टीवी18 ग्रुप से इतनी बडी तादाद में लोगों का जाना तकलीफदेह है : राणा यशवंत

Rana Yashwant :  पिछले 16 साल में यानी जब से नौकरी में हूं- एक दिन के लिए भी बेरोजगार नहीं रहा। लेकिन सैकड़ों दफा नौकरी के लिए सामने बैठे इंसान की आंखों में उसका दर्द देखा है। ज्यादातर वैसे ही लोगों को नौकरी दी जिन्हें बिल्कुल नहीं जानता था। उनमें प्रतिभा दिखी, जिस जगह पर उन्हें रखना है उसके मुताबिक उनमें काबिलियत देखी और अगले कुछ दिनों में ऑफर लेटर थमा दिया। जिस रोज नौकरी के लिए आए थे और जिस दिन ज्वॉयन कर रहे थे- दोनों दिनों के चेहरे का फर्क करीब से देखा-समझा है।

जिनके साथ आप काम करते हैं, उनके साथ अनाम-अबूझ रिश्ता बन जाता है। किसी ना किसी बहाने अक्सर ऐसी कई बातें साझा करते हैं, जिनका नौकरी से कोई रिश्ता नहीं होता। किसी बात पर बेसाख्ता ठहाके लगने लगते हैं, और किसी के साथ कुछ बुरा गुज़रता है तो उसे ये अहसास होता है कि घर से दूर इस बडे शहर में वो अकेला नहीं है। गांव की होली से लेकर नाच तक, स्कूल की शैतानियों से लेकर कॉलेज की आवारगी तक- सब किसी ना किसी वक्त साझा होता रहता है। खबरों की रोज़ रोज़ की लड़ाई और मारकाट के बीच कुछ लोग दांव-पेंच में ज़रुर लगे रहते हैं लेकिन बड़ी आबादी पूरे ईमान और ताकत के साथ मरती खपती रहती है। इस मरने खपने से निजात पाने के लिये कभी सिगरेट की कश तो कभी चाय की चुस्कियों पर तफरीह से तबीयत हल्की कर ली जाती है।

किसी भाई ने कार-ओ-बार के लिये उकसाया तो दफ्तर का काम खत्म होने के बाद रात में किसी अंधेरे, सन्नाटा भरे नुक्कड़ पर अड्डा जम जाता है। ग़म ग़लत होता रहता है। बॉस से लेकर प्रधानमंत्री तक की कुंडली खुल जाती है। जिस किसी की याद आ गई और कभी उसने कुछ खुरपेंची की थी तो वो भले ही खर्राटा मार रहा हो उसकी सात पुश्तों की रात खराब हो जाती है। अगले दिन एक दूसरे का मुंह देखकर बीती रात पर हंस लेते हैं औऱ फिर काम पर लग जाते हैं।

देश के अलग अलग जगहों से सपने लेकर दिल्ली आए नौजवानों की एक बड़ी फौज टीवी न्यूज में काम कर रही है। घर-परिवार की दस जिम्मेदारियों, दफ्तर की परेशानियों, वेतन औऱ खर्च की तनातनी के बीच अपने लिए रास्ता निकालने की जद्दोजहद में दिन रात लगी रहनेवाली ये जमात किसी रहम की नहीं बल्कि हमारे आपके साथ की हकदार है। टीवी18 ग्रुप से इतनी बडी तादाद में लोगों का जाना तकलीफदेह है। हर आदमी अपने अपने तरीके से अपनी बात कह रहा है। मैंने कभी कहने का तरीका अनगढ़, अभद्र या अशिष्ट नहीं रखा लेकिन इतना आज ज़रुर कहूंगा कि ये वक्त हम सबको मिलकर सोचने का है। चुप्पी खतरनाक है। मैं हंगामे की हिमायत नहीं कर रहा लेकिन इससे पहले की वक्त उंगली उठाए, हमें मिलकर उठना चाहिए। बाकी फिर कभी।

राणा यशवंत के एफबी वॉल से. राणा यशवंत आजतक, महुआ न्यूज चैनलों में संपादक के रूप में कार्यरत रहे हैं. इन दिनों इंडिया न्यूज के संपादक हैं.

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