डा. विजय बहादुर सिंह का भद्र घरों में प्रवेश अशुभ माना जाता था!

सन् 1970 में मैंने बी.एससी. प्रथम वर्ष में विदिशा के सेठ सिताबराय लक्ष्मीचंद जैन महाविद्यालय में प्रवेश लिया था। उन दिनों वहाँ जैन कॉलेज की कई तरह से ख्याति थी। विज्ञान की स्नातकोत्तर कक्षाएँ प्रारंभ हो गई थीं। बहुत से दक्षिण भारतीय विद्यार्थी एम.एससी. में प्रविष्ट हो गए थे। सेठीजी उन दिनों प्राचार्य थे एवं प्रो. नायर विभागाध्यक्ष अँग्रेजी, उप प्राचार्य थे। प्रोफेसर नायर के अँग्रेजी विषय की किसी छात्रा के साथ असफल प्रेम के चर्चे तब जोरों पर थे। नायर साहब दाढ़ी बढ़ाए हुए थे अत: सभी छात्रों का मत था कि यह उसी गम में बढ़ाई गई है।

विदिशा एक छोटा सा कस्बा था सो मानसिकता भी वहाँ की पूरी तरह कस्बाई ही थी। इसलिए कॉलेज के छात्रों में महज दो चीजें चर्चा के केन्द्र में होती थीं। पहली, छात्रों की बदमाशियाँ, गुण्डा गर्दी, लड़कियाँ छेड़ने के किस्से और दूसरे प्रोफेसरों के प्रेम-प्रसंग। जैन कॉलेज में नायर साहब के असफल प्रेम प्रसंग की एवं दो अन्य प्रोफेसरों के रसिक होने की चर्चा अक्सर होती थी। एक थे प्रोफेसर सक्सेना जो रसायन शास्त्र के विभागाध्यक्ष थे, उनकी सूरत दिलीप कुमार से बहुत मिलती थी, वह हेयर स्टाइल भी उसी तरह की रखते थे और कपड़े भी फिल्मी हीरो की तरह ही पहनते थे। दूसरे प्रोफेसर थे डॉ. विजय बहादुर सिंह, जो दुबले-पतले थे, धोती कुर्ता पहनते थे और जिनके बारे में मशहूर था कि वह अपनी शिष्याओं को किसी जादूगर की तरह अपनी ओर आकर्षित कर लेते थे। उनके बारे में यह कहा जाता था कि वह किसी भी लड़की या महिला पर लाइन मार सकते हैं अत: भद्र घरों में उनका प्रवेश अशुभ माना जाता था। अपनी एक शिष्या से उन्होंने दूसरा विवाह रचा लिया था जबकि उनकी पहली पत्नी गाँव में रहती थीं। कहा जाता था कि इस प्रेम प्रसंग में उनकी कई बार पिटाई हो चुकी थी और स्वयं उनकी दूसरी पत्नी ने उन्हें झाड़ू से मारा था जब वह किसी अन्य शिष्या के प्रति आकर्षित हुए थे।

ये सब कहानियाँ उस समय मैंने अपने सहपाठियों, मित्रों और परिचितों से सुनी थीं। इनमें कुछ तथ्य भी था, पूरी तरह झूठ नहीं था। उन्होंने दूसरा विवाह किया हुआ था एवं इतर प्रसंगों के चर्चे शहर में मशहूर थे। बहरहाल वह एक अच्छे प्राध्यापक थे और विदिशा कस्बे के साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल की रीढ़ थे। ऐसा कोई स्तरीय कार्यक्रम विदिशा में नहीं होता था जिसमें डॉ. विजय बहादुर सिंह की हिस्सेदारी, मार्गदर्शन या सहानुभूति न रहती हो। मैंने जैन कॉलेज से बी.एससी. पूरी नहीं की, द्वितीय वर्ष की परीक्षाएँ अध-बीच छोड़ इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए मन बना लिया एवं प्रथम वर्ष में सम्राट अशोक अभियांत्रिकी महाविद्यालय में प्रवेश ले लिया। मैं पंद्रह वर्ष की आयु में ही हायर सेकेण्डरी पास कर चुका था, चूँकि इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए कम से कम सत्रह वर्ष की आयु आवश्यक थी सो दो वर्षों तक जैन कॉलेज में पढ़ा। मेरी अभिरुचि साहित्य में थी अत: बावजूद इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्ययन के साहित्यक-सांस्कृतिक परिवेश से जुड़ा हुआ था। बतौर श्रोता या दर्शक मैं वहाँ ऐसे आयोजनों में अक्सर मौजूद होता था। यद्यपि मैं बहुत संकोची स्वभाव का था इसलिए लोगों से खुलता नहीं था, सिर्फ दो एक मित्रों से ही चर्चा करना और गप लड़ाता अलबत्ता उन दिनों पढ़ता खूब था।

एक बार मित्रों ने मेरा काव्यपाठ एक धर्मशाला में छोटे से कमरे में आयोजित कराया (यह कोई 1974-75 की बात है) उसमें डॉ. साहब को बुलाया गया। मेरे पास करीब दस बारह कविताएँ ही थीं, वही मैंने वहाँ सुनाईं। डॉ. साहब ने बहुत धैर्य और गंभीरता से कविताएँ सुनीं और पहली बात जो कही वह यह कि "आपकी कविताओं पर किसी का प्रभाव नहीं है पर आपकी कविताएँ चूँकि गद्यात्मक हैं इसलिए भाषा का ध्यान रखना जरूरी है।" मैं अत्यधिक संकोची था और आत्मविश्वास मुझमें बहुत कम था अत: जल्दी-जल्दी कविताएँ पढ़ देता था। उन्हें सुनाने की कला और कौशल मुझमें नहीं था श्रोताओं पर उनका वांछित प्रभाव नहीं पड़ता था यह डॉ. साहब ने लक्ष्य किया एवं मुझे बताया। कतई हतोत्साहित किए बिना उन्होंने मुझे कविताएँ लिखते रहने और समकालीन कवियों को पढ़ने की सलाह दी। डॉ. साहब से यही मेरा पहला औपचारिक परिचय था। इसके बाद कभी कहीं चलते-चलाते भेंट हो जाती और क्या कर रहे हैं आजकल, कविताएँ लिख रहे हैं? वगैरह पूछकर वह चल देते। मैं चूँकि वामपंथी विचारों का समर्थक था और डॉ. साहब उन दिनों मुझे काँग्रेसी प्राणी प्रतीत होते थे इसलिए भी मैं उनके प्रति अधिक आकर्षण महसूस नहीं करता था। आपात् काल के बाद एक दिन मुझे यह पता चला कि बाबा नागार्जुन विदिशा आए हैं और डॉ. साहब के यहाँ ठहरे हुए हैं तो मुझमें उत्सुकता पैदा हुई। एक दिन मैंने बाबा को सार्वजनिक वाचनालय के सामने जाते हुए देखा तो उन्हें प्रणाम किया और पूछा कब आए हैं और कहाँ ठहरे हैं? उन्होंने कहा कि डॉ. विजय बहादुर सिंह के यहाँ। मैंने मन ही मन सोचा कि आखिर बाबा इनके यहाँ क्यों ठहरे हैं? क्या कोई वामपंथी-प्रगतिशील रचनाकार विदिशा में नहीं है? बात आई गई हो गई। बाद को डॉ. साहब पहले प्रलेस फिर जलेस में शामिल हुए।

सन् 1978 में बहुत सी हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ छपने लगी थीं, कुछ लघु पत्रिकाओं में तो कुछ व्यवसायिक पत्रिकाओं में भी आईं। "उत्तरार्द्ध" में मेरी एक कविता छपी और साक्षात्कार, कादम्बिनी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका में भी रचनाएँ आईं। एक दिन स्टेशन के बाहर बुक स्टाल से मैं "सारिका" खरीद कर ला रहा था उसमें मेरी एक लघु कथा छपी थी, डॉ. साहब ने मेरी वहाँ भेंट हो गई तो उन्होंने पूछा कि आप अक्सर इसमें रचनाएँ भेजते हैं? मैंने कहा "हाँ दो एक तो छपी हैं पहले भी।" तब वह बोले "लिखते रहिए लगातार।" जब 1979 में मैंने "धरती" की शुरुआत की और वह अंक मैंने डॉ. साहब को भेंट किया तो उन्होंने मुझे सलाह दी कि इसे "नई दुनिया" में भेज दीजिए, सोमदत्त जी पुस्तक समीक्षा लिखते है वहाँ। मैंने वहाँ अंक भेजा तो समीक्षा भी आई। फिर दूसरा अंक निकाला, यह हिन्दी गजल पर केन्द्रित था, डॉ. साहब ने सलाह दी कि इसका विमोचन भाऊ समर्थ से करा लीजिए बहुत अच्छे चित्रकार हैं नागपुर में रहते हैं, उनका हमने व्याख्यान रखा है, यह भी एक काम हो जाएगा। पहली बार भाऊ को देखने और सुनने का अवसर मिला, वह कला पर बहुत अच्छा बोले, पत्रिका का विमोचन भी लगे हाथ हो गया। इससे पहले एक बार शरद जोशी विदिशा आए थे तो मेरे मित्रों की इच्छा को स्वीकार करते हुए उनका व्यंग्यपाठ भी डॉ. साहब ने नगर पालिका वाचनालय के पीछे के कमरे में कराया था।

1980 में मैं विदिशा छोड़कर नांदेड (महाराष्ट्र) आ गया। मैंने महाराष्ट्र राज्य विद्युत मण्डल ज्वाइन किया था। हमारा जोनल ऑफिस नागपुर में था। नागपुर में मेरी भेंट विनायक कराडे से हुई, विदिशा में नरेन्द्र जैन ने उनके बारे में बताया था। कवि अनिल कुमार की स्मृति में वे लोग नागपुर में प्रति वर्ष एक आयोजन करते थे। सन् 1981 में जब आयोजन किया तो मुझे भी उसमें आमंत्रित किया गया। उधर उस आयोजन में डॉ. विजय बहादुर सिंह, नरेन्द्र जैन और बाबा भी आए हुए थे। ये लोग एम.एल.ए. रेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे, मैं वहाँ पहुँचा, विनायक कराडे वहाँ मौजूद थे। उनकी चर्चा में मैं कुछ देर शामिल रहा, वहाँ जनभाषा और जनवादी भाषा की बात हुई। बाबा ने डिप्रेशन और हताशा से लड़ने की टेकनीक बताई। इसके बाद डॉ. साहब ने मुझसे कहा कि आप बाहर टहलिए, हम लोग कुछ विशेष चर्चा करेंगे। मैं बाहर आकर टहलने लगा, मुझे उनका यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा। इस बात पर बाद को दो कविताएं लिखीं जो ऋतुचक्र नामक पत्रिका में छपी। शाम चाय-वाय पीकर उनके साथ बैठा, रात में धनवटे मंच पर बाबा का कविता पाठ था, उनका कविता पाठ का वह अंदाज अद्भुत था, इंदुजी, इंदुजी क्या हुआ आपको —— नाच-नाच कर, ठुमक-ठुमक कर कविता सुनाने का अंदाज काफी प्रभावित करने वाला था। उसमें नरेन्द्र जैन और डॉ. साहब ने भी कविता पाठ किया और मैंने भी। दूसरे दिन मेरे कविता पाठ पर बाबा ने टिप्पणी की कि कविता तो तुम्हारी अच्छी थी पर तुम ठीक से सुना नहीं पाते हो, जल्दी जल्दी पढ़ते हो। धीरे-धीरे, साफ-साफ और आत्मविश्वास के साथ पढ़ो, कविता पाठ का तरीका सीखो।

मैं वापस नांदेड लौट गया। वहाँ से मेरा विदिशा आना-जाना होता था क्योंकि पिताजी विदिशा में ही थे सो वहाँ जाने पर डॉ. साहब से भेंट हो जाती थी। तब वह बताते थे कि आपकी रचनाएँ मैं पत्र-पत्रिकाओं में देखता हूँ अच्छा लगता है। 1982 में मैं नांदेड छोड़ इलाहबाद चला गया। 1983 में मेरा पहला कविता संग्रह "नौ रुपए बीस पैसे के लिए" प्रकाशित हुआ। उसी वर्ष पिताजी को पैरालिसिस का हल्का अटैक हुआ। मैं इलाहबाद से सड़क के रास्ते विदिशा पहुँचा। पिताजी का स्वास्थ्य सुधर रहा था। मैं अपने कविता संग्रह की कुछ प्रतियाँ भी साथ ले आया था। विदिशा में मैंने उसकी एक प्रति डॉ. साहब को भेंट की। उन्होंने कहा ठीक है मैं इसे पढ़ूँगा। तभी मेरे अन्य मित्रों ने मुझे बताया था कि डॉ. साहब नए रचनाकारों को न तो पढते हैं, न उन पर लिखते हैं। मेरी उनसे लिखवाने की कोई इच्छा भी नहीं थी पर वह पढ़ते नहीं हैं यह बात मुझे खली। सन् 1985-86 में जब कानपुर में था तो शील जी से मेरी काफी निकटता थी। विजेन्द्र जी "कृतिओर" का एक अंक समकालीन कविता आलोचना पर केन्द्रित करने जा रहे थे तो उनका पत्र आया कि तुम शील जी पर विस्तार से लिखो। तुम्हारा नाम डॉ. विजय बहादुर सिंह ने सुझाया है, तुम कानपुर में हो इसलिए उन पर अच्छा लिख सकते हो। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ, मैं विजेंद्र जी से भी लम्बे अरसे से परिचित था मगर उन्होंने यह नहीं सोचा। मैंने शील जी पर लिखा और कृतिओर में विजेन्द्र जी ने उसे अच्छी तरह प्रकाशित किया। मैं शील जी पर "धरती" का अंक निकालना चाहता था उसकी तैयारी भी कर रहा था। एक दिन डॉ. साहब को मैंने यह बताया तो उन्होंने पूछा कब तक अंक निकल पायेगा? मैंने संभावित समय बताया, वह बोले तब तो ठीक है बिलासपुर में जलेस का कार्यक्रम हो रहा है वहां रिलीज हो जाएगा। उन्होंने इसकी सूचना भी जारी कर दी पर उस समय वह अंक छप नहीं पाया और बाद में कोटा में डॉ. हेतु भारद्वाज के हाथों और स्वयं शील जी की मौजूदगी में जारी हुआ। डॉ. साहब का सहज व्यवहार उनसे लगातार संबंध बनाए रखने को बाध्य करता रहा। मैं जब भी विदिशा गया, उनसे अवश्य मिला, बातें की और बिना किसी मानसिक दबाव या खिन्नता के वापस लौटा। मैंने उनमें बनावटीपन कभी नहीं पाया।

1990 में मैं एक बार कोटा से विदिशा आया तब उनसे मिलने उनके घर गया। वहाँ भाई वेणु गोपाल से मेरी भेंट हुई और उनसे व्यक्ति तथा समाज विषय पर घोर चर्चा हुई। इसके बाद पाँच छह वर्षों तक डॉ. साहब से भेंट नहीं हुई, कभी-कभी फोन पर मैं बात कर लेता था। 1997 में मुझे दो तीन बार काम के सिलसिले में भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स, भोपाल आना पड़ा। तीन चार दिन रुकना था, बीच में एक दिन रविवार था सो मैं फोन करके विदिशा पहुँच गया और एक दिन उन्हीं के यहाँ रहा। उस दिन उन्होंने खुलकर प्रेम संबंधों पर चर्चा की, हालांकि मैंने उनके तर्कों को नैतिकता के आधार पर सही नहीं माना और उन्होंने यह कहा कि आप प्रेम को समझते नहीं हो पर वह असहज नहीं हुए और मैं भी उनके प्रति सहज भाव से ही वापस हुआ, यह सोचते हुए कि इस मामले में इनसे और तो कुछ अपेक्षा नहीं की जा सकती। उसके बाद जब दो बार मैं फिर भोपाल आया तो विदिशा नहीं जा सकता था क्योंकि मेरे पास समय नहीं था। अत: स्वयं डॉ. साहब विदिशा से भोपाल मिलने आ गए बात चीत हुई और एम.पी.नगर में मनोहर चौरे सम्पादक-"शिखर वार्ता" से मेरा परिचय कराया। 1998 में मैं फरीदाबाद से स्थानांतरित होकर नागपुर और फिर भद्रावती पहुँचा। सन् 2000 में मैं लखनऊ से साझा सांस्कृतिक अभियान की बैठक से वापस लौट रहा था, मेरे साथ नागपुर के मेरे अन्य साथी भी थे। झांसी स्टेशन पर मैं ट्रेन से उतरा शायद खाने के लिए कुछ ले रहा था, सम्भवत: मीठा दही, तभी मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखकर पूछा "कहाँ से आ रहे हैं?" मैंने पलटकर देखा तो सर घुटाए डॉ. साहब खड़े थे, शायद गाँव में कोई मृत्यु हो गई थी। विगत दो ढाई वर्षों में जब भी भोपाल गया और डॉ. साहब नागपुर आए तो साहित्य, राजनीति, और साहित्य की पॉलिमिक्स पर चर्चा होती रही। उन दिनों वह स्व. भवानी प्रसाद मिस्र ग्रंथावली पर काम कर रहे थे, ध्यातव्य है कि भवानी भाई और बाबा नागार्जुन उनके प्रिय कवि रहे हैं। गत दिनों मैं भोपाल गया तो डॉ. साहब मुझे विदिशा ले गए। उनकी कार का स्टीयरिंग मैंने संभाल लिया और रास्ते भर विविध विषयों पर बातें होती रहीं। इन दिनों वह दुष्यंत कुमार ग्रंथावली पर कार्यरत थे।

विदिशा में एक विवाह में शामिल होने के बाद वह ट्रांसपोर्ट के व्यवसायी अमर सिंह वधान के यहाँ मुझे ले गए। वहाँ वधान जी ने जब एक बात में प्रेमचंद की कहानी का उल्लेख किया तो वह मुझसे मुखातिब हो बोले "इसीलिए मैं इनके पास आता हूँ वधान जी कोई मामूली आदमी थोडी हैं।" फिर स्व. गंगा प्रसाद पाठक ट्रस्ट का हिसाब एक बिजली के सामान के व्यवसायी के यहाँ करते हुए शाम को मेरे अपने पुराने कॉलेज एस.ए.टी.आई. से होकर हम फोटोग्राफर मित्र शरद श्रीवास्तव के यहाँ गए, अपनी किसी किताब के मुखपृष्ठ के लिए डॉ. साहब ने उनसे छायाचित्र लिया। वहाँ नरेन्द्र जैन भी आ गए फोन पर उन्हें सूचना दे दी थी। वहीं हमने रात्रि भोज किया जो शरद जी और उनके चिरंजीव ने तैयार किया था। नरेन्द्र की कविताएं सुनी और फिर भोपाल रवाना हुए।

हमारे कुछ मित्रों ने मिलकर एक अखिल भारतीय सांस्कृतिक मंच "विकल्प" का गठन किया है। उसकी एक बैठक भोपाल में भी रखी गई, उसमें भोपाल के नामी साहित्यकार, बावजूद आश्वासनों के नहीं पहुँचे पर डॉ. साहब महज मेरे एक फोन करने पर उसमें उपस्थित हुए और अपना वक्तव्य भी दिया। मेरे कविता संग्रह "श्वेतपत्र" के विमोचन के अवसर पर भी जो विदिशा के प्रकाशक जगदीश श्रीवास्तव ने छापा था, उन्होंने मेरी काव्य भाषा पर बेलाग टिप्पणी की। यद्यपि श्री अक्षय कुमार जैन, शशांक एवं अन्य साहित्यिक मित्रों ने उनकी बात से असहमति जताई पर डॉ. साहब ने फिर भी स्पष्टता से अपनी बात रखी। व्यवहारिक, स्पष्ट वक्ता तथा एक उत्कट प्रेमी और नई पीढ़ी के साहित्य को बहुत तबज्जो न देने वाले डॉ. विजय बहादुर सिंह, हिन्दी साहित्य, संस्कृति और समाज में अपना एक अलग स्थान रखते हैं। उन्हें अपने चारित्रिक विवाद को हवा देने में न केवल विशेष आनंद आता है बल्कि और लोगों के मुख से भी वे यह सब सुनकर आनंदित होते पाए जाते हैं।

शैलेंद्र चौहान

shailendrachau@gmail.com

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