डाक्टरों की गुंडई को अब मिला करारा जवाब, एसएसपी यशस्वी यादव ने किया सराहनीय कार्य

कानपुर : कहते हैं कि वक्त की हर शै गुलाम.. यह जुमला डाक्टरों के उपर देर से ही सही, पर सही उतरा क्योंकि यह शहर बहुत अर्से से डाक्टरों की गुंडई का दंश झेल रहा था लेकिन डाक्टरो की ताकत के आगे हमेशा खाकी घुटने टेकती रही है। अगर शहर के केवल एक ही सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में पिछले तमाम सालों में डाक्टरों द्वारा की गई गुंडई की घटनाओं का जिक्र करें तो इस शहर में डाक्टरों की गुंडई का परिदृश्य स्पष्ट हो जायेगा। हैलट अस्पताल शहर का सबसे बडा़ सरकारी अस्पताल है जहां दूर दूर से लोग इलाज कराने आते हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या गरीबों की होती है जो बड़े बड़े नर्सिंग होम में अपना इलाज नहीं करा सकते। लेकिन इन गरीब और मजलूमों के साथ जिस तरीके से यहां के डाक्टर पेश आते हैं, वह नाकाबिले बर्दाश्त है।

किसी को आपरेशन के नाम पर, किसी को इलाज के नाम पर और किसी को दवा के नाम पर रोज ठगा जाता है। लेकिन हालात का मारा गरीब इन धरती के भगवान कहे जाने वाले डाक्टरों का हर दंश हर शोषण रो रोकर सहता है लेकिन उफ तक नहीं करता। लेकिन हद तो तब हो जाती है जब इलाज की लापरवाही की किसी घटना की शिकायत यदि भूले भटके कोई तीमारदार भी करता है तो उसे भी डाक्टरों की बदसलूकी का शिकार होना पड़ता है। हम अगर पिछले पांच सालों की ही घटनाओं का खुलासा करें तो पायेंगे कि पिछले पांच सालों में तीन दर्जन से अधिक ऐसी घटनायें हुई जिनमें डाक्टरों की लापरवाही से मरीज की हालत खराब होने पर या मृत्यु होने पर तीमारदार और डाक्टरों के बीच घमासान हुआ।

इस घमासान में आधे से अधिक बार तो डाक्टरों और तीमारदारो के बीच सरफुटव्वल का खुला संग्राम हुआ और इन संग्रामों में हर बार डाक्टरों की गुंडई खुलकर सामने आई। पुंखराया के पास गौरीकरण में रहने वाले विवेक पान्डे अपनी मां का इलाज कराने हैलट आये हुए थे। गलत वीगो लग जाने के कारण विवेक की 78 वर्षीय मां के हांथ से खून बहने लगा। जाहिर है कि कोई बेटा अपनी मां का खून नहीं देख सकता। मां के खून को देखकर विवेक ने जरा उंची आवाज में डाक्टर से शिकायत क्या कर दी कि डाक्टर साहिब अपने व्यवसाय की सारी मर्यादाये भूल गये और विवेक को कंटाप रसीद कर दिया। जवान विवेक अचानक हुई अपनी बेईज्जती को बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसने डाक्टर से यह कह दिया कि आपने यह करके ठीक नहीं किया है। बस इतना कहना था कि वो डाक्टर साहिब ने फिर विवेक को थप्पड जड़ दिया। इस बार विवेक से जब न रहा गया और उसने भी डाक्टर को थप्पड़ का जवाब थप्पड़ से देने का प्रयास किया तभी वहां कयामत आ गई।

उस समय वहां उपस्थित वार्ड के सारे वार्ड ब्वाय और नर्से तरन्त इक्टठा हो गये और उन्होने मामले को खत्म कराने का प्रयास नहीं किया बल्कि मामले को और भड़काने का प्रयास किया और आते ही विवेक पर थप्पड और घूंसो की बरसात करना चालू कर दिया। जब तक विवेक सम्हलता तब तक उसे मार मार कर बेदम कर दिया और उसे लाद कर बाहर गैलरी में फिकवा दिया। इस मार में विवेक की आधा दर्जन से अधिक पसलिया टूट गईं और विवेक दर्द के मारे वहीं पड़ा पड़ा चिल्लाता रहा लेकिन किसी ने भी उसका इलाज नहीं किया। मारपीट में एक वार्ड ब्वाय ने उसका मोबाईल तक छीन लिया। बेचारा विवेक फोन करके अपने किसी रिश्तेदार तक को नहीं बुला पाया। काफी देर बार उसने जब एक आदमी से फोन करने की प्रार्थना की तब उसके मोबाईल से विवेक ने अपने घर वालों को इस घटना की जानकारी दी।

विवेक का बडा़ भाई अजीत जो कि पूर्व ग्राम प्रधान है दो दर्जन गांव वालों को लेकर हैलट पहुंचा। उसने जब डाक्टर से थप्पड़ मारने का कारण पूछा तो डाक्टर ने अजीत से भी अभद्रता की लेकिन डाक्टर को इस बात का अंदाज नहीं था कि अजीत के साथ काफी लोग भी हैं। लिहाजा डाक्टर की अभद्रता पर अजीत के सब्र का पैमाना टूट गया और अजीत ने अपने साथ आये हुए सभी लोगों को वहां बुला लिया। थोड़ी देर बाद वह अस्पताल का वार्ड नहीं बल्कि लडाई का मैदान बन गया। डाक्टर ने भी तमाम जूनियर डाक्टरों को वहां बुला लिया और ग्रामीणों और डाक्टरों में जमकर लाठी, डंडे और हाकियां चली। कुछ देर पहले तक दो दर्जन ग्रामीण जो कि डाक्टरों पर भारी पड़ रहे थे डाक्टरों की बडी संख्या के आगे दुम दबाते नजर आये।

एक एक ग्रामीण को चार चार डाक्टरो ने तब तक मारा जब तक वह बेदम नहीं हो गया। ये घटना तो एक बानगी भर है। पिछले पांच सालो में तीन दर्जन से अधिक घटनायें इस बात का सबूत है कि डाक्टर जिन्हे इस धरती का भगवान कहा जाता है अपनी इंसानियत अपना धर्म और अपनी संवेदनशीलता पूरी तरह से भूल चुके हैं। इन डाक्टरों की गुंडई का ये आलम है कि कलम और चिकित्सा के यंत्र चलाने वाले इनके हाथ किसी का सर फोड़ने में भी नहीं झिझकते। यहां तक कि ये खुलेआम पुलिस से भी टकराते है और अजूबा ये कि हर बार पुलिस को ही पीछे हटना पड़ता है। ऐसी ही एक मुठभेड़ में घायल हुए एक दरोगा ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पुलिस इन डाक्टरों की गुंडई बर्दाश्त करने के लिये मजबूर हो गई है क्योकि इलाज में लापरवाही के कारण आये दिन तीमारदारो और डाक्टरों में झगड़ा होता है। पुलिस जब बीच में पड़ती है तो तीमारदार तो डर जाते है लेकिन ये डाक्टर पुलिस से भी भिड़ जाते हैं और उन पर भी हमला कर देते हैं। अगर पुलिस कानूनी कारवाई करने का प्रयास करती है तो फौरन उपर से फोन आ जाता है और पुलिस कोई कानूनी कारवाई नहीं कर पाती। कभी कभी उपर से सरकार भी यदि सख्त कदम उठाना भी चाहती है तो यह ब्रम्हास्त्र चला देते हैं और इनके ब्रम्हास्त्र के आगे सरकार भी घुटने टेंक देती है। इनका ब्रम्हास्त्र यह है कि यह हड़ताल पर बैठ जाते है। इनके हड़ताल पर बैठने से इलाज न मिल पाने के कारण दर्जनो गरीब मरीज मरने लगते हैं जिसके कारण मजबूर होकर सरकार को इन डाक्टरो की गुंडई के आगे नतमस्तक होना पड़ता है।

हर बार यही होता आ रहा है इसलिये इन डाक्टरों की नाफरमानियां इतनी बढ़ गई है कि ये सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी प्राईवेट प्रैक्टिस करते हैं, सरकारी अस्पतालों में भी मरीजों से आपरेशन की फीस वसूलते हैं और विरोध करने पर यह खुलकर मरीजों और तीमारदारों का सर भी फोड़ते हैं। क्या ऐसे डाक्टरों को आम जनमानस इज्जत की नजर से देखेगा। क्या ऐसे डाक्टरों को कोई धरती का भगवान कहेगा। एक न एक दिन पाप का घड़ा भरता ही है और हद होने पर उसके आगे विस्फोट होना तय है। और यही हुआ भी। न जाने कहां से एस0एस0पी0 यादव के अन्दर इतनी हिम्मत आ गई कि उन्होने वो कर दिखाया जो पिछले दर्जनो सालो से कोई एस0एस0पी नहीं कर पाया।
मोटी रकम लेकर फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने के आरोप में जिला अस्पताल उर्सला के चिकित्सा अधीक्षक डा0 शैलेन्द्र तिवारी, ई0एम0ओ0 डा नासिर हुसैन के0पी0एम0 अस्पताल के डा0 डी0के0 श्रीवास्तव और एक वार्ड ब्वाय को गंभीर धाराओ में गिरफ्तार करने के आदेश पर अपनी मुंहर लगा दी। एक चैनल से जुडे पत्रकार विपिन गुप्ता ने फर्जी मेडिको लीगल बनाने के इस फर्जीवाडे का स्टिंग आपरेशन किया था और इसके वीडियो फुटेज एस0एस0पी यशस्वी यादव को दिखाये थे जिसके बाद एस0एस0पी0 यशस्वी यादव ने यह सख्त कारवाई की। इस पुलिसिया कारवाई के बाद शहर के सरकारी अस्पताल के साथ साथ प्राईवेट नर्सिंग होम के डाक्टर भी लामबंद हो गये। भविष्य में अपनी भूल सुधार करने की बात तो दूर है आई0एम0ए0 का एसोसिएशन एस0एस0पी0 का हटवाने के लिये डी0जी0पी0 से लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक गया लेकिन एस0एस0पी0 का बाल बांका तक नहीं कर सका।

वजह एकदम साफ थी क्योंकि सी0डी0 में डाक्टरों की घूसखोरी के पुख्ता प्रमाण थे जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता था। इसीलिये डाक्टरों पर सिसियानी बिल्ली खंबा नोचे वाली बात चरितार्थ हो रही थी। डाक्टर जब एस0एस0पी0 का कुछ नहीं बिगाड पाये तो साफ सुथरी छवि वाले टी0वी0 पत्रकार विपिन गुप्ता के पीछे पड़ गये जिन्होने उक्त सी0डी0 के घूसकांड को अपने चैनल में भी दिखाया था। मेडिको लीगल का यह खेल दरअसल जितनी मोटी रकम उतने गहरे जख्म का खेल है। पैसे के दम पर डाक्टर हल्की चोटो का गहरा और गहरी चोटो को हल्का दिखाने का खेल करते है। सरकार से मोटी मोटी तन्खाहे उठाने वाले और सरकारी रोक के बावजूद धड़ल्ले से प्राईवेट प्रेक्टिश करने वाले ये डाक्टर सफेद को काला और काले को सफेद करने का खेल तो खूब खेलते है लेकिन ये वह कसम भी भूल जाते है जो इन्हें डाक्टर बनने के बाद खिलाई जाती है। कसम में डाक्टरों से कहलावाया जाता है कि मैं अपने कर्तव्य का पालन बड़ी ईमानदारी से करूंगा और गरीब और अमीर के इलाज में कोई भेद नहीं करूंगा लेकिन नोटों की गड्डियों की महक के आगे ये डाक्टर सब भूल जाते हैं। नोटों की महक के आगे इन्हें न ही कोई कसम याद रहती है और न ही गरीबो के आंसू। दरअसल कानून में चोट की प्रवृति ही मुकदमे मे लगाई जाने वाली धाराएं तक करती है। ऐसे में मामूली मारपीट का शिकार व्यक्ति भी चाहता है कि उसके जख्म कुछ ज्यादा ही बढा चढा कर दिखा दिये जाये ताकि वह अपने विरोधी के खिलाफ गंभीर धाराये लगवा सके।  

मेरा दर्द न जाने कोई

हम यहां उन लोगो के दर्द को बयान कर रहें है जो कि डाक्टरो के गलत मेडिको लीगल के शिकार हुए है। हालाकि ऐसे लोगो की संख्या बहुत बडी है जिनमे सबका उल्लेख हमारे लिये प्रकाशित करना संभव नहीं है लेकिन हम यहां कुछ लोगो के उदाहरण दे रहे है जिससे इस खेल की स्याह तस्वीर को समझा जा सकता है।

मनोज मिश्रा

वाई ब्लाक किदवई नगर निवासी मनोज मिश्रा का झगडा प्रमोद कपूर से हो गया था। श्री मिश्रा का गुनाह सर्फ इतना था कि उन्हें यह नहीं अच्छा लगता था कि कोई लड़का लड़की को छेड़े, इसलिये श्री मिश्रा ने प्रमोद कपूर जो कि घर के पास स्थित सुभाष इंटर कालेज में पढता था, को रोका तो करोड़पति बाप की इकलौती संतान प्रमोद उनसे लड़ने लगा इस पर मनोज ने उसका दो चार थप्पड़ जड़ दिये। दोस्तों के सामने हुई बेज्जती को प्रमोद बर्दाश्त नहीं कर पाया और घर से जो हजारों रुपये जेबखर्च के लिये मिलते हैं उसको लेकर पहुंच गया उर्सला के डाक्टर के पास और पैसे के दम पर 324 की रिपोर्ट बनवा कर मनोज के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने थाने पहुंच गया लेकिन मनोज का भाग्य अच्छा था कि क्षेत्र का चौकी इंचार्ज जब जांच करने आया तो वह मनोज का क्लास फेलो निकल आया। उसने अपनी जांच में मेडिको लीगल को फर्जी पाया और मामले को रफा दफा कर दिया।

डा0 जे0एस0 सचान

बर्रा निवासी डाक्टर सचान पेशे से डाक्टर हैं। मालिक इनसे इनकी क्लीनिक खाली कराना चाहता था। डाक्टर सचान की पहचान क्षेत्र में बहुत शरीफ और गरीबो की मदद करने वाले इंसान के रूप में होती है क्योंकि वह गरीबो से अपनी फीस तक नहीं लेते है। डा0 सचान अपने क्लीनिक के लिये कही और जगह देख रहे थे लेकिन उनको जगह मिल नहीं पा रही थी। एक दिन कम पढा लिखा जाहिल मकान मालिक उनसे लड बैठा और अश्लील गालियां देने लगा। क्लीनिक में ही बैठा डा सचान के भतीजे को उसकी गालिया बर्दाश्त नहीं हुई और उसने मकान मालिक को थप्पड जड दिये। मार खाकर खिसियाया हुआ मकान मालिक घर गया और ब्लेड से अपने हांथों से कई जगह अपने शरीर पर जख्म बना लिये और गलत मेडिको लीगल बनवा कर डा सचान के खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दी। डाक्टर सचान को जेल जाना पड़ा जिसकी कसक उनके दिल में आज भी है और एक डाक्टर होने के बावजूद भी वह डाक्टरों के इस गलत मेडिको लीगल खेल की जमकर आलोचना करते है।  

अवनीश तिवारी

बाबूपुरवा कालोनी, किदवई नगर, निवासी अवनीश तिवारी एच ब्लाक किदवई नगर शनिदेव मंदिर के बगल में लगभग 35 वर्षो से चाय का होटल चला रहे है। शनिदेव मंदिर के चढावे की वसूली करने वाला राम किशोर तिवारी जिसने छोटी सी बटिया रखकर बहुत बडी सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया है की नीयत बगल के इस चाय के होटल को भी कब्जियाने की थी इसलिये वह बहुत सालो से अवनीश तिवारी और उनके चाचा दयाराम को होटल खाली करने लिये दबाव बना रहा था

लेकिन वो कामयाब नहीं हो पा रहा था। रात दिन नषे में धुत्त रहने वाला राम किषोर एक दिन नषे में अवनीष तिवारी के होटल पहुंचा और अवनीष से लडने लगा और उनके होटल की ईटे गिरा दी। अवनीष और दयाराम ने जब विरोध किया तो नषे की अधिकता में खुद ही अपना सर फोड लिया और मेडिका लीगल करा लाया। जिस पर दयाराम और अवनीष को जेल की हवा खानी पडी।  

मोहन लाल गुप्ता

घाटमपुर के रहने वाले मोहन लाल का झगड़ा गांव के ही दबंग ठाकुरों से था। वो मोहन लाल की जमीन बंदूक की दम पर जोतते थे। मोहन लाल बनिया थे। पैसे के अकारण नुकसान जब न देख सके तो उन्हाने भी ठाकुरो की इस दबंगई का विरोध किया । ग्रामीणो ने किसी तरह मामले को आगे बढने से रोका। लेकिन पैसे के दम पर उन दबंग ठाकुरो ने गलत मेडिको लीगल कराकर 308 की गंभीर धारा मोहन लाल के उपर लगवा दी और उसे जेल भिजवा दिया। महीने भर बाद बडी मुश्किल से हाईकोर्ट से मोहन लाल छूट पाये लेकिन आठ वर्षो बाद भी आज तक वह जेल जाने की त्रासदी को भुला नहीं पाये है।

कानपुर से मोहित दीक्षित की रिपोर्ट.

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