टूजी, कोलगेट, वाड्रा, गडकरी… इनमें से कौन-सी खबर हिंदी अखबारों ने ब्रेक की?

Umesh Chaturvedi : हिंदी के बड़े अखबारों का दावा है कि वे राष्ट्रीय हैं..गाहे-बगाहे एसपी और उदयन को भी याद करते हैं…क्योंकि उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को धार दी। लेकिन क्या कोई हिंदी अखबार यह दावा कर सकता है कि मौजूदा परिदृश्य में भारतीय राजनीति को मथने वाली कोई खबर उन्होंने ब्रेक की…टूजी, कोलगेट, रॉबर्ट वाड्रा, नितिन गडकरी आदि-आदि…

हिंदी पत्रकारिता में इन दिनों लगता है कि सकारात्मकता की बयार बह रही है…नई पीढ़ी..सकारात्मक खबरें…और महज सत्ता के लिए खुशनुमा खबरें लिखने पर जोर है…अगर घोटाले-गड़बड़ियों की खबरें आती हैं भी हैं तो पहले या तो अंग्रेजी अखबारों में या फिर टेलीविजन के स्टिंग ऑपरेशनों में…ऐसा नहीं कि हिंदी के पत्रकारों को यह पता नहीं..लेकिन संपादक नाम की सत्ता शायद वह दम नहीं रहा या फिर उसे भी चारणराग ज्यादा पसंद आ रहा है…शरद द्विवेदी कहा करते थे..हिंदी वाले आने वाले दिनों में जैसी बहे बयार पीठ वैसी कीजै वाली कहावत को चरितार्थ करेंगे…क्या सोचते हैं आप….

    Anil Attri शरद द्विवेदी जी के जैसे लोग अब कहां उमेश जी…
 
    Umesh Chaturvedi फेसबुक पर लिखने में कुछ शब्द कहीं खो जाते हैं…या साया नहीं हो पाते…इसका कोई इलाज है.कोई सुझाएगा इसे एडिट करने का तरीका..कुछ हिंदी संपादकों का शुक्र ..कि उन्हें यह बात इन दिनों छू रही है…
 
    Digvijay Singh asal main hindi channel ho ya paper har jagah Editor sirf malik ke Dusre kaam karwane ke liye rakhe jate hain..
   
    Srijan Shilpi शरद जी बिल्कुल सटीक कहा करते थे। हिन्दी अख़बारों में जो इक्का-दुक्का संपादक बचे हुए हैं, वे भी भीतर से खोखले हैं, दम नहीं है उनमें, हालांकि पाखंड जरूर वे बचाए हुए हैं अपना!
    
    Jai Singh वही जो आपने लिखा है ,सत्य उवाच !

वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से साभार.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *