ट्रेनी-ट्रेनी जपो, चले आएंगे बिहारी…

Jitendra Dixit :  राधे-राधे जपो…. उन दिनों पत्रकार साथी राधे-राधे गुनगुनाते मिलते थे। एक-दूसरे को देखकर यही जपना और फिर खिलखिलाना। बात तब की है जब अमर उजाला हरियाणा, पंजाब, हिमाचल और जम्मू में विस्तार की तैयारी में लगा था। बड़े पैमाने पर पत्रकारों की भर्ती चल रही थी। विस्तार की सभी गतिविधियां मेरठ से ही संचालित हो रहीं थी। तब मेरठ में ही अमर उजाला का कॉरपोरेट आफिस था। दफ्तर में पूरा दिन पूर्वांचल और बिहार के युवाओं का जमावड़ा रहता था। 
लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के दौर चलते रहते थे। भर्ती में सबसे ज्यादा भीड़ बिहारी युवाओं की देखकर संपादकीय विभाग में राधे-राधे जपो चले आएंगे….भजन की पैरोडी तैयार की गयी। सभी साथियों की जुबान पर रहता था- ट्रेनी-ट्रेनी जपो, चले आएंगे बिहारी। आज जन्माष्टमी पर सहज ही यह पैरोडी याद आ गयी। कान्हा परमानंद हैं। उन्हें कभी किसी ने उदास नहीं देखा। प्रतिकूल स्थिति में भी वह खिन्न नहीं हुए। सदा-सर्वदा उनके अधरों पर मनमोहिनी मुस्कान रही। उन्हीं को केंद्र में रखकर प्रकृति का विस्तार हुआ। उनका सानिध्य प्राप्त होने के कारण प्रकृति भी सदा हंसती-खिलखिलाती रहती है। अहंकार मुक्त व्यक्ति जब दूसरों के लिए कुछ करके संतोष की अनुभूति करता है तो उसकी आत्मा श्रीकृष्ण का स्वत: सानिध्य पाकर आनंदित हो उठती है। जब आत्मा इस आनंद का सामीप्य पाती है तो नाना प्रकार की भवबाधाओं से उबरने का मार्ग प्रशस्त होता है। आइए आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर मेरी पोस्ट आपको थोड़ा गुदगुदाए तो सार्थक हो जाएगा लीलानागर हे कृष्ण माधव गोविंद मुरारी को पाने का प्रयत्न। ऊ नमो भगवते बासुदेवाय नम:।
 
मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र दीक्षित के फेसबुक वॉल से.

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