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तरुण तेजपाल की तरह फाल्स ‘गॉड फादर’ पत्रकार नहीं थे अरुण शौरी

शंभूनाथ शुक्ल : एक खोजी पत्रकार थे अरुण। और अब ये तरुण! चौथे खंभे के स्तंभ थे अरुण शौरी न कि ये तरुण तेजपाल… १९८० में कानपुर में दैनिक जागरण ज्वाइन करने के कुछ ही महीनों बाद मुझे "आंख फोड़ो" कांड कवर करने के लिए भागलपुर भेजा गया। साथ में फोटोग्राफर रामकुमार सिंह थे। सुबह चार बजे हम विक्रमशिला एक्सप्रेस से निकले और शाम करीब सात बजे भागलपुर पहुंचे। वहां के एकमात्र होटल नीलम होटल में हम रुके। होटल का रजिस्टर भरते हुए मुझे ठीक ऊपर अरुण शौरी का नाम दर्ज दिखा। मैने पूछा कि क्या अरुण शौरी यहीं रुके हैं। वहां बैठे युवक ने बताया कि जी अभी दोपहर को आए हैं।

शंभूनाथ शुक्ल : एक खोजी पत्रकार थे अरुण। और अब ये तरुण! चौथे खंभे के स्तंभ थे अरुण शौरी न कि ये तरुण तेजपाल… १९८० में कानपुर में दैनिक जागरण ज्वाइन करने के कुछ ही महीनों बाद मुझे "आंख फोड़ो" कांड कवर करने के लिए भागलपुर भेजा गया। साथ में फोटोग्राफर रामकुमार सिंह थे। सुबह चार बजे हम विक्रमशिला एक्सप्रेस से निकले और शाम करीब सात बजे भागलपुर पहुंचे। वहां के एकमात्र होटल नीलम होटल में हम रुके। होटल का रजिस्टर भरते हुए मुझे ठीक ऊपर अरुण शौरी का नाम दर्ज दिखा। मैने पूछा कि क्या अरुण शौरी यहीं रुके हैं। वहां बैठे युवक ने बताया कि जी अभी दोपहर को आए हैं।

मैंने फटाफट रजिस्टर की खानपूरी पूरी की और रामकुमार को कमरे की चाभी देकर अरुण शौरी के कमरे की तरफ लपका। वे मिल भी गए और मिले भी बड़ी शालीनता से। मैंने कहा कि सर आप अकेले अंग्रेजी पत्रकार हैं जिन्हें हिंदी बेल्ट के गांवों का बच्चा-बच्चा जानता है। अरुण शौरी ने पूछा कि कैसे? मैने उन्हें बताया कि मैं जिस अखबार में हूं वह इंडियन एक्सप्रेस में छपी आपकी रपटों का अनुवाद नियमित छापता है इस कारण। शौरी साहब ने पूछा कि हिंदी पट्टी के लोग मेरी रपटों को किस तरह लेते हैं?

मैंने कहा कि उनका कहना है कि पत्रकार तो बस अरुण शौरी ही हैं जो हिम्मत के साथ लिखता है और जिसके लिखने से सरकारें डरती हैं, इंदिरा गांधी डरती है। बाद के दिनों में जब मैने इंडियन एक्सप्रेस के हिंदी अखबार जनसत्ता को ज्वाइन किया तब तक अरुण शौरी टाइम्स आफ इंडिया में जा चुके थे पर कुछ ही साल बाद वे फिर से इंडियन एक्सप्रेस में आ गए। मैं एक दिन उनसे मिला और उनको भागलपुर की याद दिलाई तब तो अरुण शौरी इतने खुश हुए कि अपने हर लिखे को जनसत्ता में छपवाने के लिए मुझसे ही कहते। और यह आग्रह भी करते कि उनके लेखों का अनुवाद भी मैं ही करूं।

अब यह न तो जनसत्ता के लोगों को अच्छा लगता कि इंडियन एक्सप्रेस का चीफ एडिटर जनसत्ता के चीफ सब एडिटर के पास आ कर मनुहार करे न इंडियन एक्सप्रेस के लोगों को पसंद आता। मगर अरुण शौरी का अपना तरीका जो था। वे कोई तरुण तेजपाल की तरह फाल्स "गॉड फादर" पत्रकार नहीं थे और आज भी नहीं हैं। मंत्री बनने के बाद आईआईटी कानपुर ने उन्हें बुलाया (तब मैं कानपुर में अमर उजाला का संपादक था) तो मैने उनसे मिलने के लिए समय मांगा। लेकिन वे बोले नहीं मैं तुम्हारे घर आता हूं। एक सामान्य हिंदी संपादक के घर का दारिद्रय देखकर वे बोले कि जमीन के पत्रकार तो तुम ही लोग हो।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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