झारखंड सरकार ने तो गरीबों की देवी दयामणि बारला को कैद कर रखा है!

: जेल में भी दूसरों के लिए चिंतित दयामणि ने अपने लोगों से कहा- मैं सुनीलम को आजीवन कारावास दिए जाने की निंदा करती हूं : देवियों को पूजने वाले इस देश की विडंबना है कि जिंदा देवियों के साथ हम अमानुषिक व्यवहार करते हैं। झारखंड के गरीबों की लड़ाई लड़ने वाली और संघर्ष का दूसरा नाम बन चुकी एक देवी के साथ सरकार और शासन क्या कर रहा है, इसकी कहानी हम आपको बताएंगे। दयामणि बारला। एक देवी। एक महिला। एक संघर्ष। एक विजन। एक बुलंद आवाज। लम्बे समय से झारखण्ड में जल-जंगल-जमीन की लड़ाई लड़ने वाली संघर्षशील औरत। इनका नाम यही है- दयामणि बारला।

इन्होंने अपना जीवन देश, समाज और अपने आसपास व गांव के लोगों को बेहतर बनाने के लिए लगा दिया। उन्होंने सिर्फ और सिर्फ समाज के लिए सोचा, मानव जाति को बचाने के लिए काम किया। वही देवी दयामणि बारला आज जेल में हैं। दयामणि ने रास्ता चुना बिरसा मुण्डा के संघर्ष वाला। उस संघर्ष के कारण किसानों को काम मिला। मजदूरों के लिए न्याय की बात हुई। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने का क्रम शुरू हुआ। जमीन को बचाने के लिए इनने दिन रात एक किया। यह सारा संघर्ष खुद अपने लिए नहीं था। यह संघर्ष इस धरती पर रह रहे तमाम लोगों के लिए है। हमारे-आपके लिए है। गरीबों के लिए है। आम लोगों के लिए है। पर इसका नतीजा देवी दयामणि को क्या मिला? उन्हें जेल में बंद कर दिया गया है।

किसानों-मजदूरों के पक्ष में लड़ने वाली दयामणि को परास्त करने के लिए शासन ने छः साल पुराने मामले में उन्हें जेल भेज दिया। अनगड़ा थाना में मनरेगा के खिलाफ रोड पर उतने का एक मामला था। 29 अप्रैल 2006 को लोग सड़क पर उतरे थे। उसी मामले को खोलकर सरकार ने दयामणि पर शिकंजा कसा। उस मामले में सरकार ने आरोप लगाया था कि 1000 की संख्या में स्त्री-पुरुष लाठी डंडा, भाला तीर एवं अन्य हथियारों से लैस होकर दयामणि बारला समेत कई लोगों के नेतृत्व में अनगड़ा चौक पर आये… चौक तथा रांची पुरूलिया मुख्य पथ को जाम करने लगे… काफी समझाने का प्रयास किया गया पर नहीं माने… आरोप लगाया गया कि पुलिस वालों पर प्रहार कर उन्हें जख्मी कर दिया… इस मामले में प्रखण्ड विकास पदा अनगड़ के लिखित प्रतिवेदन पर थाने में धारा  147, 148,149,342,353, 354, 427,377, 504 के तहत रिपोर्ट दर्ज किया गया।

पूरा मामला यह था कि अनगड़ा के किसान मजूदर अपने हक-अधिकार के लिए सड़क पर आए थे। उनकी मांग थी कि सरकारी मनरेगा कानून के अंतर्गत गांव वालों को जॉब कार्ड मिले। इस जॉब कार्ड को पाने के लिए बेरोजगार किसानों मजूदरों ने प्रखण्ड कार्यालय में प्रर्दशन किया था। इस लड़ाई में साथ देने, नेतृत्व करने दयामणि बारला भी सड़क पर उतरी थीं। पुलिस दयामणि बारला के यहां कुर्की जब्ती का नोटिस लेकर पहुंची। छः साल पुराने मामले में थाने ने पहले ही बेल दिया था और कहा था कि अब कोर्ट जाने की जरूरत नहीं है। लेकिन सरकार ने यह मामला खोल दिया और 16 सितम्वर, 2012 को दयामणि बारला को कोर्ट में हाजिर होना पड़ा। दयामणि उस दिन नगड़ी की जनता जो अमरण अनशन पर है, से मिलकर कोर्ट गयीं, जहां उन्हें बेल नहीं मिला। उन्हें न्यायिक हिरासत में ले लिया गया और जेल भेज दिया गया।

2 दिनों के प्रयास के बाद उन्हें बेल मिला लेकिन 19.10.2012 को उन पर दूसरा मामला थोप दिया गया। उन पर दूसरा आरोप नगड़ी के जमीन में धान रोपने का लगाया गया है। इस मामले के कारण वह अब भी जेल में हैं।  उन्हें कई धाराओं में जमानत मिल गई लेकिन धारा 353 में सिविल कोर्ट से बेल नहीं मिलती, सो उन्हें जेल में अभी रहना पड़ रहा है। आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच के अनेकों कार्यकर्ताओं को लगा कि बेल मिलने से उनकी रिहाई हो जाएगी, सो वे अपने नेता दयामणि बरला को जेल से रिहा होने पर स्वागत के लिए दोपहर बाद 2 बजे से 6 बजे तक जेल के सामने खडे रहे। शाम 5 बजे रिहाई न होने की सूचना प्राप्त हो जाने पर वे निराश हो गये।

इधर नगड़ी का आंदोलन तेज है। कांके नगड़ी की उपजाउ जमीन सरकार लेना चाहती है और किसान देना नहीं चाहते हैं। सरकार और ग्रामीण के बीच 9 जनवरी से लगातार संधर्ष जारी है। बारिश का समय आया तो ग्रामीणों ने अपने खेत में धान की फसल लगा दी। कोर्ट का निर्णय ग्रामीणों के पक्ष में नहीं रहा। वहां की स्थिति ठीक नहीं रही। दयामणि बारला इस आंदोलन को धारदार तरीके से लड़ रही थीं। सरकार और कोर्ट के नाक में दम कर रखी थी। सरकार इससे पार नहीं पा रही थी इसलिए पुराने केस को लेकर उसे जेल भेजा गया ताकि नगड़ी की जनता डर जाए।

झारखण्ड की सरकार नहीं चाहती है कि यहां की धरती की रक्षा हो, यहां के देशज लोग खुश रहें। सरकार नहीं चाहती है कि यहां श्रम आधारित व्यवस्था कायम हो, इसलिए पूरे झारखण्ड की जमीन को बेच देना चाहती है और कंक्रीट का जंगल स्थापित करना चाहती और यदि इसके खिलाफ कोई खड़ा होगा तो वह जेल में बंद होगा। दयामणि बरला विकास चाहती हैं लेकिन किसान को जमीन से उजाड़ कर होने वाला विकास नहीं। झारखण्ड में कई ऐसे गांव है जहां कई एकड़ गैरमजूआ जमीन है।

लकारो, तोरपा और नगड़ी गांव ही क्यों जहां हजारों परिवार जमीन से अपने परिवार का पेट पालते हैं। सरकार के पास विकल्प है। वो अपना प्रोजेक्ट हस्ताणरण कर सकती है। पर गांव हस्तांरण नहीं हो सकता है। संस्कृति हस्तांरण नहीं हो सकती। ऐसे में आंदोलन ही एक मात्र विकल्प है लोगों के पास। बिरसा मुण्डा ने भी अंग्रेजों से लड़ाई जल-जंगल-जमीन बचाने के लिए लड़ी था। वो लड़ाई आज भी जिन्दा है। जबड़ा के गांवों में, तजना के गांवों में, बुण्डू के गांवों में, नेतरहाट के गांव में, कुटकू डैम के गांव में, संथाल परगना के गांवों में, बोकारों के गांवों में… जहां भी विस्थापन हुआ सबने बिरसा मुण्डा का रास्ता अपनाया। दयामणि भी इसकी देन है।

जेल में भी दयामणि के हौसले बुलंद हैं

नवरात्रि अष्टमी के दिन हर जगह भीड़ भाड़ है। पूरा रांची शहर मेला और उत्सव से शहर डूबा हुआ है। इस उत्सव और भीड़भाड़ से हट कर जेल के अंदर कैद हैं दयामणि। कल वहां हम लोग झारखण्ड की नेत्री दयामणि बारला से मिलने गए। मेरे साथ दयामणि बारला का पति नेलशन बारला, भाई सुशील बारला, भाभी सुड़ा बारला एवं आदिवासी महासभा के सचिव मनमसीह एक्का, विश्वनाथ तिर्की, कांके नगरी के आंदोलन कारी, जनमाध्यम के प्रवीण पत्नी आरती एवं हमारे सारथी अनिल थे। दल बल के साथ हम लोग जेल पर मुलाकात करने गए। हमें करीब 20 मिनट तक दयामिण बारला से मिलने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ी। आखिर वह समय आया कि हम सभी साथियों को उनसे बात करने का मौका मिला। दयामणि बारला बड़ी बुलंदी से हम लोगों से मिलीं। हम लोगों ने उनसे अपनी- अपनी बात करने के अलावा राजनीति और जेल के अन्दर की तमाम व्यवस्था के बारे में जानकारी ली।

दयामणि बारला को जेल के अंदर रहते हुए पूरी दुनिया के बारे में खबर है। अखबार के माध्यम से उन्हें पता चला कि एमपी के पूर्व विधायक श्री सुनीलम को आजीवन कारावास हुआ है। ऐसी स्थिति में दयामणि ने कहा कि मैं जेल के अंदर से सुनीलम के आजीवन कारावस की आलोचना करती हूं। आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच की दयामणि बारला उनके साथ है। उन्होंने कहा कि जहां भी जमीन की लड़ाई लड़ी जा रही है चाहे वह भारत हो झारखण्ड हो वो किसान हो मजूदर हो आदिवासी हो मूलवासी हो महिला, युवा हो, हमें अपने आंदोलन को वहां जारी रखना होगा ताकि यह देश बचे। हम देश बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

दयामणि बारला ने बताया कि जेल के अंदर 40 महिलाओं के रहने के लिए एक हॉल है। उसी में सभी रहती हैं। खाने में आलू, कोहड़ा, बैगन अधिक मिलता है जो कि उनके लिए डाक्टर ने मना कर रखा है। यह सब उनके शरीर को नुकसान देगा। दयामणि सिर्फ चावल खा रही हैं क्योंकि सब्जी उनके लिए उपयुक्त नहीं है। वे एनेमिक एवं लो बीपी की मरीज हैं। रोज अखबार मिल जाता है जिससे देश और राज्य की पूरी खबर मिल जाती है। वो वहां बुलंद है। पर हम लोगों का क्या फर्ज

अलोका
अलोका
है? क्या हम लोग दयामणि जैसों के लिए आवाज उठाएंगे? देश, समाज, लोगों को बचाने के लिए लड़ने वालों को बचाने का कर्त्व्य हम लोगों का है। इसलिए जो जहां है, वह वहीं से दयामणि बारला के लिए आवाज उठाए।

रांची से वरिष्ठ पत्रकार अलोका की रिपोर्ट. अलोका से संपर्क aloka.ranchi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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