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जेल भेजने वाली भाषा से बचना चाहिए, बेईमानों को तो बिना ताकीद किये जेल भेज देना चाहिए

Avinash Das : बहुत सामान्‍य सी बात है। हमारे यहां जन-मीडिया नहीं है। धन-मीडिया है। लगभग मुफ्त या बहुत मामूली कीमत पर हम टीवी चैनल्‍स देख लेते हैं। दो से पांच रुपये के भीतर कई रंगीन पन्‍नों का अखबार रोज घर आ जाता है। उत्‍पादन लागत करोड़ों में होने के बाद भी हमारे मीडिया का प्रसार भंडारे की तरह खबर बांटने जैसा है। क्‍यों? क्‍योंकि जो पैसा हम मीडिया को अपने घर का हिस्‍सा बनाने के लिए देते हैं, वह टोकन अमाउंट है – कॉरपोरेट और बाकी कंपनियां मीडिया को हमारे हिस्‍से का बाकी पेमेंट करती हैं। विज्ञापन के रूप में और (प्रभाष जोशी के आखिरी दिनों में खुले) पेड न्‍यूज के रूप में। कितना आसान है यह समझना कि मीडिया मुनाफे का कारोबार है।

Avinash Das : बहुत सामान्‍य सी बात है। हमारे यहां जन-मीडिया नहीं है। धन-मीडिया है। लगभग मुफ्त या बहुत मामूली कीमत पर हम टीवी चैनल्‍स देख लेते हैं। दो से पांच रुपये के भीतर कई रंगीन पन्‍नों का अखबार रोज घर आ जाता है। उत्‍पादन लागत करोड़ों में होने के बाद भी हमारे मीडिया का प्रसार भंडारे की तरह खबर बांटने जैसा है। क्‍यों? क्‍योंकि जो पैसा हम मीडिया को अपने घर का हिस्‍सा बनाने के लिए देते हैं, वह टोकन अमाउंट है – कॉरपोरेट और बाकी कंपनियां मीडिया को हमारे हिस्‍से का बाकी पेमेंट करती हैं। विज्ञापन के रूप में और (प्रभाष जोशी के आखिरी दिनों में खुले) पेड न्‍यूज के रूप में। कितना आसान है यह समझना कि मीडिया मुनाफे का कारोबार है।

वरिष्‍ठ पत्रकार Dilip C Mandal कहते रहे हैं कि मीडिया-कंपनियों के सीईओज जब अपनी वार्षिक बैठकों में मिलते हैं, तो इस पर चर्चा नहीं करते कि हमारा कंटेंट कितना कमजोर या मजबूत हुआ है, इस पर चर्चा करते हैं कि हमने पिछले साल कितना फाइनांसियल टार्गेट अचीव किया और नये साल में कितना अचीव करना है।

जब सब कुछ इतना साफ है, तो फिर मीडिया की जिम्‍मेदारियों और उसकी नैतिकता को लेकर शोर क्‍यों? अरविंद केजरीवाल [Arvind Kejriwal | Aam Aadmi Party] ने अगर कहा है कि मीडिया बिक गया है, तो उन्‍होंने कोई नयी बात नहीं कह दी है। पूंजीवादी मीडिया हमेशा से बिका हुआ रहा है। अरविंद को कहना यह चाहिए कि अगर उनकी सरकार बनी, तो बाकी उद्योगों के लिए जो नियम-कानून हैं, वे मीडिया पर भी लागू होंगे। जेल भेजने वाली भाषा से बचना चाहिए। बेईमानों को तो बिना ताकीद किये जेल भेज देना चाहिए।

पत्रकार और फिल्मकार अविनाश दास के फेसबुक वॉल से.

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