जो सवाल विपक्ष कर सकता है, वही सवाल दीपक चौरसिया पूछते हैं

बेबाकी जब अपनी हद से एक दो क़दम और आगे बढ़ जाती है, तो बदतमीज़ी बन जाती है। 'इंडिया न्यूज़' में बड़े पद पर काम कर रहे दीपक चौरसिया अकसर अपने इंटरव्यूज़ के दौरान बेबाकी की हदों से चार छह क़दम आगे निकल जाया करते हैं। उनका खास तरीका है तिलमिलाने वाले सवाल पूछना और ऐसी दबी हुई मुस्कुराहट के साथ पूछना कि तन-बदन में आग लग जाए। यही उनकी कुल पूंजी है। जो सवाल विपक्ष करता है या कर सकता है, वही सवाल दीपक चौरसिया पूछते हैं।

'राग दरबारी' में श्रीलाल शुक्ल ने ऐसे वकील का जिक्र किया है जिसकी मशहूरी अदालत में गुस्सा करने के लिए थी। जिरह करते हुए वे गुस्से से थर-थर कांपने लगते थे। उनके दलाल नए मुवक्किलों को उनका गुस्सा दिखाने के लिए अदालत में लाते थे। शुक्ल लिखते हैं -'गुस्सा ही उनकी विद्या, उनकी बुध्दि, उनका कानूनी ज्ञान उनका अस्त्र-शस्त्र और कवच था। वही उनका साइन बोर्ड, उनका विज्ञापन, उनका पितु-मातु-सहायक-स्वामि-सखा था।' दीपक चौरसिया का चेहरा जब-जब सामने आता है, पता नहीं क्यों यही श्रीलाल शुक्ल की यही लाइनें याद आती हैं और याद आता है कि जिस तरह उस वकील के लिए गुस्सा सब कुछ था, दीपक चौरसिया के लिए बदतमीजी और धृष्ठता ही सब कुछ है।

उन्होंने जो इतने बरस पत्रकारिता की है, तो उनकी कमाई क्या है? कौनसा इंटरव्यू उन्होंने ऐसा किया कि लोगों को नए तर्क, नयी दृष्टि मिली हो। कौन सी रिपोर्टिंग उन्‍होंने ऐसी की कि कोई नया खुलासा हुआ हो? केवल धृष्ठता और पव्वेबाजी और सेटिंग। इराक पर जब हमला हुआ तो दीपक चौरसिया उस तरफ नहीं थे, जिधर बम गिर रहे थे बल्कि बम गिराने वालों के साथ चल रहे थे और पूरी रिपोर्टिंग उन्होंने अमेरिकी नजरिये से की।

मिसाल के तौर पर जब वे जस्टिस मार्कंडेय काटजू से इंटरव्यू कर रहे थे तो काटजू ने कहा कि गुजरात के विकास की तमाम बातें झूठी हैं। सैंतालीस प्रतिशत बच्चे भूखे और कमज़ोर हैं। आदिवासी इलाकों में सत्तावन प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। विकास का मतलब फैक्ट्री डालना या चंद उद्योगपतियों को सस्ती बिजली और सस्ती ज़मीन देना नहीं है। तो दीपक चौरसिया ने कहा कि कांग्रेस भी ठीक यही बात मोदी के लिए कहती है। वहाँ पर सवाल यह नहीं था कि कांग्रेस क्या कहती है। वहाँ सवाल यह था कि काटजू इस आरोप पर क्या कहते हैं कि वे कांग्रेस के तरफदार हैं। इसका जवाब काटजू दे चुके थे। काटजू कह रहे थे कि खुद जेटली ने गलत लोगों को बचाया और उन्हें अमुक-अमुक जगह पर राज्यपाल बनाया। दीपक चौरसिया इसी को खोद रहे थे। दीपक चौरसिया ने जो धृष्ठता भरी टिप्पणी पहले की थी, उससे काटजू नाराज तो पहले ही हो गए थे फटे बाद में।

सियासी लोगों का इंटरव्यू करना आसान है। वे पत्रकारों की बात भी सहते हैं और लात भी। मगर गैरसियासी शख्स ऐसा नहीं होता। काटजू गैरसियासी शख्स हैं। उनके घर में घुस कर अगर कोई उनसे ही बदतमीजी करेगा तो वे गेटआउट ही कहेंगे। अगर कोई शख्स उनकी बात सुनने की बजाय उनके मुंह में अपने शब्द डालने की कोशिश करेगा तो वे उसे बेवकूफ ही कहेंगे जो कि उन्होंने दीपक चौरसिया को कहा। दीपक चौरसिया को चाहिए कि इंटरव्यू करना सीखें। तीखे सवाल भर पूछ लेना इंटरव्यू नहीं होता। मीडिया के लोग सरकारी वकील नहीं हैं कि लोग उनके हर सवाल का जवाब देने के लिए बाध्य हैं। अगर मीडिया के लोग कटु सवाल करना चाहते हैं, तो उन्हें इसका ढंग भी बदलना पड़ेगा। जो दीपक चौरसिया पूछना चाहते थे, कोई नौसिखिया भी उनसे पूछ सकता था या उगलवा सकता था। मनचाही बात उगलवाने के लिए पहले मनभाती बात करनी पड़ती है। फिर धीरे से सामने वाले को राह पर लाना होता है।

एक बात और…अगर आप इंटरव्यू कर रहे हैं, तो आप खुदा नहीं हो गए हैं। आपमें पर्याप्त विनम्रता होनी ही चाहिए। दीपक चौरसिया में विनम्रता की कमी सबसे ज्यादा है। उनकी बाडी लैंग्वैज, उनकी भाषा, उनकी मुस्कुराहट यही साबित करती है कि वे खुदा हैं और जिससे चाहे जैसे चाहे वो पूछ सकते हैं। काटजू ने अच्छा किया जो उनकी लू उतार दी। अब उनका चैनल काटजू के खिलाफ लगातार ज़हर उगल रहा है। अब हम कह सकते हैं कि काटजू के खिलाफ उनका चैनल वही सब कह रहा है, जो भाजपा कह रही है और कहती है।

दीपक असीम
deepakaseem1@gmail.com

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