तरूण तेजपाल, सेक्स, चारा घोटाला और नैतिकता

भारतीय पत्रकारिता में खोजी पत्रकारिता को नये आयाम देने वाले तहलका के संपादक तरुण तेजपाल के उपर यौन शोषण का मामला जिसमें उन्होंने आगे बढकर अपना गुनाह कबूल कर लिया है, लगता है चारा घोटाला से इस मामले का कनेक्शन है। ऐसा लगना इसलिए क्योंकि इस पूरे मामले में 'बिहार' शामिल है। हाल ही में तहलका ने चारा घोटाले के मामले में अपनी रिपोर्ट के माध्यम से लगभग यह साबित ही कर दिया है कि लालू प्रसाद को इस मामले में राजनीतिक कारणों से फंसाया गया है।
 
अब बात उस क्राइम की जिसे खुद तरूण तेजपाल ने पूरी ईमानदारी से स्वीकारा है और खुद को सजा भी दे दी। तहलका की मैनेजिंग एडिटर शोमा चौधरी के अनुसार पीड़िता ने तेजपाल को उनके द्वारा माफी मांगे जाने के बाद माफ़ भी कर दिया है। लेकिन जरा ठहरिये। क्या तरूण तेजपाल ने सचमुच कोई क्राइम किया?
 
जिन्हें चंडूखानों (हाई फ़ाई प्रेस क्लबों) और मीडिया जगत की फ़ाइव एवं सेवेन स्टार पार्टियों का अनुभव नहीं हो, उनके लिए तो निश्चित तौर पर यह सब पाप सा लगेगा। लेकिन जिन्हें अनुभव है या यूं कहिए कि जो चढंती रात के साथ जवानी का आनंद ले चुके हैं, उनके लिए यह पाप कहां होता है। मीडिया जगत में महिलाओं का यौन उत्पीड़न कोई नई बात नहीं है। अगर प्रबंधन और समाज मीडिया जगत की महिलाओं को संपूर्ण सुरक्षा की गारंटी दे तो यह दावा किया जा सकता है कि भारत के सभी मीडिया के दफ़्तरों में बड़ी संख्या में पुरुष पत्रकार जेल की सलाखों के पीछे होंगे।
 
पत्रकारों की छोड़िये। सोचिए सुप्रीम कोर्ट के उस जज के बारे में। एक महिला वकील ने आरोप लगाया कि एक सेवानिवृत जज ने उसका यौन शोषण किया। मीडिया वालों को तरूण तेजपाल पर गर्व होना चाहिए कि तरूण ने आगे बढकर समाज के सामने सार्वजनिक रुप से इस बात को स्वीकारा और माफ़ी मांगी। अगर तरूण ने यह नैतिक साहस नहीं किया होता तो जरा सोचिए क्या होता। क्या भारत की जनता कभी जान पाती कि किस पत्रकार ने किस महिला का यौन शोषण किया। इन्क्वायरी होती और मामला दबा दिया जाता जैसा कि आज उस जज के मामले में किया जा रहा है। तरूण तेजपाल ने तो कानून को आईना दिखाया है। उन्होंने खुद अपना गुनाह कबूला, माफ़ी मांगी और खुद को सजा दी।
 
निश्चित तौर पर तरूण तेजपाल ने जो क्राइम किया है, उसके लिए उन्हें सजा दी जानी चाहिए। लेकिन क्या भारत की न्यायिक व्यवस्था कारगर है जो यह साबित कर दे कि हां तरूण तेजपाल ने महिला के साथ जबरदस्ती की और जबरदस्ती की परिभाषा क्या है। जबकि यह सब जानते हैं और मानते भी हैं कि शार्टकट तरीके से सफ़लता पाने का कोई और विकल्प नहीं होता। फ़िर चाहे वह राजनीति हो, सिनेमा जगत हो या कालेजों और विश्वविद्यालयों में पीएचडी हासिल करने का मामला या फ़िर पत्रकारिता, कौन सा ऐसा बौद्धिक कार्यक्षेत्र शेष है जहां सेक्स इस्तेमाल नहीं किया जाता है। यह हमारे समाज का हिस्सा बन चुका है।
 
बहरहाल, तरूण तेजपाल ने साबित कर दिया है कि उनके पास भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद से अधिक नैतिक बल है। राजेंद्र बाबू की कहानी उनकी एक स्टेनो ने एक किताब के रुप में 70 के दशक में सार्वजनिक कूी थी जिसका शीर्षक था “100 लेटर्स”। आज तक यह किताब एक रहस्य ही है कि आखिर जितनी किताबें छापी गयी थीं, वे कहां गयीं? राजेंद्र बाबू ने तो कभी इस सत्य को नहीं स्वीकारा था।  
 
लेखक नवल कुमार बिहार केंद्रित न्यूज पोर्टल 'अपना बिहार डॉट ओआरजी' के संपादक हैं. इनसे संपर्क nawal.buildindia@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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