ताकि कल कोई और डिंपल घुट-घुट कर मरने को विवश न हो

यशवंत जी, मै डिंपल विपिन मिश्रा उल्हास नगर जिला ठाणे महाराष्ट्र में रहती हूं। मूलतः मैं चौबेपुर वाराणसी की रहने वाली हूं। मेरे पिताजी स्वर्गीय बलवंत मिश्रा मुंबई के एक काटन मिल में काम करते थे। लिहाजा मैं सपरिवार मुंबई रहती थी। मेरे पिताजी के दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं। मैं छोटी थी। मेरी बड़ी बहन की मौत गाँव में ही संदिग्ध अवस्था में हो गयी थी। इसके बाद मेरे पिताजी सभी को लेकर मुंबई चले आए। पर मेरा बड़ा भाई विकलांग होने के कारण घर पर ही रह गया। मैं अपने पिताजी, माँ और छोटे भाई के साथ मुंबई के सायन उपनगर में हंसी खुशी के साथ रहती थी।

मेरा दुर्भाग्य उस दिन शुरू हुआ जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया था। उस नफरत की आग ने मुंबई में भी कहर ढाया। उस समय मैं दूसरी क्लास में पढ़ती थी। मैं स्कूल में ही थी जब भगदड़ मचनी शुरू हो गयी। किसी तरह जब मैं घर पहुंची तो वहां कोई नहीं था। मेरा घर जल रहा था। मैं रोते बिलखते इधर उधर भटकती रही। शाम को मेरे माँ बाप मिले। हम कई लोग रात को एक सुनसान जगह पर रात बिताए। घर जल चुका था और वहां रहने के लिए कुछ बचा भी नहीं था।

इसके बाद मेरे पिताजी सपरिवार उल्हासनगर आकर रहने लगे। पर हम लोगों की खुशियां छिन चुकी थी। कुछ दिन बीते थे, मेरी माँ ने साथ छोड़ दिया। उसके बाद मेरे पिताजी भजन कीर्तन में अधिक ध्यान लगाने लगे। करीब 2005 में मेरे पिताजी रिटायर हो गए। पेंशन के पैसे से किसी तरह गुजारा होने लगा। पर मुंबई जैसे शहर में इतनी कम रकम में गुजारा होना मुश्किल था। मेरे भाई को जब अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए थी वह नहीं निभाया और घर छोड़कर अलग रहने लगा। अब घर पर मैं और पिताजी रहने लगे। एक सहेली के कहने पर मैंने भांडूप में एक रिलायंस कंपनी के काल सेंटर में जाब कर लिया। मेरा काम बकाया बिलों की वसूली के लिए फोन करना था। रिलायंस के ही एक ग्राहक विपिन मिश्रा जो ठाणे में रहते थे. उन्हे मैंने फोन किया। स्वाभाविक है मुंबई जैसे शहर में जब उत्तर प्रदेश का कोई मिल जाता है तो घर जैसी ही अनुभूति होती है। लिहाजा बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि वे वाराणसी के नजदीक भदोही के ही हैं। वे मुंबई में फोटोग्राफी करते थे। मुझसे वे बार-बार फोन करके बात करने लगे। बातचीत के ही दौरान उन्होंने मुझसे घर का पता पूछा और एक दिन घर चले आए। एक ही क्षेत्र के रहने के कारण मेरे पिताजी से उनकी बात होने लगी।

खैर मैं अधिक विस्तार में न जाकर यह बताना चाहूँगी कि उन्होंने पिताजी से कहा कि वे भी अकेले हैं और मुझसे शादी करना चाहते हैं। हम दोनों राज़ी थे लिहाजा पिताजी भी मान गए और 2009 अंबरनाथ के दुर्गा मंदिर में हम लोगों की हिन्दू रीतिरिवाज से विवाह हो गया। यह बात विपिन ने अपने परिवार से छुपाई थी। हमारी भूल यह थी कि हमने विपिन की इस बात पर विश्वास किया कि वे अपने परिवार से अलग अकेले थे। इस रिश्ते को स्वीकारने के लिए विपिन के पिताजी ने मेरे पिताजी से 10 लाख रुपए और रकम की मांग की तथा गाँव में दोबारा शादी करने की बात कही। पर मेरे पिताजी के पास पैसे नहीं थे। उन्होंने मेरी ससुराल वालों को बहुत समझाया पर वे नहीं माने। मेरे भविष्य को लेकर पिताजी चिंतित रहने लगे। पर विपिन बार बार अपने परिवार को मनाने की बात करते रहे। उनकी बातों पर विश्वास करने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं था। इसी तरह एक एक दिन गुजरने लगे। इसी बीच मेरे गर्भ मे विपिन और मेरे प्यार का अंकुर भी पनपने लगा। विपिन कहने लगे कि अब शांत रहो जब हम लोगों का बच्चा हो जाएगा तो घर वाले भी मान जाएंगे।

मेरे पास भी भरोसा करने के अलावा कोई चारा नहीं था। पर दिमाग मे हमेशा टेंशन बनी रहती थी। मेरे पिताजी अलग चिंतित रहते थे। उनकी तबीयत खराब रहने लगी। और 8 अप्रैल 2011 को इसी सदमे के कारण हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गयी। अब मेरा साथ देने वाला कोई नहीं था। पर विपिन के बातों पर भरोसा करती रही। उन्होंने मुझे अस्पताल मे भर्ती कराया और बोले की गाँव में उनके दादा जी की तबीयत खराब है, लिहाजा वे घर चले गए। मुझे नहीं पता था कि वे मुझे धोखा दे रहे हैं। 2 मई को मेरी बेटी आंचल पैदा हुयी और विपिन ने 5 मई को गाँव में दूसरी शादी कर ली। यह बात मुझे एक साल बाद पता चली। फिर मैं टूट गयी। मेरे रोने गिड़गिड़ाने का विपिन पर कोई असर नहीं हुआ। उल्टे मुझे धमकी देने लगे कि तुम अकेली हो, यदि शांत नहीं रही तो जान से मार दी जाओगी। मैं बुरी तरह टूट चुकी थी। इस बीच मुझे मेरी मुहबोली भाभी जो आजमगढ़ की हैं, उन्होंने मेरा बहुत साथ दिया। यहां तक की मुझे बेटी की तरह सहारा दिया।

मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। कई बार मन में खयाल आया कि खुद को खत्म कर लूं पर आंचल को देख कर हिम्मत नहीं पड़ती थी। आखिर मेरे गुनाहों की सज़ा उसे क्यों। काफी दिन इसी तरह बीत गए। फिर मैंने सोचा कि जब फेसबुक से अफवाह फैलाई जा सकती है तो क्या न्याय की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। मैंने अपनी व्यथा फेसबुक के माध्यम से सबसे कहनी शुरू की। कुछ लोगों ने मेरा मज़ाक उड़ाया और कुछ लोगों ने सहयोग किया। काफी प्रयास के बाद मैं लोगों को विश्वास दिलाने मे सफल हुयी कि मैं न्याय के लिए लड़ रही हूं। चार महीने की अथक मेहनत के बाद मैंने भदोही में समर्थक जुटाये और नवंबर 2012 में भदोही आई। मैं अपने ससुराल गयी तो मेरे साथ हजारों लोग थे। ससुराल वाले घर छोड़कर भाग गए। जिले की पंचायत ने मेरे पक्ष में फैसला दिया। पर वे लोग नहीं माने। मैंने भदोही के न्यायालय मे घरेलू हिंसा के तहत मामला दर्ज़ कराया जिसकी अवधि छह माह होती है, पर अभी तक कोई फैसला नहीं आया।

इन सब बातों को लेकर मैं बहुत परेशान रहने लगी हूं। विपिन के परिवार वालों ने धमकी दी थी कि भदोही में मेरे लोगों का राज़ चलता है और मुझे लगता है कि वास्तव में उसने सही कहा था। जरा सोचिए सभी बड़े अखबारो में खबर छपी कि मेरा साथ देने वाले ग्राम प्रधानों को पूर्वांचल के एक बड़े माफिया ने जान से मारने की धमकी दी थी। पर आज तक उस मामले की जांच तक नहीं हुयी। मुझे जान से मारने की धमकी दी गयी, यह खबर मुंबई से दैनिक जागरण के मुख्य पेज़ पर छपी, पर कोई कार्यवाही नहीं हुयी।  

आज यह सब बातें मैं इसलिए लिख रही हूं कि अब मेरी ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं है। जिस तरह मैं काफी दिनों से मानसिक तनाव से गुजर रही हूं। उसका दुष्परिणाम मेरे सामने आ गया है। काफी दिनों से मेरे सिर में दर्द हो रहा था। मैं पैन किलर खाकर किसी तरह काम चला रही थी। मुझे नींद भी नहीं आती, यह सब सोच कर। शनिवार को मैंने जांच कराई तो पता चला कि मुझे ब्रेन ट्यूमर है। मैं इसका इलाज़ करा नहीं सकती क्योंकि उसके लिए पैसे चाहिए जो मेरे पास हैं नहीं। और मैं किसी से मांग सकती नहीं। हो सकता है मैं कल न रहूं। पर कुछ सवाल है जो मै मीडिया और कानून दोनों से आपके माध्यम से पूछना चाहती हूं।

1– देश की कानून व्यवस्था पीड़ितो को न्याय दिलाने के लिए बनी है। पर क्या पीड़ित न्याय पाता है? जो कानूनी दाव पेंच हैं क्या वे पीड़ित से अधिक अपराधियो को लाभ नहीं पहुंचाते हैं। या फिर देर से मिला न्याय क्या किसी समस्या का हल है। यदि मेरे मामले मे देखा जाय तो लगातार चार पाँच महीने मेहनत करके, लोगों के उल्टे सीधे सवालों के जवाब देकर लोगों को यह भरोसा दिलाई की मैं सच के साथ हूं। मेरे साथ अन्याय हुआ है। अपनी बेटी को न्याय दिलाने, उसे बाप का नाम दिलाने मैं लोगों से कर्ज लेकर भदोही गयी। और आज तक विपक्षियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुयी। मेरी जान का खतरा है, पर कोई सुरक्षा नहीं है। क्या ऐसे कानून के भरोसे कोई महिला कभी अपने साथ हुये अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत करेगी।

2– मैंने अपने साथ हुये अन्याय के खिलाफ साथ देने के लिए मीडिया से गुहार लगाई। मीडिया ने साथ भी दिया। मुंबई की चाल में रहने वाली एक सामनी गरीब महिला जब भदोही पहुंची तो उसे मीडिया ने ही चर्चित बना दिया। मीडिया की देन रही कि मेरा मामला काफी ऊपर तक गया। मीडिया ने चर्चित किया तो क्राइम पेट्रोल ने तीन एपिसोड बना डाले। पर मैं तो वहीं की वहीं हूं। जब कोई मामला चर्चित होता है तो मीडिया भी साथ देती है। मैं मीडिया की ऋणी हूं और आजीवन रहूँगी। पर क्या मीडिया का दायित्व बस वहीं तक है। क्या उसके बाद पैदा हुये हालात पर निगाह रखना मीडिया का दायित्व नहीं। कल मैं मर जाऊं, एक बार फिर खबर छपेगी, लोग अफसोस जताएँगे। और बस हो गया, परसो दूसरी डिंपल आ जाएगी। फिर सब कुछ वही।

यशवंत जी, अपनी बात मैं इसलिए कह रही हूं कि मैं भड़ास की अहमियत जानती हूं और अपनी बात आपके माध्यम से उन लोगों तक पहुंचाना चाहती हूं जो मेरी बात समझ सकते हैं। मेरा भरोसा अब नहीं है। हो सकता है मैं रहूं या नहीं। पर इतना अवश्य कहना चाहूँगी की देश में तमाम ऐसी महिलाए हैं जो समाज का सामना दुख सहने के बाद भी इसलिए नहीं कर पाती हैं कि उन्हें पता है कानून उन्हें समय पर न्याय नहीं देगा। और मीडिया भी अपनी जिम्मेदारियों को सिर्फ खबर तक ही सीमित रखती है। किसी को न्याय मिला की नहीं, उसके हालात कैसे हैं, कोई मतलब नहीं। और समाज तो कुंभकरण की नींद सो ही रहा है। उसे जगाना और भी मुश्किल है। मैं यह कहना चाहती हूं कि समाज का प्रत्येक वर्ग अपनी जिम्मेदारियों को समझे और उन्हें पूरा करे ताकि कल कोई और डिंपल घुट घुट कर मारने को विवश न हो।

डिंपल

dimple misra

dimplemisra123@gmail.com

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