ज्यादातर पत्रकारों को बढ़े पैसे के नाम पर बाबाजी का ठुल्लू मिलेगा (देखें पूरा फैसला और पढ़ें मजीठिया रिकमेंडेशन्स)

Yashwant Singh : जैसे हर स्तंभ के लोग अर्थजीवी और स्वहितकारी हो गए हैं, वैसे चौथे स्तंभ वाले भी. खुद के वेतन भत्ते की बात आई तो एकदम से सक्रिय और एलर्ट. बाकी के मुद्दों पर ऐसे चुप हो जाएंगे जैसे कुछ पता ही नहीं चला. मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने जब मीडियाकर्मियों के हित में फैसला सुनाया तो मेरे पास तरह-तरह के फोन आए. कुछ उदाहरण दे रहा..

-क्या इसके दायरे में वेब मीडिया वाले भी आएंगे?

-किस पद वाले को कितना रुपया बढ़ा हुआ मिलेगा?

-क्या इससे इलेक्ट्रानिक मीडिया वालों को भी फायदा मिलेगा?

-सुप्रीम कोर्ट ने किस पद के लिए कितना पैसा तय किया है?

ऐसे ही कई बेवकूफाना सवाल. अबे, सुप्रीम कोर्ट ने सेलरी स्लैब नहीं तय की है और न ही वेतन रिवाइज किया है. यह सब किया है मजीठिया वेज बोर्ड ने. सुप्रीम कोर्ट ने तो बस मालिकों की आपत्ति पर सुनवाई की और दोनों पक्षों को जानने के बाद कह दिया कि इस वेज बोर्ड के हिसाब से ही सेलरी दो. वेब और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोग इस वेज बोर्ड के दायरे में नहीं आते क्योंकि यह सिर्फ प्रिंट मीडिया के लिए है. किसको कितना पैसा मिलेगा, यह खबर कोई आज की नहीं है. नवंबर 2011 में जब मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को केंद्र सरकार ने अधिसूचित-नोटीफाई किया था, उसी दौरान यह स्पष्ट हो गया था कि किसको कितना कितना मिलेगा.

और आखिर में सौ बात की एक बात. ज्यादातर अखबारों में पत्रकारों को बाबाजी का ठुल्लू मिलेगा क्योंकि अखबारों ने या तो ठेके पर पत्रकार रखे हैं या कनसोलिडेटेड सेलरी पर नियुक्तियां हुई हैं. दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों में इस मजीठिया वेज बोर्ड का कोई खास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि यहां परमानेंट इंप्लाई हैं ही नहीं. सब कोनसोलिडेटेड सेलरी पर हैं. तो हे ढेर सारे मारे बेचारे दुत्कारे पत्रकारों, अपनी किस्मत खुद बनाइए, किसी सेठ या किसी वेज बोर्ड या किसी सुप्रीम कोर्ट से कोई पैसा वैसा आपको नहीं मिलने वाला और न ही बढ़ने वाला. होगा वही जो अखबार मालिक चाहेगा. और नार्थ इंडिया वाले अखबार मालिक पूरे बनिए होते हैं, दस रुपये का काम करा लेंगे तब एक रुपया बड़ी किचकिच के बाद मेहनताना देंगे. खैर, भीड़ और बेरोजगारी के इस दौर में पेट पालने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही है, सो पत्रकारिता ही सही. लीजिए, आप लोगों के सवालों के उत्तर देने वाले दो लिंक दे रहा हूं, जिससे आप जान सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा और मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें क्या हैं…

पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले का लिंक..

http://www.bhadas4media.com/pdf/scmwb.pdf


और ये वर्ष 2011 में अधिसूचित मजीठिया वेजबोर्ड की रिकमेंडेशन्स…

http://www.bhadas4media.com/pdf/mwbrn.pdf


भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

उपरोक्त स्टेटस पर आईं कुछ प्रतिक्रियाएं…

Pushya Mitra Variable pay recommended by the Wage Boards would be the minimum maintainable for all
employees including those working on contract basis and the management would be free to pay more than recommended variable pay subject to performance of the workers as well as profitability and viability of the newspaper establishments.
 
Madan Tiwary we r here for that . we will contest and believe me all journalist whether contractual or permanent will get benefit . several such cases of contractual labour have been won in CAT.
 
Pushya Mitra मदन जी मेरा मुकदमा तो आप ही लड़ियेगा, इतना झगड़ने का कुछ तो फायदा होना चाहिये…
 
Madan Tiwary Pushya Mitra be sure sir. we will win. I am also thinking to organize a seminar on judgment as well as about recommendation, hurdle and remedy.

Umesh Sharma Supreme Court should have imposed heavy costs on the petitioners who wanted to delay the implementation of the recommendations on frivolous grounds. There is no illegality with the Wage Boards but the problem is with recruitment of non Wage Board employees and non coverage of the electronic media in its ambit. NFNE, IFWJ, IJU should take up these issues to the courts and get a larger definition of the provisions of the Working Journalists Act which may benefit all.

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