टीवी पत्रकारिता : जारी है शोषण का खेल

अगर आप मीडिया में आना चाहते हैं, यदि आप लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ से जुडकर देश के लिए कुछ करने का सपना देख रहे हैं तो एक बार फिर विचार कर लीजिये। क्योंकि इस वक्त देश में ऐसा कोई न्यूज़ चैनल नहीं है जहां सीधे दरवाज़े से आपको प्रवेश मिल सके। यदि आप ये सोच रहे हैं कि ऐसा सिर्फ निजी समाचार चैनलों में ही है तो ये आपकी भूल है. मीडिया की दुनिया में सुनहरे भविष्य का सपना संजोने से पहले एक बार फिर विचार कर लीजिए। यदि आप ये सोचते हैं कि आप अच्छा लिखते हैं, खबरों को लेकर आपकी समझ अच्छी है और अपनी इसी प्रतिभा के बल पर आप मीडिया में अपना मुकाम बना लेंगे तो आप फिर भूल कर रहे हैं। क्योंकि हिन्दी समाचार चैनलों में ऐसे पत्रकारों की आवश्यकता ही नहीं है. जी हाँ सरकारी समाचार चैनलों में भी नहीं। तमाम सरकारी चैनलों जैसे, दूरदर्शन न्यूज़, राज्य सभा टीवी और लोकसभा टीवी में जितने भी लोग कथित तौर पर पत्रकारिता कर रहे हैं वो सभी ऊंची पहुँच और पैरवी रखते हैं। आप यहाँ एक भी ऐसा शख्स नहीं पायेंगे जो किसी नेता, मंत्री, अफसर या उद्योगपति का कृपा-पात्र नहीं है.

निजी समाचार चैनलों में नियुक्ति को लेकर व्याप्त भारी भ्रष्टाचार की बात करना बेमानी है क्योंकि सरकारी टीवी चैनलों में ही पत्रकारों की नियुक्ति का कोई नियम कायदा नहीं बनाया गया. यदि कागजों पर ऐसा कोई नियम है भी तो वो महज़ कागजी खाना-पूर्ती तक ही सीमित है. क्योंकि सूचना के अधिकार के बावजूद यहाँ पत्रकारों की नियुक्ति को लेकर किसी तरह की पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती है. पत्रकारों की नियुक्ति के लिए सरकारी या निजी चैनलों में ना तो कोई आयोग है ना ही कोई निदेशालय. ऐसे में इस बात का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि किन आधारों पर देश के समाचार चैनलों में पत्रकारों की नियुक्तियां होती हैं? आपको ये जानकार और भी हैरानी होगी कि पत्रकारों के लिए कोई तय वेतनमान भी नहीं है. यानि समाचार चैनलों में काम करने वाले तमाम पत्रकार असल में दिहाड़ी मजदूर हैं, जिन्हें उस मज़दूरी पर काम करना होता है जो उन्हें चैनल ऑफर करता है। यदि वे इसे स्वीकार नहीं करते तो वो बेरोजगार रहने के लिए स्वतन्त्र हैं।

बात-बात पर क़ानून और नियमों की दुहाई देते रहने वाले हमारे समाचार चैनलों का एक और सच ये है कि यहाँ काम के घंटे भी तय नहीं हैं। क़ानून के मुताबिक़ आप किसी मज़दूर से आठ घंटे से ज़्यादा काम नहीं ले सकते और किसी कर्मचारी से छह घंटे से ज़्यादा काम करवाना गैर कानूनी समझा जाता है. लेकिन समाचार चैनलों में ओन रिकोर्ड पत्रकार १० घंटे से ज़्यादा काम करते हैं। इस अतिरिक्त काम का उन्हें कोई मेहनताना भी नहीं दिया जाता। ये सब होता है रचनात्मकता के नाम पर। रचनात्मकता के नाम पर ही खबरिया चैनलों में काम करने वाले युवा पत्रकारों से महीनों रात्रिकालीन शिफ़्ट में काम करवाया जाता है. और ये नाईट शिफ़्ट भी बारह घंटों की रखी जाती है. नियमों के मुताबिक़ यदि किसी कंपनी में किसी कर्मचारी से नाईट शिफ़्ट में काम करवाया जाता है तो उसे डेढ से दो गुना मेहनाता देना होता है और इसके एवाज़ में एक अतिरिक्त छुट्टी भी देनी होती है. इतना ही नहीं कानून किसी भी कर्मचारी से उसकी इच्छा के खिलाफ नाईट ड्यूटी नहीं करवाई जा सकती है। लेकिन अगर आप पत्रकारिता के पेशे में हैं तो क़ानून की बात सिर्फ अपनी पीटीसी में या अपने पॅकेज में ही करने की इजाज़त है.

अब बात करते हैं महिलाओं की सुरक्षा की। क्या पत्रकारिता के पेशे में महिलाएं सुरक्षित हैं? ये सवाल आप उन महिलाओं से पूछकर देखिये जो टीवी चैनलों में पत्रकारिता कर रही हैं। देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर घडियाली आंसू बहाने वाले हमारे न्यूज़ चैनलों के न्यूज़ रूम में काम करने वाली महिला पत्रकार क्या न्यूज़ रूम में ही खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं? यही कारण है कि ज़्यादातर महिला पत्रकार तीन-चार साल समाचार चैनलों में काम करने के बाद नौकरी छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं। जो ऐसा नहीं करती हैं, उन्हें काम में लापरवाही का आरोप लगारकर जबरन नौकरी से निकाल दिया जाता है. और जब तक वो काम करती हैं तब भी वो एक अजीब से डर के सांये में जी रही होती हैं। डर नौकरी जाने का, डर  बिना बात परेशान किये जाने का, डर तानों और फब्तियों का, डर बोस की घूरती नज़रों और न्यूज़ रूम की गंदी राजनीति का. महिला रिपोर्टरों की मनोदशा तो और भी पीडादायक है। क्योंकि बिना बात के उनकी रिपोर्टिंग बीट बदल दिया जाना, उन्हें मुश्किल असाइन्मेण्ट देकर परेशान किया जाना, या फिर रिपोर्टिंग से डेस्क पर शिफ़्ट कर दिया जाना बेहद आम बात है. ऐसे में उनके पास अपने बोस की हर बात बिना शर्त मानने के सिवाय दूसरा कोई चारा नहीं होता है। इस बात को भली प्रकार समझा जा सकता है. आपको किसी भी समाचार चैनल में वृध्द महिला पत्रकार नहीं मिलेंगी। वहीं विवाहित महिला पत्रकारों को भी या तो नौकरी से निकाल दिया जाता है या  इस कदर दबाव बना दिया जाता है कि वो स्वयं ही नौकरी छोड़  देती है.  

बात समाचार चैनलों में कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं की कर लेते हैं। आपको ये जानकार हैरानी होगी कि सच का साथ देने और क़ानून और न्याय की बडी-बड़ी बातें करने वाले हमारे देश के ज़्यादातर समाचार चैनल इतने गए गुज़रे हैं कि वो अपने कर्मचारियों को आने-जाने के लिए कैब की सुविधा तक उपलब्ध नहीं करवाते हैं। और जिन चंद गिने हुए समाचार चैनलों में कर्मचारियों के लिए ट्रांसपोर्ट सुविधा उपलब्ध है वो लेटलतीफी और लापरवाही के चलते कर्मचारियों के लिए मुसीबत अधिक है सुविधा कम. इतना ही नहीं ये चैनल भी इस सुविधा के बदले पत्रकारों के वेतन में से रकम काट लेते हैं। आम तौर पर किसी भी कंपनी के कैंटीन में कर्मचारियों को रियायती दरों पर भोजन उपलब्ध रहता है, लेकिन आपको ये जानकार हैरानी होगी कि देश के नामी गिरामी समाचार चैनलों के कैंटीन में भी आप को बाज़ार से भी महंगी कीमत पर खाना मिलेगा, जिसकी क्वालिटी पर आपका सवाल उठाना आपको नौकरी से बेदखल करने के लिए काफी है. यही कारण है की फिल्म सिटी में तमाम न्यूज़ चैनलों के कैंटीन होने के बावजूद वहां के पत्रकार बाहर खडे ठेलों पर चाय – नाश्ता और खाना के लिए भीड़ लगाए देखे जा सकते हैं। इसके अलावा किसी भी तरह की कोई सुविधा की कल्पना समाचार चैनलों के ऑफिस में नहीं की जा सकती है.

पत्रकारों को मिलेने वाले किसी भी तरह के वेतन भत्ते और सुविधाओं की बात आप भूल जाईये. क्योंकि यहाँ किसी तरह का महंगाई भत्ता, टीए – डीए, घर की सुविधा देने का रिवाज़ नहीं है. यहाँ तक कि घर खरीदने के लिए बैंक से लोन लेना चाहते हैं तो आपको सैलरी स्लिप भी नहीं मिलती है. यदि आप किसी खबरिया चैनल में नौकरी करते हैं तो यहाँ सिर्फ नौकरी बचाकर रख पाना ही आपका सबसे बडा हुनर है. क्योंकि यहाँ बिना किसी कारण के बिंदास सैंकड़ो पत्रकारों को नौकरी से निकाला जा सकता है. दुनिया को सच दिखाने के लिए आईना लेकर घूमने वाले हमारे खबरिया चैनलों का प्रबंधन पत्रकारों को नौकरी से निष्कासित करने के लिए किसी भी तरह की कानूनी प्रक्रिया का पालन करना ज़रूरी नहीं समझता है. डंके की चोंट पर खबर दिखाने वाले देश के एक बड़े समाचार चैनल ने हाल ही में सैंकड़ों  पत्रकारों को रातों-रात नौकरी से निकाल कर उनके परिवारों को सड़कों पर ला दिया लेकिन  कोई  आवाज़ सुनाई नहीं दी। जबकि जेट एयरवेज़ की मोटी तनख्वाह लेने वाली एयरहोस्टेस को निकाले जाने पर इन्हीं समाचार चैनलों ने हंगामा दिया था. इससे आप देश में पत्रकारों के सम्मान  और इस पेशे में नौकरी की सुरक्षा का अंदाजा लगा सकते हैं.

बात नौकरी में प्रमोशन और वेतन में बढ़ोतरी की करते है. अगर आप ये सोचकर कम वेतन पर किसी खबरिया चैनल की नौकरी स्वीकार कर लेते हैं कि आने वाले वक्त  में प्रबंधन ने  वेतन बढाने वादा किया है तो, आप फिर भूल कर रहे हैं। क्योंकि खबरिया चैनलों का प्रबंधन अपने नियम खुद बनाता है, वो दबंग तो है लेकिन दबंग का सलमान नहीं है, इसलिए वो अपने वादे भी बहूत जल्द भूल जाता है. ऐसा नहीं है कि  खबरिया चैनलों के मैनेजमेंट की याददाश्त कमज़ोर होती है बल्कि वो मौखिक रूप में इतने सारे वादे करने का आदी होता है कि सभी को निभा पाना उसके लिए ज़रूरी नहीं है. और लिखित में तो यहाँ नियुक्ति पत्र भी नहीं दिया जाता. यदि आपके पास इस बात का कोई प्रमाण है कि आप फलां खबरिया चैनल में काम करते हैं तो ये उस चैनल के प्रबंधन की सज्जनता है जिसके लिए आपको उसका आभार मानना चाहिए, यहाँ तो वक्त  पर चैनल खबर के लिए जान देने वाले   रिपोर्टरों को भी पहचानने से इनकार कर देता है. डंके की चोंट पर खबर दिखाने वाले एक खबरिया चैनल ने बीते दिनों खबर के लिए शहीद  हुए अपने रिपोर्टर को काफी हो-हल्ला होने के बाद पहचाना था. फिलहाल उस रिपोर्टर का परिवार किस हाल में है इसकी सुध लेने की कोई कानूनी ज़िम्मेदारी चैनल के प्रबंधन पर नहीं है.

देश में ऐसा कोई वेतन आयोग नहीं है जो समाचार चैनलों में काम करने वाले पत्रकारों के वेतन और प्रमोशन पर निगरानी  रखता हो और अनुशंसा करता हो. ना ही समाचार चैनलों का प्रबंधन ऐसी किसी सिफारिश को मानने के लिए बाध्य है. अगर आप ये सोच रहे हैं कि प्रेस कौंसिल ऑफ़ इण्डिया आपके हितों की रक्षक है तो आप फिर भूल कर रहे हैं  दरअसल ये संस्था हाथी के दांत की तरह है, जो महज़ शोभा के लिए है और शायद कुछ लोगों को रिटायरमेंट के बाद उपकृत करने, सम्मान देने का ज़रिया भर है। क्योंकि पत्रकारों की दशा या पत्रकारिता की दिशा से इसका कोई सारोकार नहीं है. इससे ये साफ़ हो जाता है कि समाचार चैनलों में नियुक्तिके साथ ही वेतन और प्रमोशन का भी कोई आधार नहीं है. प्रबंधन अपनी मर्जी के मुताबिक़ किसी को भी आउट ऑफ़ टार्न प्रमोशन देकर सीधे एडिटर इन चीफ भी बना सकता है, चाहे उस पत्रकार पर अवैध वसूली और भ्रष्टाचार के कितने ही मामले लंबित हों! ज़ाहिर है प्रबंधन उन्हीं लोगों को प्रमोशन दता है जो पत्रकार, प्रबंधन के किसी हित को साधते है, ना कि उन्हें जो वास्तव में डंके की चोंट पर पत्रकारिता करते है.

अब चर्चा देश में चलने वाले खबरिया चैनलों के स्वरूप और उनमें लगने धन  पर भी कर लेते है. देश के नब्बे फीसदे खबरिया चैनल चिट-फंड चलाने वाली कमपनियों और राजनेताओं की निजी संपत्ति हैं। ऐसे में खबरिया चैनलों में काले धन के लगे होने से इनकार नहीं किया जा सकता। बताने की ज़रुरत नहीं कि बीते साल ही करीब दर्जन भर से ज़्यादा समाचार चैनलों में काले धन के लगे होने के मामले सामने आए. और कईं चैनल के मालिकों को जेल की हवा भी खानी पड़ी है. ऐसे में देश में चल रहे चैनलों के मालिकों और प्रबंधन के चरित्र का अंदाजा लगाया जा सकता है. और इस बात को समझा जा सकता है कि  बरसाती मेंढक  की तरह निकल  आये इन खबरिया चैनलों का असली मकसद क्या है? लेकिन ऊंचे रसूख के चलते खबरिया चैनलों में लगे काले धन और यहाँ होने वाले भ्रष्टाचार की कोई चर्चा नहीं होती।

यहाँ सवाल ये भी है जब मीडिया लोकतंत्र का प्रहरी है, तो इस प्रहरी को काले धन के आकाओं, भ्रष्ट कार्पोरेट व्यवस्था और राजनेताओं का नौकर बनाए रखने के पीछे सरकार का असल मकसद क्या है? जो सरकार बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर सकती है, जो सरकार महाराजाओं की तमाम सुविधाएं और भत्ते निरस्त कर सकती है, क्या वो सरकार मीडिया को उसके भ्रष्ट मालिकों के  चुंगल से छुड़ा कर सच्ची आजादी नहीं दिला सकती. बिलकुल वो ऐसा कर सकती है और देश के मीडिया को चाहे तो सरकार सीधे जनता के हाथों में सौंपकर उसे सच्ची आज़ादी दिला सकती है. तमाम चैनलों का भी बैंकों की ही तर्ज़  पर राष्ट्रीयकरण   किया जा सकता है और इनके सम्पादकीय मंडलों को स्वाधीन किया जा सकता है. लेकिन सवाल  मंशा का है और सवाल है राजनीतिक इच्छा शक्ति का. लेकिन इससे भी बडा सवाल ये कि क्या देश के पत्रकार सच में पत्रकारिता को स्वतन्त्र करना चाहते हैं? या उन्हें गुलामी की लत पड़ चुकी है?

विनय 'शास्त्री'

वरिष्ठ पत्रकार

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