टीवी चैनलों को टैम पर ग़ुस्सा क्यों आता है?

भारत में एक निजी टेलीविज़न चैनल की ओर से टीवी रेटिंग मापने वाली एक फ़र्म के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर करने के बाद देश में दर्शकों की संख्या को लेकर बहस छिड़ गई है. निजी टीवी चैनल एनडीटीवी ने टेलीविज़न ऑडियंस मेजरमेंट यानी टैम नामक इस कंपनी के ख़िलाफ़ ये कहते हुए मुक़दमा दायर किया है कि उसकी त्रुटिपूर्ण दर्शक गणना की वजह से टीवी चैनल को विज्ञापन से मिलने वाली आय का नुक़सान हो रहा है.

इस मुक़दमे के बाद दूसरे प्रसारकों, विज्ञापन कंपनियां और सरकार के सामने ये मुश्किल खड़ी कर दी है कि टेलीविज़न दर्शकों की गिनती को लेकर एक स्थाई हल कैसे निकाला जाए. एनडीटीवी ने मुक़दमा टैम के ख़िलाफ़ उसके द्वारा पेश किए गए दर्शक संबंधी आंकड़ों के बाद दायर किया. टैम का ये आंकड़ा प्रसारकों के विज्ञापन राजस्व को सीधे प्रभावित करता है. ये मामला जुलाई महीने में शुरू हुआ जब एनडीटीवी ने टैम और उसकी मूल कंपनी नील्सन और यूके मीडिया कम्युनिकेशन के स्वामित्व वाली कंतार मीडिया रिसर्च के ख़िलाफ़ अमरीका में मुक़दमा दायर किया था.

एनडीटीवी ने इन कंपनियों के ख़िलाफ़ एक अरब तीस करोड़ डॉलर के हर्जाने का दावा किया है. इनमें 58 करोड़ डॉलर ग़लत सूचना के लिए और 81 करोड़ डॉलर फ़र्जीवाड़ा करने के लिए देने का दावा किया गया है. इसमें कहा गया है कि टैम के आंकड़े झूठे, मनगढ़ंत और धूर्ततापूर्ण हैं. हालांकि इन कंपनियों ने एनडीटीवी के इस दावे को काल्पनिक क़रार देते हुए ख़ारिज कर दिया है. कंपनियों ने अदालत से मांग की है कि वो एनडीटीवी के दावे को ख़ारिज कर दे.

इस मामले में बड़े वित्तीय हित शामिल हैं. एक अनुमान के अनुसार भारत में टेलीविज़न विज्ञापन का बाज़ार क़रीब 19 अरब डॉलर का है. जिस तेज़ी से यह बढ़ रहा है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि यह बाज़ार साल 2016 तक ये दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाज़ार बन जाएगा. भारतीय बिज़नेस अख़बार मिंट के अनुसार साल 2016 तक ये आंकड़ा 54 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा.

टैम देश भर के टीवी दर्शकों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर टारगेट रेटिंग प्वाइंट्स यानी टीआरपी तैयार करता है. ये आंकड़े पीपुल मीटर्स नामक एक विशेष यंत्र के ज़रिए जमा किए जाते हैं. ये यंत्र टीवी देखने वाले चुनिंदा घरों में लगाए जाते हैं. फ़िलहाल मौजूदा समय में विज्ञापन देने वाली कंपनियों के पास टेलीविज़न चैनलों की दर्शक संख्या मापने का यही तरीक़ा है.

इस व्यवस्था को लेकर जो सबसे बड़ा आक्रोश है वो है टैम की तकनीक. मौजूदा समय में टैम 8,150 घरों से आँकड़े इकट्ठा करता है जो कि मुश्किल से 33,500 दर्शकों की पसंद को दर्शाता है. प्रसारकों का मानना है कि इस तकनीक के आधार पर देश की लगभग डेढ़ अरब आबादी की पसंद और नापसंद को साबित नहीं किया जा सकता. इसके अलावा एक सवाल और उठता है कि 8,150 घरों का चयन किस आधार पर किया जाता है, ये भी स्पष्ट नहीं है. साथ ही ग्रामीण भारत इस प्रक्रिया में कहीं भी शामिल नहीं होता, जबकि टीवी के दर्शक वहां भी होते हैं.

यही नहीं, चैनलों की रेटिंग के लिए जो मीटर लगाया जाता है, उसमें आसानी से छेड़छाड़ की जा सकती है.
ताजा विवाद पर प्रसारकों की क्या प्रतिक्रिया है? भारत के दूसरे टेलीविज़न चैनलों ने एनडीटीवी की क़ानूनी कार्रवाई को टैम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के अवसर के रूप में लिया है. भारत में निजी टीवी चैनलों के प्रमुख संस्था न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन यानी एनबीए ने मांग की है कि भारत में सूचना प्रसारण मंत्रालय को इस बारे में ठोस पहल करनी चाहिए.

एनबीए ने सरकार से ये भी मांग की है कि टैम को आगे किसी भी तरह की दर्शक संख्या संबंधी गणना करने से रोक देना चाहिए. वहीं सरकारी प्रसारण संस्था प्रसार भारती ने भी इस बारे में सरकार से बातचीत का फ़ैसला किया है. प्रसार भारती दूरदर्शन टीवी चैनल को नियंत्रित करती है.

प्रसार भारती का कहना है कि वो इस बारे में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग से भी बात करेगा क्योंकि ये टैम का एकाधिकार क़ायम करने संबंधी कार्रवाई है जो दूरदर्शन के दर्शकों को तवज्जो ही नहीं देता. कई प्रसारकों को लगता है कि पिछले साल भारत सरकार की ओर से गठित की गई संस्था ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस मेजरमेंट काउंसिल यानी बार्क को और मज़बूत करना ही फ़िलहाल अंतिम हल है. बार्क ने अभी भी काम करना शुरू नहीं किया है.

निजी टीवी चैनल स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर कहते हैं, “बार्क की मज़बूती के साथ टेलीविज़न रेटिंग संबंधी कई आशंकाओं से निबटा जा सकता है. प्रक्रिया जारी है और हमें इसे और तेज़ करने की ज़रूरत है.”
इस पर सरकार की क्या प्रतिक्रिया है? सरकार को अभी टैम के जवाब का इंतज़ार है और देश के टीलीकॉम नियामक से टीवी रेटिंग के बारे में सुझाव देने को कहा गया है.

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने टैम और नील्सन कंपनी को पत्र लिखकर उनके तरीक़ों पर जवाब मांगा है. लेकिन अभी तक टैम ने कोई जवाब नहीं दिया है. एनडीटीवी-टैम की लड़ाई में क्या होगा, इसे ध्यान दिए बिना इसमें दूसरे पक्षों की मौजूदगी से पता चलता है कि लोग दर्शकों की गणना संबंधी एक पारदर्शी तरीक़े को विकसित करने के लिए बहुत इच्छुक हैं.

बार्क को सलाह देने के लिए सरकार देने के लिए जो सरकारी पैनल बनाया गया है उसकी सिफ़ारिशों में एक ये भी है कि आँकड़ों को इकट्ठा करने के लिए घरों की संख्या बढ़ाई जाए. ये क़दम विज्ञापनों के लिए ख़ुद को बनाए रखने के लिए टीवी चैनलों के बीच प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ाएगा. ये विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये देश में बढ़ते टीवी उद्योग में एकजुटता की ओर भी इशारा कर रहा है. (साभार- बीबीसी)


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