तिहाड़ में खुदकुशी करने वाली रेशमा की डायरी को जेल प्रशासन सार्वजनिक क्यों नहीं कर रहा?

करीब दो महीना पहले मै एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने के दौरान तिहाड़ महिला जेल में रेशमा से मिला था । रेशमा फर्राटेदार इंग्लिश बोलती थी और बेहतरीन डांसर थी । उन दिनों वह तिहाड़ में हो रहे तिहाड़ आईडल की तैयारिया कर रही थी।  उस वक़्त रेशमा  ने जेल में अपने आने की वजह भी बताई थी । मैंने उसको छोटी सी मुलाक़ात के दौरान जितना समझा उसके मुताबिक रेशमा बेहद महत्त्वाकांक्षी और जिन्दगी से प्यार करने वाली लड़की थी। इंग्लिश बोलने से लेकर डांस करना उसने जेल में ही सिखा था ।

भले ही रास्ता भटककर वह एक गुनाह की भागीदार बन गई हो लेकिन जीवन के प्रति सकारात्मक सोच रखने वाली कोई लड़की अगर खुदकुशी करती है तो जरूर इसके पीछे कोई बड़ी वजह रही होगी । खुद को खत्म करने से पहले रेशमा ने खुद से कई बार द्वंद्व किया होगा । रेशमा काफी पढ़ी-लिखी थी। वह रोज अंग्रेजी में कुछ न कुछ लिखती थी। मेरी जानकारी के अनुसार ख़ुदकुशी करने वाले दिन भी उसने अंग्रेजी में कुछ लिखा था लेकिन वो डायरी और दुसरा सामान अब जेल प्रशासन के कब्जे मे है । जाहिर है गुनाहगारो को अपने आगोश में रखने वाली तिहाड़ जेल अपने गुनाहों को इस चारदीवारी से कभी बहार नहीं आने देगी । रेशमा ने अपनी डायरी में क्या लिखा था, इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी जा रही  है। जेल अधिकारी इसे सुसाइड नोट भी नहीं बता रहे हैं ।

हालाँकि जेल संख्या-6 में खुदकुशी करने वाली रेशमा के शव का डीडीयू अस्पताल में पोस्टमार्टम होने के बाद अब अंतिम संस्कार भी हो चुका है । पुलिस ने पोस्टमार्टम की वीडियो रिकार्डिग कराने की रस्म भी अदा की है और परम्परागत जांच भी की जा रही है । लेकिन मेरा मानना है की असल सवाल फिर भी बरक़रार रहेगा कि रेशमा की खुदकुशी के लिए कौन जिम्मेदार है ? रेशमा के बारे में थोडा बता दू की उसका अपने पति सूरज से तलाक हो चुका था जो एक टेम्पो चालक था । वह अपहरण के मामले में दो साल से जेल में बंद थी। रेशमा पर अपहरण कर फिरौती मांगने का आरोप था। उसे जैतपुर थाना पुलिस ने वर्ष-2011 में कुछ अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया था।

जेल रिकॉर्ड के मुताबिक  कि रेशमा ने अपने साथी विक्रम यादव व उसके अन्य साथियों के साथ मिलकर खादर में रहने वाले अशद शेख के अपहरण की साजिश रची थी। रेशमा ने अशद को गुड़गांव में मिलने के लिए बुलाया था, लेकिन अशद खुद न जाकर साथी परवेज अहमद को भेज दिया। रेशमा व उसके साथियों ने पहले तो परवेज का अपहरण किया और बाद में अशद शेख को गुड़गांव बुलाकर उसका भी अपहरण कर लिया। इसके बाद अशद के परिजनों से 10 लाख रुपये की फिरौती मांगी, लेकिन पुलिस ने कॉल डिटेल की मदद से सभी आरोपियों को गुड़गांव से गिरफ्तार कर दोनों को सकुशल बरामद कर लिया था। पूछताछ में सामने आया था कि अशद व विक्रम एक दूसरे को जानते थे। रेशमा भी दोनों को जानती थी। रेशमा ने ही अपहरण की साजिश रची थी।

उसका मुकदमा उन दिनों अंतिम पड़ाव पर था। अदालत में उसकी पैरवी दिल्ली लीगल एड सर्विस का वकील कर रहा था । यानी तिहाड़ पहुचने के बाद रेशमा को परिवार या किसी दुसरे जरिये से मदद नहीं मिल रही थी। जेल अधिकारियो के मुताबिक रेशमा की रिहाई के आदेश हो चुके थे और उसको अदालत ने 30 हज़ार रूपए का जुर्माना भरने का आदेश दिया था । यहाँ गंभीर सवाल खड़ा होता है की तिहाड़ प्रशासन के पास कैदियो के कल्याण के लिए करोड़ो रूपए का एक फण्ड होता है जिसमे ये प्रावधान है की जिस आर्थिक रूप से कमजोर कैदी को अगर पचास हज़ार तक की रकम अदालत में जुर्माना आदि भरने के लिए चाहिए तो जेल प्रशासन की जिम्मेदारी है की वह इस रकम को अदालत में जमा करवाएं  ।

दिल्ली कैदियो की मदद के सरकार द्वारा बनाई गई क़ानूनी संस्था के पास भी ऐसा ही करोडो रूपए का फण्ड पड़ा है । रेशमा ने जेल प्रशासन से गुहार लगाई थी की सरकारी कोष से उसके जुर्माने की रकम को अदाकर  उसकी रिहाई करवा दी जाए । जेल प्रशासन इस बात को कैसे भूल गया की जिस कैदी की क़ानूनी लड़ाई सरकारी सहायता से लड़ी जा रही थी उसके पास जुर्माने की रकम भरने के लिए इतनी बड़ी रकम कहाँ से आएगी । लेकिन हर साल करीब 300 करोड़ की खरीद फ़रोख्त से 10 फीसदी का ईमानदारी भरा कमीशन खाकर मस्त रहने वाला तिहाड़ प्रशासन कुम्भकर्णी नींद सोता रहा। जेल प्रशासन को इस बात की सुध ही नहीं थी की हर साल दिल्ली सरकार 167 करोड़ का जो फण्ड कैदियो के कल्याण के लिए देती है उसकी जरुरत रेशमा जैसी हुनरमंद कैदियो को ना कि उन दर्जनों स्वंसेवी  संगठनों को जिनको इस फंड से बंदरबांट की जाती है । रेशमा की ख़ुदकुशी के बाद सवाल ये भी खड़ा होता है की क्या जाँच में इन बिन्दुओ को शामिल किया जायेगा या हमेशा की तरह रेशमा की मौत को भी डिप्रेशन थ्योरी की कहानी बनाकर फाइलों के ढेर में दबा दिया जायेगा ।

रेशमा के पिता तेज नारायण  पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में रहते हैं। वे आर्मी से सेवानिवृत नायक सूबेदार रह चुके हैं। उन्होंने ही रेशमा के शव की शिनाख्त की ओर शव का अंतिम संस्कार किया। चंद दिनों में हमसब रेशमा की मौत को भूल जायेंगे । मीडिया भी गहन छानबीन की जगह ऐसे ही किसी अगले किस्से का इंतज़ार करेगा और दो दिन तक तिहाड़ प्रशासन को बिना नाराज किए चटपटी कहानियां छापेगा और टीवी के परदे पर दिखाएगा । लेकिन कोई इस तह में जाने की कोशिश नहीं करेगा की सुरक्षा के नाम पर खड़ी की गई तिहाड़ की चारदीवारी के पीछे कितने घपले-घोटाले हो रहे है। मै चंद घंटो के लिए रेशमा से मिला था इसलिये बार – बार लगता है की शायद वो कह रही है सर मै अभी जीना चाहती थी,,,,,,,प्लीज कुछ करिए ताकि किसी ओर रेशमा का अंत मेरे जैसा ना हो ,,,,,,,प्लीज बहुत हो चुका अब तिहाड़ की चारदीवारी के पीछे जो खेल हो रहे है उन्हें बहार लाइए ।

सुनील वर्मा

vermasunilverma@gmail.com

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