जेपी समूह ने ‘जाल’ में फंसाया हिमाचल प्रदेश को, समानान्तर शासन-तंत्र चला रहा

: जय प्रकाश एसोसिएट्स के काले कारनामें, जानें क्या है पूरा मामला : जेपी द्वारा इलाहाबाद जिले की बारा व करछना तहसील में स्थापित किये जा रहे दैत्याकार बिजली उत्पादन कारखाना से आम जनता को क्या लाभ और क्या हानि होगी, यह समझने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि आज कॉरपोरट महाबली जय प्रकाश एसोसिएट्स के गला घोंटू शिकंजे में हिमाचल प्रदेश है। वहां उसकी तमाम अल्ट्रा-मेगा परियोजनाएं खड़ी हो रही हैं।

सीमेंट, तापविद्युत और जल विद्युत बनाने वाले उसके कई संयत्र लग रहे हैं। इस पहाड़ी प्रदेश में उच्च शिक्षण संस्थान, विश्वविद्यालय स्थापित करने के नाम पर जेपी एसोशिएट्स ‘टीचिंग शॉप्स या डिग्री-डिप्लोमा मिलें' लगा रहा है। वह इस प्रदेश के लोगों को उजाड़ रहा है। उनके बेशकीमती सामुदायिक प्राकृतिक संसाधनों को हड़प रहा है। पहाड़ी राज्य के पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को बिगाड़ रहा है। प्रदेश में सत्तारूढ़ विरोधी दलों को फंडिग भी कर रहा है। सच कहा जाय तो हिमाचल प्रदेश में जेपी एसोशिएट्स अपना समानान्तर शासन-तंत्र चला रहा है।

हिमाचल में देशज लोग स्थानीय स्तर पर जगह-जगह कॉरपोरेट घरानों द्वारा लगायी जा रही बड़ी-बड़ी परियोजनाओं से जूझ रहे हैं। जेपी एसोसिएट्स द्वारा खड़ी की जा रही हर परियोजना उनके निशाने पर है। एक के बाद एक करके राज्य सरकारों ने भले ही हिमाचल में जेपी समूह को अपने संयत्र लगाने के लिये पलक पांवड़े बिछाकर न्योता दिया हो, लेकिन प्रदेश की जनता ने उसे अपने यहां से भगाने के लिये कमर कस रखी है।

लोगों के सतत संघर्ष की गूंज हिमाचल उच्च न्यायालय में पहुंची और उसकी हरित पीठ ने सोलन जिले के भगेरी इलाके में लग रहे जेपी एसोशिएट्स के सीमेंट संय़त्र को अवैध घोषित कर दिया। न्यायालय ने जेपी समूह के ताप विद्युत संयत्र को भी अवैध घोषित कर दिया। बाद में इसे रद् कर दिया गया। जेपी एसोसिएट्स की यह परियोजनाएं न केवल अवैध घोषित की गईं, बल्कि इनको मिलीं पर्यावरणीय मंजूरी भी रद् की गयी। हिमाचल उच्च न्यायालय ने परियोजनाओं को तीन महीने के अंदर समेटने का आदेश सुनाया है। न्यायालय ने कंपनी पर 100 करोड़ का जुर्माना भी ठोका।

हिमाचल उच्च न्यायालय ने अपना आदेश पारित करते समय जो टिप्पणियां की हैं, वे विकास के नाम पर कॉरपोरेट घरानों और सरकारों की मिली जुली कारगुजारियों का कच्चा चिट्ठा खोलती हैं। पर्यावरण सम्बंधी नियमों, मानकों और शर्तों की पूरी तरह अवेहलना की गयी है। विशेष रूप से 1994 तथा 2006 में निर्गत ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ सम्बंधी अधिसूचनाओं की जानबूझकर अनदेखी की गयी। ठीक से कहीं कोई जनसुनवाई नहीं हुई। कम्पनी के समस्त परियोजना-विषयक अभिलेखों को झूठ का पुलिंदा बताया गया है। हर स्तर पर कंपनी ने गलत बयानी और धोखाधड़ी की है, लोगों को गुमराह किया है।

अगर किसी तथाकथित महत्वाकांक्षी वृहदाकार संयत्र पर काम शुरू हो जाता है तो उसे इस देश में रोकने का चलन कतई नहीं है, भले ही वह बेहद खतरनाक, नुकसानदेह और भयावह क्यों न हो। तर्क दिया जाता है कि इसमें कुछ लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है और इस पर अब तक काफी धनराशि खर्च की जा चुकी है।

हिमाचल उच्च न्यायलय की 2 सदस्यीय हरित पीठ के न्यायधीशों सर्व श्री दीपक गुप्ता और संजय करोल ने इस तरह के तर्क को सिरे से खारिज करते हुए तीन महींनों के भीतर परियोजना को पूरी तरह से समेट लेने का आदेश पारित कर दिया। इतना ही नहीं, न्यायालय ने कंपनी को यह आदेश दिया कि चार समान किस्तों में वह मार्च 2015 तक 100 करोड़ रुपये की भरपाई बतौर जुर्माना सुनिश्चत करे। इस धनराशि का उपयोग स्थानीय पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को सुधारने तथा इलाके के लोगों की भलाई व बेहतरी के लिये चिकित्सालय, पाठशालायें और सामुदायिक केंद्र खोलने के निमित्त किया जाय।

राज्य सरकार उसमें से 10 करोड़ रुपए उन गांव वासियों को मुआवजे के रूप में दे सकती है, जिनकी सामुदायिक जमीन को गलत ढंग से पूल में शामिल कर दिया गया जो आर्वंिटत की जा सकती हैं। जेपी समूह का जय प्रकाश एसोशिएट्स लिमिटेड हिमाचल में कहर ढा रहा है, जिसका अंग्रेजी में संक्षिप्त रूप JAL है। जेपी समूह उसे जल कहता है। लेकिन है सचमुच वह ‘जाल’ जिसमें फंसा हुआ हिमाचल प्रदेश कसमसा रहा है और लोग उसके खिलाफ आन्दोलित हैं।

जेपी समूह की कारस्तानी के अनगिनत रूप हैं। जैसा कि जेपी के कारगुजारियों के सम्बंध में जून 2012 में आजादी बचाओ आन्दोलन के संयोजक डा0 बनवारी लाल शर्मा ने इस संवाददाता को बताया था। यही नहीं उन्होंने इस सम्बध में आन्दोलन भी किया था जिससे जेपी ग्रुप काफी पेरशानी उठानी पड़ी और वह कानूनी शिकंजे में फंस गया।

इलाहाबाद से राजीव चन्देल की रिपोर्ट.

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