ढाब का मर्सियाः नाही हमरो कोई सहाय

वाराणसी। बाढ़ के चलते पूरी दुनिया से कटा ढाब क्षेत्र के 7 गांव की 40 हजार आबादी आजकल यही मर्सिया पढ़ रही है। न तो इनकी कोई सुनने वाला है और न ही इन्हें किसी भी तरह की अब तक कोई मदद पहुंची है। इसे कहते हैं दोहरी मार, कुदरत के निजाम की मार से बेहाल ढाब क्षेत्र के रेतापार मुस्तफाबाद के जनता सरकारी निजाम की भी मार झेलने के लिए अभिशप्त दिख रही है। बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित ढाब इलाके के दलित आबादी वाले इस गांव में अब तक सरकारी अफसरानों को झाकने तक की फुरसत तक नहीं मिली हैं।
1800 की आबादी वाले इस गांव में रहने वाले अधिकांश लोग खेत मजदूर है। बाढ़ के सात दिन बाद भी यहां किसी भी तरह की कोई मदद नहीं पहुंची है। चारो तरफ पानी से घिर जाने के चलते ये गांव टापू सा नजर आ रहा हैं। गावं के रहने वाले पंचम, पारस, बाबू लाल मदद की आस लगाए बैठे है। खेत मजदूर का काम करने वाले इन लोगो का कहना था कि जो था गंगा मैया ले गई अब तो रोटी को कोई जरिया नजर नहीं आ रहा है। भुल्लन हरिजन का घर बाढ़ के चलते ढह गया है। घर के नाम पर अब समतल जमीन है। अपने परिवार के साथ गांव के ही बुल्लू राम के घर पनाह लिए भुल्लन की सबसे बड़ी चिंता सिर पर छत को लेकर है।
 
ऐसे बहुतेरे यहां आपको मिल जाएंगे जिनके घर-बार, रोजी-रोजगार और सपने सब कुछ बाढ़ के पानी में डूब गया है। इंसान ही नहीं यहां मवेशियों की हालत खराब है। बीमार पशुओं के इलाज के नाम पर पशु चिकित्सक यहां के लोगो को बाजार से दवाई खरीदने के लिए पर्चा थमा रहे है। यहां की आबादी में बच्चें भी है जिन्हें दूध नहीं मिल पा रहा है। मदद के लिए हर पल बाट जोह रही यहां की जनता खबरों से गायब है। जनप्रतिनिधियों को कोई अता-पता नहीं है। वैसे भी ये मौसम चुनाव का है नहीं सो वो भी गायाब है। हैरत की बात तो ये है कि बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र की ओर प्रषासन ने भी नजर फेर रखी है।


 


… समंदर सा नजर आ रहा है ढाब का ये इलाका

 
वाराणसी। बाढ़ की विभीषिका को झेल रहा ढाब का ये इलाका संमदर सा नजर आ रहा है। यहां नजर जितनी दूर तक जा रही है। पानी का अथाह सागर ही नजर आ रहा है। ढाब के इलाके में आने वाले गांव मुस्तफाबाद, रामचन्दीपुर, गोबराहा, रामपुर, मोकलपुर, चांदपुर और छितौड़ा की हालत बद से बदतर है। बाहर की दुनियां से इन गांवों को सर्म्पक कट चुका है। गांवों में हजारों की संख्या में लोग बिना किसी मदद के भगवान भरोसे अपने दिन काट रहे है।
 
जनप्रतिनिधियों का भी कोई पता नहीं
 
वाराणसी। सियासत में इंसान की कीमत एक वोट से ज्यादा शायद और कुछ नहीं होती। मुस्तफाबाद इसका जीता-जागता उदाहरण है।  इलाके के सांसद और विधायक के दर्शन  तक यहां के लोगों को नहीं हुए हैं। गांव के ही सुभाष, भोले का कहना है कि कोई नहीं आया अब तक, उन्हें हम से कोई मतलब नहीं। गांव के लोग ही इस संकट में एक दूसरे के मददगार बने हुए है।
 
वाराणसी से भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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