जो संजय पुगलिया और मुकुल कार्यालय संवाददाता के लिए रिजेक्ट हुए थे, वह स्पेशल बन गए

: दिलीप पडगांवकर को हड़काने का अवसर जल्दी ही मिल गया : एसपी सिंह आठ चीफ सब एडिटर बनाने की बात पर बिदक गए : पत्रकार ही नहीं चाहते कि कोई प्रमोशन पालिसी हो : अपने गांव और आस पास बिजली, सड़क सफाई और भ्रष्टाचार आदि समस्याओं को लेकर पहले ग्राम उत्पीड़न मुक्ति समिति के बैनर पर और बाद में नौजवान सभा और किसान सभा के बैनर पर नित धरना प्रदर्शन करते रहते थे मगर नभाटा की घुमंतूगीरी और दिल्ली मेरठ के चक्कर में सब छूट गया था. दिल्ली स्थायी रूप से आ गया तो इंकलाब जिंदाबाद का कीड़ा फिर कुलबुलाने लगा.

उन दिनो टाइम्स आफ इंडिया में एक शक्तिशाली यूनियन थी जो न केवल प्लांट में बल्कि दिल्ली की अन्य अखबारी यूनियन की भी अगुवाई करती थी. यूनियन के चुनाव का ऐलान हो गया था सोचा कि क्यों न यहां जिंदाबाद मुर्दाबाद की हसरत पूरी की जाये. यूनियन के दो पैनल थे एक कांग्रेस समर्थक और दूसरा वामपंथी. वाम पैनल के नेता प्रमोद कुमार शर्मा थे, खांटी ट्रेड यूनियनिस्ट, धारा प्रवाह अंग्रेजी में घंटों बोलने की क्षमता थी उनमें. उनसे मिल कर यूनियन में किसी पद पर चुनाव लड़ने की इच्छा बताई तो वह बहुत प्रसन्न हुए और बताया कि संपादकीय विभाग का कोई आदमी कभी चुनाव लड़ने के लिए तैयार ही नहीं होता हमने अनेक बार अनेक लोगों की खुशामद की मगर कोई सामने नहीं आया आप पहले आदमी हैं जो खुद चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं. यहां से तो विभागीय प्रतिनिधि के लिए भी किसी से जबरन फार्म भरवाना होता है जो बनने के बाद कभी किसी मीटिंग में नहीं आता.

मैं चुनाव में खड़ा हुआ तो विभाग में तरह तरह की बातें होने लगीं अधिकांश का यही कहना था, साला पागल है अपना कैरियर चौपट कर रहा है. चुनाव में पूरा पैनल जीत गया तो पहली मीटिंग में ही मैने बताया कि संपादकीय विभाग में 10, 15 और 20 साल से लोग एक ही पद पर काम कर रहे हैं कोई प्रमोशन पालिसी नहीं है इस बारे में कुछ किया जाना चाहिए. तय हुआ कि पहले इसी बारे में मैनेजमेंट से बात की जाए. बात की तो बताया गया कि संपादकीय विभाग में कुछ करने के लिए संपादकों से बात करनी होगी. संपादकों से बात की तो एस. पी. सिंह और माथुर साहब सिद्धांत रूप में सहमत हो गए. टाइम्स के संपादक दिलीप पडगांवकर से बात की तो उन्होंने साफ कह दिया कि प्रमोशन का आधार केवल मेरिट होना चाहिए. जब उन्हें बताया गया कि हिंदी के संपादक कोई पालिसी बनाने पर सहमत हैं तो वह बुझे मन से वार्ता के लिए तैयार हो गए.

तीनों संपादक, यूनियन के लोग और दोनों अखबारों के प्रतिनिधि बैठे. यूनियन का कहना था कि पहला प्रमोशन तीन साल बाद दे दिया जाए मेरिट के आधार पर संपादक जिसे जब चाहें प्रमोशन दे दें. दिलीप साहब केवल मेरिट की बात कर रहे थे और उन का साथ दे रहे थे टाइम्स के विभागीय प्रतिनिधि रमन नंदा. यहां यूनियन कमजोर पड रही थी. टाइम्स में चीफ रिपोर्टर का पद खाली था रमन नंदा इस की दौड़ में था. उसकी सोच संभवतः यह रही होगी कि संपादक का समर्थन कर वह चीफ रिपोर्टर बन जाएगा. रमन नंदा की जिद के चलते यह मीटिंग बेनतीजा रही. बाद में किसी और को चीफ रिपोर्टर बना दिया गया तो रमन नंदा को शर्म लगी और वह टाइम्स छोड़ कर किसी अन्य अखबार में चला गया.

दिलीप पडगांवकर को हड़काने का अवसर जल्दी ही मिल गया. टाइम्स की एक महिला कोलकाता में स्पेशल करेस्पांडेंट थीं. दिल्ली किसी विभागीय बैठक में आईं थी तो पडगांवकर ने उसे कह दिया कि चूंकि वह एक राज्य देखती हैं इसलिए उसे प्रिंसिपल करेस्पांडेंट बनाया जाएगा. बेचारी बहुत परेशान, टाइम्स की उषा राय को ले कर हमारे पास आई तो मैं और शर्मा जी पडगांवकर से जा भिड़े. पडगांवकर मानने को तैयार ही नहीं हुए तो शर्मा जी ने कह दिया– ठीक है तो फिर आप मुर्दाबाद सुनने को तैयार हो जाएं. यह धमकी काम कर गई और वह महिला पदावनत होने से बच गई.

प्रमोशन की पालिसी तो न बन सकी मगर कई पत्रकारों को प्रमोशन दिलाने का एक और मौका हाथ आ गया. बछावत वेतन आयोग लागू हो गया था और इसमें एक धारा यह थी कि डेस्क का प्रभारी चीफ सब एडिटर होगा. नभाटा में खेल, व्यापार, महानगर, प्रादेशिक और पत्रिका आदि सब जगह सब एडिटर प्रभारी बना रखे थे. इस समस्या को ले कर एस. पी. सिंह से मिले तो वह आठ चीफ सब एडिटर बनाने की बात पर बिदक गए. जब उन्हें बताया कि यह यूनियन की मांग नही बल्कि वेज बोर्ड की शर्त है तो एस. पी. की समझ में बात आ गई. माथुर साहब भी तैयार हो गए और कुछ ही दिन में एक साथ आठ सबएडिटर चीफ सब बन गए. बस यही एक उपलब्धि इस कार्यकाल की रही.

अगली बार चुनाव हुए तो केवल मैं ही जीत पाया, बाकी पूरा पैनल चुनाव हार गया. इससे अलग चुनाव में इसका उल्टा हो गया सारा पैनल जीत गया और मैं चुनाव हार गया. इसका पहले ही पता हम सबको था. संस्थान में 25-30 लोग कट्टर संघी थे. ये चुनाव 1992 के माहौल में हुए थे. इन लोगों ने शर्मा जी को साफ कह दिया था कि इस बार सबको वोट देंगे मगर महर उद्दीन को वोट नही देंगे. ऐसा ही हुआ और केवल मैं ही चुनाव हार गया. यह मेरा अंतिम चुनाव था. मेरे यूनियन का चुनाव लड़ने का असर यह हुआ कि नभाटा से मुकुल और हबीब अख्तर चुनाव मैदान में आने लगे और उधर टाइम्स से पहले मिस्टर चाको आए और बाद में दूसरे पैनल से सबीना इंद्रजीत और हमारे पैनल से महुआ चटर्जी चुनाव लड़ने लगीं. इस प्रकार पत्रकारों के बीच यूनियन अछूत नहीं रह गई. हाँ प्रमोशन पालिसी अछूत ही बनी रही.

इसका नतीजा यह हुआ कि संपादक इस मामले में मनमानी करते रहे. इसका एक उदाहरण र्प्याप्त होगा, नभाटा में दो कार्यालय संवाददाताओं के लिए विभागीय पत्रकारों से आवदन मांगे गए. कई लोगों ने अप्लाई किया. सबका अनुमान था कि संजय पुगलिया और मुकुल का चयन होगा. इंटरव्यू हुआ तो सब रिजेक्ट हो गए. कुछ दिन बाद पता चला कि जो मुकुल और संजय पुगलिया कार्यालय संवाददाता के लिए रिजेक्ट हो गए थे, वह स्पेशल बन गए हैं.

बाद में संजय एस. पी. सिंह के साथ आज तक में चले गए और मुकुल बहुत बेआबरू हो कर निकले. हुआ यह कि मुकुल ने किसी अनाम लेखक का एक लघु पत्रिका में छपा लेख जस का तस अपने नाम से एक बड़ी पत्रिका में छपवा कर इनाम झटक लिया. मूल लेखक के ध्यान में यह बात आई तो उसने अपना लेख, मुकुल के नाम से छपा लेख और भुगतान का प्रमाण संस्थान को भेज दिया. मैनेजर लोग तो इस ताक में रहते हैं कि किसी पत्रकार की कोई शिकयत मिले. मैनेजमेंट ने यह किया कि मुकुल का लेख और मूल लेखक की शिकायत की फोटोकापी करा कर नभाटा के आई. टी. ओ. कार्यालय और दरियागंज कार्यालय के सारे नाटिस बोर्डों पर लगा दी. मुकुल को पता चलना ही था. सो वह शर्म के मारे फिर कभी प्रेस एरिया में दिखाई ही नहीं दिया.

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या maheruddin.khan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207


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