डा. नूतन ठाकुर ने मुख्‍य सचिव को पत्र लिखकर आईपीएस अधिकारियों के दोहरे रवैये की निंदा की

सेवा में, मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ. विषय- उत्तर प्रदेश में पुलिस विभाग के विभिन्न पदों पर हो रहे भेदभाव विषयक. महोदय, लखनऊ स्थित सामाजिक संस्था इंस्टीट्यूट फोर रिसर्च एंड डोक्युमेंटेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस) मानव अधिकारों और प्रशासनिक सुधार के क्षेत्र में लंबे समय से कार्यरत है. हम इस पत्र के माध्यम से एक महत्वपूर्ण प्रकरण आपके संज्ञान में लाना चाहते हैं.

हम सभी जानते हैं कि गत दिनों कमिश्नर बस्ती एवं एसपी सिद्धार्थनगर के मध्य हुए विवाद हुआ. इस सम्बन्ध में कई सारी घटनाएं घटीं और आईपीएस अफसरों द्वारा आईपीएस एसोशियेशन के माध्यम से अपनी बात बहुत जोर-शोर से कही गयी. इसी बीच कई आईपीएस अधिकारियों ने अपने पद से इस्तीफा तक देने की धमकी दी. इस प्रकार इस्तीफा भेजने वाले आईपीएस अफसरों ने आईपीएस एसोशियेशन को इस्तीफा भेजा और वह भी सशर्त कि यदि उनकी मांगे नहीं मानी गयी तो वे पद से इस्तीफा दे देंगे.

आईआरडीएस इस घटना को आईपीएस अधिकारियों का दोहरा व्यवहार मानती है. संस्था की जानकारी के अनुसार प्रदेश के आईपीएस अफसर उत्तर प्रदेश पुलिस के अराजपत्रित अधिकारियों द्वारा किसी भी प्रकार के संस्था के गठन का विरोध करते हैं. उनके द्वारा कई पुलिस कर्मियों पर पुलिस कर्मचारियों के लिए संस्था बनाने का प्रयास करने पर उनके विरुद्ध आपराधिक मुकदमे दर्ज करा कर उन्हें गिरफ्तार तक कराया गया. संस्था की जानकारी के अनुसार आईपीएस अधिकारी अराजपत्रित अधिकारियों के किसी भी एसोशियेशन के प्रयास पर बहुत तेज नज़र रखते हैं और इंटेलिजेंस विभाग से उसकी निगरानी करवाते हैं. कारण बताते हैं कि ऐसे किसी भी एसोशियेशन से प्रदेश पुलिस में विद्रोह और अशांति की आशंका है.

आईआरडीएस का कहना है कि यदि अराजपत्रित अधिकारियों की संस्था विद्रोह की आशंका मात्र से बनने से रोकी जा रही है तो फिर जो तमाम आईपीएस अधिकारियों ने एक व्यक्तिगत मामले में ठीक चुनाव के अवसर पर इस्तीफे की धमकी दी, क्या उसे पुलिस विद्रोह नहीं माना जाना चाहिए. यह स्पष्टतया आईपीएस अधिकारियों का दोहरा व्यवहार है. यदि प्रदेश पुलिस में अपनी बात रखने और अपना पक्ष प्रस्तुत करने की सबसे अधिक जरूरत किसी को है तो वह पुलिस के निचले श्रेणी के कर्मचारियों को, जिनमे फॉलोवर, आरक्षी, उप-निरीक्षक और निरीक्षक आते हैं. इनसे घंटों ड्यूटी लिया जाता है, इन्हें अकसर अपने जरूरी कामों तक के लिए छुट्टी नहीं मिलती, ये अपने जनपद तो क्या अपने पड़ोस के जनपद तक में तैनात नहीं हो पाते, इनके साथ किसी अभद्रता होने पर ये अपनी बात नहीं रख सकते.

आईआरडीएस का साफ़ मानना है कि यह ना सिर्फ इन सभी अधीनस्थ कर्मियों के मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है बल्कि यह पारदर्शी, निष्पक्ष और बराबरी के नज़रिए से चलने वाले प्रशासन के सिद्धांतों के भी सर्वथा विपरीत है. अब तक इन अधीनस्थ सेवा के लोगों की बात दरकिनार की जाती रही और इस दिशा में थोडा भी प्रयास करने पर उनके विरुद्ध कठोरतम दंडात्मक कार्यवाहियां की गयीं. कई लोग नौकरी से निकाल दिये गए. ऐसे लोगों में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारीगण श्री परशुराम कश्यप, रामलाल गौड़, किशन मुरारी पाल, आरक्षी श्री सुबोध यादव, उप-निरीक्षक श्री अजय कुमार पाण्डेय, आरक्षी श्री बिजेंद्र यादव, आरक्षी श्री नरेन्द्र यादव आदि के विषय में तो संस्था को भी जानकारी है. इसके अलावा श्री परशुराम कश्यप के विरुद्ध मात्र चतुर्थ श्रेणी पुलिस कर्मियों के लिए एसोशियेशन बनाने की मांग करने पर वर्ष 2009 में एक मुक़दमा मु०अ०स० 685/2009 थाना हजरतगंज, जनपद लखनऊ और दूसरा थाना गोमतीनगर में पंजीकृत करा दिया गया एवं उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण संगठन, उ०प्र० से जबरदस्ती “आय से अधिक संपत्ति” की जांच तक शुरू करा दी गयी. कई वर्ष पूर्व 1999 आरक्षी श्री नरेन्द्र यादव के विरुद्ध धारा 4, पुलिस बल (अधिकारों का निर्बंधन) अधिनियम 1966 थाना कैंट, जनपद गोरखपुर में पंजीकृत किया गया, उन्हें इस अपराध में गिरफ्तार किया गया और उनके विरुद्ध रासुका तक में कार्यवाही की गयी. वर्ष 2011 में थाना सिविल लाइन्स, जनपद इलाहाबाद में मु०अ०स० 65/2011 धारा 4, पुलिस बल (अधिकारों का निर्बंधन)  अधिनियम 1966 के अंतर्गत आरक्षी श्री ब्रिजेन्द्र यादव, श्री बलिस्टर राय एवं श्री सुबोध यादव गिरफ्तार किये गए. इसके बाद 2011 थाना कोतवाली जनपद फतेहपुर में श्री ब्रिजेन्द्र सिंह यादव एवं श्री नरेन्द्र सिंह यादव के विरुद्ध इन्ही धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया गया था.

आप भी इस बात को मानेंगे कि इन सभी लोगों का मात्र यही अपराध था कि इन लोगों ने पुलिस बल के अधीनस्थ अधिकारियों के हितों की रक्षा के लिए पुलिस एसोशियेशन की मांग की. वैसे भी यह कोई अनुचित मांग कदापि नहीं थी पर इन्ही आईपीएस अधिकारियों ने निछले श्रेणी के कर्मचारियों पर संगठित होने के अपराध में हर प्रकार का जुल्म किया. अब जब इन आईपीएस अधिकारियों पर बात आई तो उन्होंने पुलिस बल (अधिकारों का निर्बंधन)  अधिनियम 1966 एवं पुलिस बल (इनसाईटमेंट ऑफ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 में वर्णित प्रावधानों का तनिक भी ख्याल नहीं रखा.

आईआरडीएस संस्था इन सभी बातों के दृष्टिगत आपसे यह मांग करती है कि आप प्रशासन के मुखिया के रूप में समान व्यवहार दर्शाते हुए या तो ऊपर वर्णित पूर्व में इस प्रकार से तमाम अराजपत्रित अधिकारियों पर दर्ज किये गए मुकदमे वापस लिए जाने की कार्यवाही प्रारम्भ करें तथा जिन कर्मचारियों को मात्र एसोशियेशन बनाने के प्रयासों पर ही नौकरी से निकाल दिया गया है उन्हें सेवा में वापस लेने की कृपा करें अथवा न्याय के तकाजे  के अनुसार ठीक चुनाव के समय इस्तीफे की मांग रख कर पुलिस बल में विद्रोह की स्थिति पैदा करने वाले इन सभी आईपीएस अधिकारियों पर भी उन्ही कानूनी धाराओं में उतनी ही कठोर कार्यवाही करें जितनी उन लोगों के द्वारा अब तक अधीनस्थ अधिकारियों के विरुद्ध अपनी बात रखने और अपने आप को संगठित करने के प्रयासों के दौरान किया जाता रहा है. साथ ही कृपया इन अधीनस्थ अधिकारियों को अपने लिए भी सेवा संगठन बनाए जाने के विषय में नियमानुसार अनुमति देने पर विचार करने का कष्ट करें. 

डा. नूतन ठाकुर

लखनऊ

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