डिकी के जाने से वाकई गरीब हो गई क्रिकेट पत्रकारिता

Padampati Sharma : सुबह की शुरुआत दिल तोड़ने वाली मनहूस खबर के साथ हुई. साढ़े आठ के लाइव शो के लिए हर दिन की तरह चैनल जा रहा था और रास्ते में नेट पर यह खबर पढ़ कर सन्न रह गया- डिकी रुत्‍नागर नहीं रहे- शूल की माफिक चुभ गईं ये पंक्तियां. आज की पीढ़ी यह पढ़ कर चौंक रही होगी- यह डिकी कौन …!! सोच कहीं से अस्वा्भाविक भी नहीं, क्योंकि किसी भी देश की याददाश्त बहुत कमजोर होती है न.

महान क्रिकट पत्रकार, समीक्षक, स्त्म्भकार डिकी रुत्‍नागर मेरे उन चुनिंदा के एन प्रभु, एनएस रामस्वामी, राजनबाला, किशोर भिमानी जैसे गुरुओं मे एक रहे हैं, जिनको पढ़ कर ही मैंने क्रिकेट लेखन का न सिर्फ ककहरा सीखा वरन कैरियर के आरंभिक वर्षों मे क्रिकेट सिरीज के दौरान उन सभी का मुझे अनमोल सानिध्य भी मिला. प्रभु के लेखन का लालित्य, राजनाबाला की बेजोड़ तकनीकी दक्षता, रामस्वामी का खेल के उतार-चढ़ाव का सजीव वर्णन और गज्जू भाई डिकी रुत्‍नागर की लाजवाब टूर डायरियां मेरे लिए सचमुच किसी थाती से कम नहीं रही हैं. साठ के दशक में इतना भर ही जानता था कि क्रिकेट के पुरोधा सर डोनाल्ड ब्रैडमन एडीलेड में रहते हैं पर यह डिकी थे कि मेरे जैसे स्कूली छात्र को यह जानकारी मिली कि यह शहर हरे भरे बाग-बगीचों और उद्दानों के लिए सुनाम है.

पारसी परिवार में भारत में जन्मे मगर छठे दशक के मध्य मे ही इंग्लैड में जा बसे डिकी से मेरी पहली मुलाकात फैसलाबाद (पाकिस्तान) में 1978 में भारत-पाक टेस्ट मैच की पूर्व संध्या पर हुई थी जब प्रभु ने मेरा यह परिचय देते हुए मिलवाया, मीट ग्रेट बनारसी पंडा….व्हाट पंडा… तब उन्हें प्रभु ने बतलाया… और फिर जम कर ठहाके लगे. उम्र का लम्बा फासला भी हमारी दोस्ती में बाधा नहीं बना. कवरेज के दौरान पिच कंडीशन, मैदान, मौसम और खिलाड़ी विशेष की विस्तृत जानकारी के बारे में डिकी चलता फिरता शब्दकोष थे. माफ कीजिए उस जमाने में न तो इंटरनेट था और न ही गुगल बाबा कि पल भर मे ही मनचाही जानकारी हाजिर. तब डिकी जैसे महानुभाव मेरे जैसे नौसिखिए के लिए ही ज्ञान के सागर थे.
    
दोहरा बदन, पहली नजर में गौरांग प्रभुओं जैसे दिखने वाले डिकी गुजराती एसेंट की हिंदी से ही भारतीय होने का अहसास करा पाते थे. विदेश यात्राओं के दौरान बिताई कुछ यादागार शामें फिर से आंखों के सामने कौंधने लगी. याद आ रही है लाहौर हवाई अड्डे पर भारत वापसी के पहले पुलिस रिपोर्टिंग के चक्कर में टाइगर पटौदी सहित हम सभी भारतीय पत्रकार जब हिरासत में ले लिए गए तब यह डिकी ही थे कि जिन्होंने लाहौर के तत्कालीन डीआईजी से, जो पाकिस्तान के जाने माने तेज गेंदबाज रह चुके थे, सम्पर्क साधा और हमें भारी मुसीबत में पड़ने से बचाया.
    
अंतिम बार डिकी से 1999 में भारत-पाक के बीच खेले गए दूसरे टेस्ट के दौरान फिरोजशाह कोटला मैदान में मुलाकात हुई थी. क्रिकेट के अलावा स्क्वाश और बैडमिंटन पर भी समान अधिकार से लेखनी चलाने वाले डिकी उस समय काफी उदास और बुझे बुझे से दिखे. चेहरे पर हमेशा तैरने वाली मुस्कान नदारत थी. उस समय लंदन के जाने माने दैनिक गार्जियन के लिए कवर कर रहे डिकी ने भरी आंखों से मुझसे कहा था, ''पदम, अब मै बूढ़ा हो गया''. '' डिकी तुम सौ साल पूरे करके ही मरोगे''. मगर अफसोस…. कि मेरा यह फ्रेंड, फिलास्पर, गाइड 82 की उम्र में लंदन में हम सभी को हमेशा के लिए अलविदा कह गया… मेरी भविष्यवाणी से 18 बरस पहले वह चला गया. क्रिकेट लेखन के पुराने स्कूल के इस छात्र के जाने से भारतीय खेल पत्रकारिता वाकई कितनी गरीब हो गयी…., यह बताने की जरूरत नहीं. आमीन.

वरिष्‍ठ खेल पत्रकार पदमपति शर्मा के एफबी वॉल से साभार.

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