राज्य में कोई किसी कन्या को कार में लेकर झील के किनारे निकल जाता– ऐसा होना होता तो वो खुद करते। हाँ वाजपेयी जी ने उसे टीम में रखने का हर हथकंडा अपनाया। मैंने उसे सब कुछ बताया था और बाजपयी साहब के सामने उसे ज्वाइन करने का आग्रह भी किया। आज वह कन्या शादीशुदा ज़िंदगी जी रही है और देहरादून में उसका पति अखबार में है। शादी का प्रसंग थोड़ा कड़वा है। इस बारे में कुछ भी कहना नहीं चाहूंगा। वह मेरी गलती नहीं थी, मगर बड़े बुजुर्गों की गलती पर आप उंगली भी नहीं उठा सकते। बाउजी और भाई ने रिश्ता तय किया था, जिसे मैंने अपने विवेक से एक सार्थक अंत दिया। कर्मक्षेत्र में जो धोखा मिला, वह बस नियति का खेल था। आज जो भी है उसका कोई संतोष नहीं और जो छूटा उसका कोई गम नहीं– रिश्तों का बिखराओ बेहद पीड़ादायी होता है– जो बीत गयी सो बात गयी-मुहब्बत के सुहाने सपने पर हावी पुलिसया धौंस या और और जलालतें ज़िंदगी की एक सीख है। मेरे फेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट– आई एम इन ए रिलेशनशिप से मैं इंकार नहीं करता। वो महज यांत्रिक त्रुटि थी कि कम्प्लिकेटेड हो गया था । काल सर्पयोग तो १२ तरह का होता है– लगभग हर व्यक्ति इससे जकड़ा है। मैं ही क्यों मेरे तमाम सहपाठियों ने अपना व्यक्तित्व खुद बनाया है। बढ़िया लगता है, माता-पिता के लिए आदर्श बेटा कहलाना– तुम भी तो हो अपने माँ पिताजी के आदर्श। गर्व होता है दोस्तों के लिए यारों का यार होना । वफा निभाना परिवार ने सिखाया और धोखा झेलना दुनिया के लोगों ने। क्लाइमेक्स का इंतजार मुझे भी है दोस्त ।

Vikas Mishra Amarendra A Kishore तुम इतना सफाई क्यों दे रहे हो। यहां तुम्हारा चीर हरण नहीं हो रहा है। जो भी प्रसंग हैं, वो जिंदगी के हसीन पल हैं। सबकी जिंदगी में होता है, इससे ज्यादा होता है, कभी कभी इससे बुरा भी होता है। और कई बार आईना झूठ बोल देता है, दोस्त आईने से ज्यादा सच्चे होते हैं। तुम क्या हो, तुमसे बेहतर तुम्हें जानने वाले बता सकते हैं।

Usmaan Siddiqui Vikas Sir…आपकी पोस्ट के बहाने पता चला कि 2010 के ही नहीं बल्कि 1994 के पत्रकारिता छात्र भी ख़ासे रोमांटिक हुआ करते थे…बाकी "कहते हैं कि ज़िंदगी ताक़तवर इंसान का ही कड़ा इम्तिहान लेती है.." सबसे बड़ी बात कही आपने… All Da Best 2 Amarendra Sir..÷)

Abhishek Gupta Vikas Mishra सर गुस्ताख़ी माफ़… लेकिन अगर पोस्ट में आपके आशिकी की डिटेल होती तो मजा आ जाता… बाकी हर बार की तरह ये post भी काफी कुछ सिखाता है…

Shivraj Awasthy Mujhe to shabd hi nhi mil rahe…

Kumar Abhishek Panchal किसी फिल्म की तरह मेरी आंखों के सामने हर एक चरित्र अपना बेस्ट दे गया….
 
Bharat Yadav सर शानदार..जानदार और 'वजनदार' हैं आप आपकी लेखनी का ज़वाब नहीं..आपकी पोस्ट का नियमित पाठक बन गया हूँ मै…
 
Dharmendra K Singh कहानी दिलचस्प ही नहीं शानदार भी है।
 
Sheel Shukla excellent writing ! just like watching a movie "mr. amrendra kishore" important point is this, in present time no one is free to think about others and no one is ready to talk about others. all where is only me me and me. in this scenario this story is also a message and guidance for us please see your around and understand the surroundings.
 
Dharmendra K Singh रिश्तों की पहेली ज़िंदगी में अक्सर फंसाती है लेकिन इससे निकलने का एक ही तरीक़ा है ख़ुद पर भरोसा रखें और दूसरों से उतनी ही उम्मीद रखें जितनी ज़रूरी है।

Pratima Rakesh I object d language…..teen rat ke…12 lakh….vikas ,do individuals ke beech kya hua kaha kiska aham kiske ade aya kiski kya kami rahi u will never know…..intelligence n intolerance ek sikke ke do pahlu hote hai…human relationship me co existence ko vyawharik taur par lagu karna behad mushkil hota hai…ha asambhav nahi….respect for individuality is d foundation of every relationship…….Every body behaves at his best …..asliyat to band kamro me khulti hai……..
 
Kunal Parashar शानदार पटकथा..

Virag Gupta adbhut lekhan
 
Mihir Kumar सभी खामोश हैं…जुबान पर ताले क्यों लग गए पता नहीं…लेकिन मेरे सामने दुविधा है….मित्रों में पहली प्रतिक्रिया मैं दे रहा हूं….लंबी दूंगा इसलिए बोर हुए तो माफी…फिल्में हीरो हीरोइन के दम पर चलती हैं…स्क्रिप्ट राइटर तो अक्सर गुमनाम रह जाता है…लेकिन इस कहानी में स्क्रिप्ट राइटर Vikas Mishra को फुल क्रेडिट…औऱ दिन हीरो यानी Amarendra A Kishore का है तो हिट होने का काफी क्रेडिट तो उसको देना ही होगा….लेकिन एक शक है…इसमें कुछ ऐसे पहलू सामने नहीं आए जो अमरेंद्र को अमरेंद्र बनाने में अहम रहे..तो क्या कहीं कोई फिक्सिंग भी है?? सच क्या है ये तो पंडित जी जानें और जानें आज के नायक अमरेंद्र किशोर…अब बात किरदार की…अमरेंद्र किशोर दरअसल एक जिद का नाम है…एक आदर्श बेटे से लेकर आदर्श नौजवान…संस्कारों से ओत प्रोत…जहां सिगरेट उसके लिए पाप है तो शराब महापाप…लेकिन बाकी "चीजें" कितना पाप औऱ कितना पुण्य…इसका लेखा-जोखा होना बाकी है…..भाषाई श्रेष्ठता से लेकर निजी मूल्यों की श्रेष्ठता औऱ किसी चीज को पाने का जुनून की हद तक आग्रह….जाहिर है जिंदगी में सभी चीजें सभी को नहीं मिलती…हम सब के अपने अपने अंधेरे कोने हैं…जहां अपने अपने राज दफन हैं…..इन अंधेरे कमरों से अमरेंद्र अक्सर चमक कर बाहर निकलता रहा औऱ अक्सर उन्हीं अंधेरो में फिर-फिर खोता रहा….लेकिन कई सालों के बाद उसकी ये चमक फिर से उरूज पर है…सो ढेरों शुभकामनाएं……और अब पटकथा लेखक Vikas Mishra के लिए….बस एक लाइन लिखूंगा….पंडित जी आपकी लेखनी पर गर्व है…इससे ज्यादा कहने में मेरा शब्द दारिद्रय आड़े आ रहा है….माफी चाहूंगा..
 
Suraj Kumar bahut achcha likha hai. shyad vikas ye sab nahin likhta to Amrendra ke baare mein itni gahraee tak jan ne ka mauka nahin milta…shayad is baar amrendra ka complicated relationship simple ho jaye hum yahi kamna karenge….cheers….
 
Ratnessh Srivastwa Bhai Vikas, behad hee badiya likha hai tumane. Dil se likha hai… so behatar hai…. mitra ho to aisa kar sakte ho,, ye to Amrendra ne baar baar kaha hai… Banda hai to abhi bhi bindas hee. ek baat sahi kahi hai yaar.. Amrendra ke bheetar kaa udand balak abhi bhee badmashiya karta rahta hai… lots of luv to Vikas and Amrendra……
 
Suresh Kumar Vashishth बहुत खूब
 
Manisha Tanu GAmrendra was my classmate in school.hamare us chhote se shahar me sabhi ek doosare ko janate the .koi har din ka milana julana nahi fir bhi ek ajeeb si ghanisthta ka ehsas.mere liye to Amrendra aaj tak wahi golu molu sa Appu tha aaj ek naye Amrendra se parichay hua.Achha laga. .
 
Vikas Mishra Pratima Rakesh आपकी आपत्ति जायज है। दरअसल दो दोस्तों के बीच जब बातें होती हैं तो उसका कोई पैमाना नहीं होता। जिसे हम ब्वायज टॉक भी कहते हैं। उसी संदर्भ में जुमला बना था। बहरहाल आपकी आपत्ति के बाद मैंने वो लाइन हटा दी है। आपका धन्यवाद आपने मेरा ध्यान उस तरफ दिलाया।

Vikas Mishra Mihir Kumar आपने मिहिर भाई वो लिखा है, जो मुझसे छूट गया। आपका लेखन अनोखा है, अद्भुत है, बस आपकी दिक्कत ये है कि आप उसे बाहर नहीं आने देते।

Namita Rakesh jeevant lekhan k liye badhai aapko…
 
Ratnessh Srivastwa Bhai Vikas, page ko to tumne edit kar diya, par zindagi ka kya. kaas jeevan ko bhi hum edit kar sakte! Amrendra ke liye behad khoobsoorat jeevan ki kamna….
 
Pawan Jindal Kuch samajh nahin aa raha ki kaya kaha jaaye…,kai logon ki zindagi Roller-Scater (a lot of ups n down ride)ki tarah hoti hai or iska ek bada achcha example Amrendra hai .Bahut kam age mein jyada samajhdaari aa jaane se bhi aisa ho jaata hai, phir aapka bachpan aapke pachpan(55) hone tak bhi chal sakta hai .Duniya aapki kitaaben padhti hai,aapko bada vidhwaan maana jaata hai aur aap Razai mein pade-pade apni galtiyon ka galat-sahi vishletion karte rahte hain.Amarendra bada mehnati hai aur khoob talented bhi, lekin behad emotional bhi hai…..Yaaron ka yaar hai , isme koi do rai nahin hain. Climax abhi baaki hai , aisa mera poora vishwash hai aur jo baat jyada important hai wo hai ki Amarendra sabki behad ijjat karta hai aur kitna kuch ho jaane ke baad bhi kisi ka boora nahin chahta aur nai umeed ka sooraj uske aangan mein roz nikalta hai…..best wishes Amarendra.( Amarendra par tum hi likh sakte they Vikas Mishra aur tumhare likhne ka to loha duniya maan hi chuki hai.)
 
Ratnessh Srivastwa Kisse abhi aur bhi honge….
 
Vikas Mishra Ratnessh Srivastwa हां कई किस्से जानबूझकर नहीं डाले गए, कुछ को जानबूझकर छोड़ा गया, कुछ यूं ही छूट गए। पोस्ट लंबी हो रही थी।

Neeru Awasthi Zindagi ek ajeeb paheli hai …kabhi hansati hai to kabhi rulati hai …….bahut achcha likha gya hai ….
 
डॉ. दीप्ति भारद्वाज अमरेन्द्र जीनियस???? … अमरेन्द्र को भावुक कहा होता तो ज्यादा सटीक था। खैर, अभिव्यक्ति कौशल गजब का। ऊलाला ऊलाला…. मि. नसिरुद्दीन …वाह ।

Sumi Pandey bht behtreeen likha hai sir ji…..apke k likhi hui script ka VO karne ka mauka mujhe bhi mila hai..fortunately apko mera VO pasand b aya tha…bht yaadgar h bo pal mere liye sir jab apne Rana sir mujhe milwaya tha aur bola ki Madhubala wali story ka vo suman ne hi kiya tha sir.. …thank u so much sir…hum freshers par itna trust karne k liye……
 
Kunaal Jaiszwal भैया आप बहुत जीवंत लिखते है मैं कभी अमरेन्द्र जी से नहीं मिला लेकिन पढते हुए एसा लगा जैसे बिलकुल सामने हो कमाल का लिखते हैं आप
 
Pramod Chauhan विकास तुमने तो अमरे्द्र का पूरा चित्र खींच दिया.. वाकई अमरेन्द्र कमाल है..
 
Amrita Maurya Amarendra you are really very deep ! Vikas I also had met Mr Vajpayee of Vichar Meemansa on the invitation of Amarendra in Bhopal, but I didnt like the attitude of Mr Vajpayee at all and decided not to join him. Any ways……this all is the part of learning !!
 
Sandeip Agrawal wo star ( swaghoshit) patrkaro ka dour tha, jab naye our yuva patrkaro ko jalil karke inhe paishchik kism ke aanand ka anubhav hota tha…mujhe bhi Rajkishor, Balmukund, Prayag Shukla our Ibbar rabbi jaise 'diggajo' se jalil hone ka khasa anubhav hai…par isi ke samntar Achyutanand ji, Vinod Bhardwaj, Govind Singh jaise varishtho ka bharpur margdarshan our sehyog bhi mila…jisne mujhe aage badhne ke liye housla diya our ek sabak ki kabhi bhi naye logo se durvyvhar mat karna…our maine hamesha unki madad karne ki hi koshish ki hai. Aaj bhi karta hun…
 
Vidyut Prakash Maurya अमरेंद्र जी के लिए हरेक चेहरे में होते हैं दस बीस आदमी । जिसको देखना कई बार देखना।
 
Satish Kumar Singh इसमें दो राय नहीं है कि अमरेन्द्र बैच का सबसे काबिल छात्र था। निजी जीवन की सफलता किस्मत की चीज है, जिसपर किसी का अधिकार नहीं है। इंसान को वर्तमान में जीते हुए हर पल का आनंद लेना चाहिए।

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