जो कदमताल नहीं करेगा, उसके पीछे सीबीआई छोड़ दिया जाएगा

कांग्रेस का दांव एक बार फिर उल्टा पड़ गया। डीएमके प्रमुख करुणानिधि के बेटे और उनके सियासी वारिस एमके स्टालिन के खिलाफ सीबीआई छापे से इतना बड़ा सियासी भूचाल मच जाएगा, इसका अंदाजा कांग्रेस के रणनीतिकारों को नहीं था। वह तो बस इतना चाह रहे थे कि छापे से उन क्षेत्रीय पार्टियों के प्रमुखों सपा के मुलायम सिंह व बसपा की मायावती को क्लियर कट मैसेज दे दिया जाए जिनके खिलाफ सीबीआई में मामले हैं और जो आंखें दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, या कर सकते हैं।

सूत्रों की मानें तो कांग्रेस के संकटमोचकों ने ही यह रणनीति बनाई थी, लेकिन जब परिस्थितियां उल्टी होती दिखीं तो कलटी (पलटी) मार ली और कहना शुरू कर दिया कि सरकार का इससे कोई भी लेना-देना नहीं है। इतना ही नहीं पूरी की पूरी सरकार सीबीआई के पीछे पड़ गई कि छापे से पहले आखिर क्यों सरकार या संबंधित मंत्रालय को लूप में नहीं रखा गया। सीबीआई प्रमुख रंजीत सिन्हा से जल्द से जल्द स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया। हालांकि इस वाकये के बाद सीबीआई भी काफी समय तक असमंजस में रही और उसकी तरफ से कुछ मौखिक बयान भी जारी किए गए कि सीबीआई मुख्यालय को छापे के बारे में जानकारी नहीं थी।

मीडिया में इस तरह के बयान आने के बाद सीबीआई मुख्यालय में हड़कंप मच गया और आनन-फानन में सीबीआई प्रमुख के नेतृत्व में एक इमरजेंसी बैठक हुई, जिसमें इस पूरे मामले में सीबीआई का स्टैंड क्या हो, इस पर फैसला लिया गया। बैठक के बाद पहली बार सीबीआई की तरफ से आधिकारिक बयान जारी कर कहा गया कि छापा कस्टम और राजस्व अन्वेषण निदेशालय (डीआरआई) की शिकायत पर डाले गए। लेकिन इस जवाब से सरकार संतुष्ट नहीं हुई और बताते हैं कि सीबीआई को तत्काल कार्रवाई (छापा) बंद करने को कहा गया। आनन-फानन में स्टालिन के घर समेत 19 जगहों पर छापे रोक दिए गए। साथ ही उस जांच टीम जांच के काम से दूर रखने को कहा गया।

सूत्रों के मुताबिक सरकार के इस तरह के रुख से सीबीआई महकमा हतप्रभ है। कहा जा रहा है कि कस्टम और डीआरआई की शिकायत के बारे में संबंधित मंत्रालय को पता था और उसके बाद ही एफआईआर दर्ज की गई। इसके बाद छापे तक की कार्रवाई जांच का हिस्सा है। लेकिन सरकार इस बात को मानने को बिल्कुल तैयार नहीं दिखी, बल्कि वह इस पूरे मामले को सीबीआई के मत्थे मढ़ने में लगी रही। वित्त मंत्री पी चिदम्बरम से लेकर संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ व संकटमोचकों में से एक कपिल सिब्बल ने कहना शुरू कर दिया कि सरकार को छापे की जानकारी नहीं थी लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है कि क्या ऐसा संभव है? क्या इस तरह के राजनेता के यहां छापे बिना सरकार को बताए किया जा सकता है और तब जब सरकार को पता है कि जिस नेता के यहां छापे मारे जा रहे हैं, उसकी वजह से ही सरकार को खतरा हुआ है।

बताते हैं कि पल-पल की जानकारी मुहैया कराई जा रही थी और सपा प्रमुख के यू-टर्न लेने के बाद से ही कांग्रेस के संकटमोचकों ने इसे तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल करने का मन बना लिया था। इसके अलावा प्रधानमंत्री के उस बयान से भी इस बात की तस्दीक होती है कि छापे की टाइमिंग गलत थी। इसका सीधा-सीधा मतलब तो यही निकलता है कि छापा गलत नहीं था बल्कि छापे की टाइमिंग गलत थी। इस टाइमिंग का सीधा-सीधा मतलब सरकार में चल रही ऊथल-पुथल से है लेकिन कहा जा रहा है कि इस राजनीतिक ऊथल-पुथल को खत्म करने के लिए ही कांग्रेस की तरफ से यह दांव खेला गया था।

जानकार बताते हैं कि कांग्रेस हालांकि अपने उद्देश्य में कामयाब भी हो गई और समाजवादी पार्टी जिसने डीएमके के समर्थन वापसी के बाद शर्ते रखनी शुरू कर दी थी, वह बिल्कुल ठीक हो गई और आज्ञाकारी बच्चे की तरह हर वह बात मानने को तैयार हो गई जिस पर कल वह दृढ़ थी। केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के जिस बयान को लेकर सपा ने कल दोनों सदन बाधित किए, आज चुप रही और उसकी तरफ से कहा गया कि सोनिया गांधी व कमलनाथ ने माफी मांग ली फिर नाराजगी कहां रह जाती है।

याद रहे कि डीएमके के समर्थन वापसी के फैसले से पहले भी सपा ने विवाद खत्म होने की बात की थी लेकिन जैसे ही डीएमके ने समर्थन वासपी का ऐलान किया सपा ने गिरगिट की तरह रंग बदलकर बेनी की बर्खास्तगी की मांग करनी शुरू कर दी। कल दिन भर मानमनौव्वल का दौर चला और जब देखा गया कि हद से कुछ ज्यादा ही सपा मांग कर रही है तभी फैसला लिया गया कि कुछ न कुछ  ऐसा किया जाए कि समर्थन से बिदकने वाली पार्टी को सहेजा जा सके। सीबीआई का छापा इसी की परिणति मानी जा रही है।

भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन भी इस बात को स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि कांग्रेस के पास बहुमत नहीं सीबीआई है और यही वजह है कि कांग्रेस राजनीतिक दलों को सीबीआई का डर दिखा रही है। वहीं सपा सांसद शैलेंद्र कुमार ने कहा कि डीएमके के समर्थन वासपी के तुरंत बाद स्टालिन के घर पर सीबीआई छापा जरूर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस उन्हें सीबीआई की धौंस नहीं दे सकती क्योंकि उनकी पार्टी के नेता इमानदार हैं।

सीपीआई के नेता अतुल कुमार अंजान भी मानते हैं कि स्टालिन के यहां सीबीआई छापा राजनीतिक दुरुपयोग है। लेकिन साथ ही कहते हैं कि करुणानिधि का पूरा परिवार भ्रष्टाचार में लिप्त है, इसकी जानकारी सरकार को पहले से ही थी। इतना ही नहीं सरकार के पास ठोस प्रमाण भी थे लेकिन समर्थन मिल रहा था, इसलिए छापे को रोकते रहे। उन्होंने कहा कि सीबीआई के छापे यह संदेश भी देते हैं कि जो भी पार्टी कांग्रेस से कदमताल नहीं करेगी, उसके पीछे सीबीआई को छोड़ दिया जाएगा।

कौन-कौन सी बातें शक पैदा करती है

– सीबीआई ने डीआरआई की शिकायत पर ही छापे मारने की कार्रवाई शुरू की थी और यहां खास बात यह भी है कि डीआरआई पी चिदम्बरम के वित्त मंत्रालय के अंतर्गत ही आता है। बताते हैं कि चिदम्बरम ने अपने गृह प्रदेश तमिलनाडु में श्रीलंका मुद्दे पर खुद को अलग रखने की कोशिश की ताकि प्रदेश की राजनीति में उनकी साख का बट्टा न लगे।
    
– अब सवाल उठता है कि आखिर किसके इशारे पर सीबीआई ने छापे मारे और फिर किसके कहने पर छापे बंद किए गए।
    
– जो काम डीआरआई को करना था, उसे आखिर क्यों सीबीआई ने किया।
    
– स्टालिन व उसके परिवार के खिलाफ केस दर्ज नहीं होने के बावजूद आखिर सीबीआई कैसे छापे मारने पहुंच गई।

 क्या कहना है सीबीआई का

सीबीआई के मुताबिक तमिलनाडु में 33 वाहन आयात किए गए, जिनमें से कुछ वाहनों को आयात करके बेच दिया गया जो कि आयात प्रावधानों का उल्लंघन है। इससे राजकोष को 48 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। इस संबंध में एक आयातक और डीआरआई के एक वरिष्ठ खुफिया अधिकारी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया, जिसने कथित रूप से कुछ निश्चित लोगों के परिसरों में वाहनों की पहचान करने के बावजूद उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं थी। सीबीआई प्रवक्ता धरणी मिश्रा के मुताबिक दो साल पहले ही डीआरआई के पास इस संबंध में शिकायत पहुंच चुकी थी लेकिन इसके बावजूद विभाग की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गई।
 

लेखक कुमार समीर पिछले ढाई दशक से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. प्रिंट एवं इलेक्‍ट्रानिक में समान पकड़ रखने वाले कुमार समीर सहारा समेत कई बड़े संस्‍थानों के हिस्‍सा रह चुके हैं.

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