तिरंगे में लपेटा, राजकीय सम्मान दिया, अब भारत रत्न भी दे दो

Pankaj Srivastava : आदमी गलतियों से ही सीखता है..आज तमाम भ्रम दूर हो गए। विद्वानों की अहर्निश प्रशंसा..जनता का सैलाब, सुर साम्राज्ञी और सहस्त्राब्दी के महानायक के आंसुओं से मन भीग गया…फिर तिरंगे में लिपटे शेर की अंतिम यात्रा देखी और वो बावर्दी दुरुस्त पुलिसवालों की सलामी.. लगा कि बिलकुल ही अंधेरे में था….गलती सुधारने की कोशिश के तहत मेरी माँग है कि बाल ठाकरे को मरणोपरांत भारतरत्न दिया जाए…आप लोग इसे लेकर माहौल बनाएँ….मैं तब तक संविधान से लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समानता और सहिष्णुता जैसी बकवास बातों को बाहर करने का प्रस्ताव तैयार करता हूँ..

राहुल सांकृत्यायन : ठाकरे को क्यों मिला राजकीय सम्मान? राष्ट्र ध्वज तिरंगे से क्यों लपेटा उसके शव को जबकि उसने राष्ट्र को कभी एक राष्ट्र समझा ही नहीं, हमेशा क्षेत्रवाद की राजनीति को दिया बढावा. मैं ठाकरे के हिन्दुत्ववादी राजनीति का समर्थक हूं पर क्षेत्रवादी राजनीति का कभी नहीं.

Mayank Saxena : दुनिया में मुल्क का नाम करने वाले कई कलाकार दुनिया से चले गए…कोई भीड़ नहीं…कोई पुलिस सैल्यूट नहीं…कोई राजकीय सम्मान नहीं…. वो न पीएम रहा…न सीएम…न ही वो मंत्री था…न सांसद…विधायक भी नहीं…वो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी नहीं था…पुलिसवाला भी नहीं…फ़ौजी भी नहीं…लेकिन उसे पूरे राजकीय सम्मान से अंतिम विदाई मिली…हां भीड़ भी बहुत थी… वो वाकई महान था…उफ़ कितना महान….उफ़ इतना महान..

Viplav Vinod : आज यह तय हो गया कि भारत के राष्ट्रपिता का खिताफ गांधी जी से छीन का महान बाला साहेब ठाकरे को दे देना चाहिये। भारत के इतिहास का सबसे महान पुरूष अगर कोई थे। गांधी, सरदार पटेल, नेहरू ये सब तो ठाकरे के पैर की धूली के समान थे। हम भारतीय धन्य है और इसके लिये हमें नाज है कि हमने एक दंगाई, नफरत फैलाने वाले, देश को विभाजित करने वाले को इतना महान बना दिया!

Shweta R Rashmi : मुझे बाला साहेब ठाकरे के जाने का दुःख है , पर कोई मुझे यह बताये की उनको राजकीय सम्मान क्यों और किसलिए दिया गया

Pankaj Srivastava : बाल ठाकरे के परिवार और शिवसेना का दुखी होना समझ में आता है। लेकिन उन्हें राजकीय सम्मान देना और उनके शव पर तिरंगा लपेटा जाना बताता है कि भारतीय राज्य किस खतरनाक हद तक खोखला हो चुका है। ठाकरे ने जीवन भर भारतीय संविधान में दर्ज प्रगतिशील मूल्यों का माखौल बनाया। तानाशाही को देश के लिए जरूरी बताया और धर्मनिरपेक्षता पर हमला
बोला। मुंबई में उनके गिरोह को मिलने वाला जनसमर्थन राज्य की अनुपस्थिति और कांग्रेस के वैचारिक खोखलेपन का नमूना है (जिसकी वजह से कांग्रेस में गांधीजी की हत्या की साजिश रचने वाले सावरकर के खिलाफ भी कुछ बोलने की हिम्मत नहीं बची है)। शर्मनाक…निंदनीय…..

Shishir Singh : उत्तर भारत का अपमान करने के बाद भी जिस तरह से उत्तर भारत की मीडिया बाल ठाकरे का गुणगान कर रही है, उससे मेरा यह शक गहरा रहा है कि ठाकरों के लाडलों ने बाप की मौत को भुनाने के लिए पीआर एजेंसियों की सहायता ली है। एकबारगी यह माना जा सकता है कि महाराष्ट्र के अखबारों को अपना धंधा चलाना है, इसलिए वो ठाकरे को चने की झा़ड़ पर चढाए हुए हैं, पर उत्तर भारत के मीडिया में आखिर ऐसा क्यों है कि यही मीडिया जब ठाकरे के जिन्दा होने पर उनके एंटी उत्तर भारतीय और छठ के बयानों पर उनकी खिंचाई करता था आज वही उत्तर भारत का मीडिया उस ठाकरे को शेर लिख रहा है, उनके कसीदों में अपना पूरा एक पेज काला कर रहा है। आखिर अखबार का संपादक मुझसे तो ज्यादा ही समझदार होगा, क्योंकि अगर मुझे बाल ठाकरे का उत्तर भारतीयों को गाली देना याद है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि अखबार का संपादक और मालिक यह भूल जाए। (नोटः उत्तर भारत के बड़े अखबार अमर उजाला और दैनिक जागरण को ही पढ़ता हूँ, अन्य नहीं)

Ashwini Kumar Srivastava : किसी नेता के नाम पर 20-30 लाख लोगों की भीड़ और वो भी इतनी अनुशासित!!! इसे देखते हुए अगर बालासाहेब को भी भारतीय हिटलर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। लेकिन हर हिटलर जनता को अपने मोहपाश में इस कदर तभी बाँध पाता है, जब वो उसे लगातार एक दुश्मन का खौफ दिखा कर उसके लिए उनके मन गहरी नफरत पैदा करता रहे। हिटलर ने जर्मनी के लोगों को यहूदियों का डर दिखा कर उनके प्रति गहरी नफ़रत भरी। ठीक वैसे ही ठाकरे ने मराठियों के मन में कभी मुसलमान, कभी उत्तर भारतीय, कभी दक्षिण भारतीय तो कभी गुजराती लोगों का डर दिखा दिखा कर उनके मन में लगातार जहर भरा। जाहिर है, देश में ठाकरे के बाद ठाकरे जैसा या उससे बड़ा कोई तानाशाह पैदा होगा तो वो भी किसी न किसी कल्पित दुश्मन को पैदा करके ही होगा। और तानाशाह बनने की यह प्रक्रिया हिटलर के समय से ही लाखों-करोड़ों लोगों की बलि मांगती आई है। हिंसा या नरसंहार की कोख से जन्मे तानाशाह कभी भी किसी देश या समुदाय का भला नहीं कर सकते। ऐसे तानाशाहों के पीछे चलने वाली जनता या देश हमेशा बर्बरता के दौर में ही जाकर बर्बाद हो जाता है।

Lovesh Sharma : चैनल मीडिया समझ नहीं पा रहे हैं कि वह ठाकरे पर अपने प्रोग्राम को किस दिशा में ले कर जाए. उनके जिन्दा रहते कुछ नहीं बोल पाने वाले लोग भी अब अपनी भड़ास खूब निकल रहे हैं. क्या कल दिन भर देश में ठाकरे से ज्यादा कुछ भी महतवपूर्ण नहीं था. आखिर क्यूँ चैनल वाले सिर्फ बदनाम होकर अपना नाम कमाना चाहते हैं, कल कई साथियों ने बताया की वो टीवी देखने में ऊब चुके थे, कैसे इससे पीछा दूर होगा. इसका जवाब एक ही था की इन खबरिया चैनल को अपनी मन मर्यादा की चिंता तो है नहीं जो भी टीआरपी बढाने के लिए करना होगा, बस वही करेंगे. राम ही राखे
 

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