‘तहलका’ में कार्यरत दो मीडियाकर्मियों के कुछ बयान…

'तहलका' ने मीडिया में नए मानक कायम किए. साहस व सरोकार की पत्रकारिता को नई उंचाई दी. पर अपने संस्थापक के एक गलत आचरण के कारण कई कारपोरेट मीडिया हाउसेज और 'तहलका' की पत्रकारिता से आहत कुछ घटिया राजनीतिक ताकतें मिल कर 'तहलका' नामक संस्थान को ही नष्ट, बदनाम और बर्बाद करने पर तुली हैं. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि 'तहलका' में कार्यरत कुछ मीडियाकर्मियों के बयानों को सामने लाया जाए कि वो पूरे मामले को कैसे देखते व किस तरह सोचते हैं. विकास कुमार तहलका के शानदार फोटो जर्नलिस्ट हैं. प्रियंका दुबे तहलका की तेजतर्रार रिपोर्टर हैं. दोनों के फेसबुक वॉल से कुछ बयान यहां प्रकाशित किए जा रहे हैं…

Vikas Kumar : हमको गर्व है कि हम तरूण तेजपाल के साथ काम करते हुए पत्रकारिता कर रहे हैं. जिसने अगर एक गलती की तो वो उस गलती की सजा भुगतने के लिए तैयार है. वो आपकी तरह भागने वालों में से और जरुरत पड़ने पर मालिक के तलवे में आरती गाने वालों में से नहीं है. आपमे और तरूण में जमीन-आसमान का फर्क है. वो सजा भुगतने की हिम्मत रखता है और भाग जाने वालों में से हैं. हट भगोड़े कहीं के…..

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Vikas Kumar : एक संपादक हैं. सामाजिक न्याय की गीत गाते रहते हैं. जब दिल्ली से तीन सौ पत्रकारों को हटया गया था तब उनके मुंह एक किलो दही जमा था. जब राजेंद्र यादव का प्रकरण हुआ था तो उन्होंने राजेंद्र यादव को प्रमाणपत्र दिया था कि वो ऐसा कर ही नहीं सकते. लेकिन आज तरुण वाले मामले में वो न्याय के लिए लड़ते हुए लिखते पाए जा रहे हैं. अच्छी बात है. लड़िए….लेकिन एक जगह इस राह से और दूसरी जगह उस राह से कैसे चलिएगा. कैसे चलने दिया जएगा आपको, अपनी सुविधा से. बोलने की ताकत है तो हर मुद्दे पर बोलिए….कुछ पर चुप्पी और कुछ पर उछलकुद न चलवे लंपादक जी….ई न चलवे.

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Vikas Kumar : हम साफ कर दें कि इस मामले में जो दोषी है उसे सजा मिलनी चाहिए. लेकिन हम यहां उन संपादकों को अब और नहीं बोलने देंगे जो कुछ मामलों में दुम सटका के भाग लेते हैं तो कुछ मामलों में भौं-भौं करने लगते हैं. और एक बात फिर से मुझे गर्व है कि मैं तहलका में हूं. और तरूण तेजपाल के अंदर हूं. ऐसा इसलिए कि इस आदमी में अपनी गलती मानने और मुसीबत को सामने से फेस करने की ताकत है. ये भागा नहीं है. और न ही ज़ी न्यूज के संपादक की तरह टीवी पर पकड़े जाने के बाद भी यह कहता फिर रहा है कि नहीं मैंने ऐसा नहीं किया. इस आदमी में मुसीबत को सामने से फेस करने की ताकत है. आप फिलहाल ऐसा कीजिए कि अपने अंदर देखिए, की आपमें कुछ है भी या आप अंदर से बिल्कुल खोखले हैं.

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Priyanka Dubey : And the 24 hour coverage on all 84 channels, and the 8 column long banner headlines letting all the juiciest details up for pubic consumption does not surprises – No wonder- the one person who is being betrayed the most in this whole media witch hunt is the one on whose name the whole movement of justice has started. She is ready to co-operate with the police, the accused is ready to co-operate. Nobody is running away. But the media witch-hunt can't wait for the legal proceedings to carry on and law to take its own course. Nobody is ready to wait for a trial to take place. Everybody just wants to see a immediate public execution- with stones in their mouth. And all this is being done on the injury of a woman. Nothing can be sadder.

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Priyanka Dubey : In my almost 4 years of working in Tehelka- I never faced any kind of implicit or explicit harassment. The woman is my friend. My first and strongest sentiment is with her– and ONLY BECAUSE OF THIS REASON-i am replying to you. I think there was a media storm since last night and a delay in a proper response. And this give ample opportunity to people rotting in historical venom against this organization to come up with false posts like the above one. I was in that meeting and nothing like this was ever uttered. The word 'rant' was never used. I feel sad about the fact that how such senior journalists are stooping down to the levels of involving themselves in such hate campaigns by posting hearsay- and feeding themselves on a woman's plight. What happened to her is devastating for all of us but they way these senior journalists are feeding their voyeuristic imaginations out of this is equally wrong. And you can read in the link above—-if you want to—after dropping the stones—what the management is doing !

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