तो इसलिए गंभीर से गंभीर मुद्दों पर चुप्पी साध जाते हैं मीडिया के बुजुर्ग!

Vineet Kumar :  जानते हैं मीडिया के जो बुजुर्ग जिन्हें आप सम्मान में वरिष्ठ और हम जैसे उनकी तिकड़मों को ध्यान में रखकर मठाधीश कहते हैं, उनकी मानसिकता अपने लालकृष्ण आडवाणी जैसी होती है..जैसे उन्हें अभी तक उम्मीद है न कि देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं, वैसे ही इन मठाधीशों को भी ललक बनी रहती है कि आज न कल कोई धनपशु उन्हें बुलाकर चैनल का सीइओ, सीओओ, एमडी.. बना देगा.

तभी वो गंभीर से गंभीर मसले पर चुप मार जाते हैं. इससे काम खराब होने के खतरे हैं..लेकिन वो ये नहीं जानते कि लोगों के बीच उनकी साख, प्रतिष्ठा और यहां तक कि आकर्षण बहुत पहले खत्म हो चुका है. वो बस अनुभव के नाम पर पके बालों की किस्तें बैठकर सभा-संगोष्ठियों के बहाने खा रहे हैं.

xxx

Vineet Kumar : पगला हो क्या, जिनकी नौकरी गई है वो तो एक शब्द लिख-बोल रहे ही नहीं है. सबके सब इस जुगाड़ा में लगें हैं कि कैसे दूसरी जगह फिट हो जाएं तो तुम क्यों अपनी शाम खराब कर रहे हो ? इतनी खूबसूरत शाम है, सीपी जाओ, वर्कोज में चिल्ल आउट करो, तितलियां ताड़ो..बोक्का मानुष. आज के दिन भी यही सब लेकर बैठे हो….

सही बात है कि मीडिया के लोग इस घटना पर कुछ नहीं बोलेंगे, वो कार्पोरेट मजदूर बनकर रह गए हैं..लेकिन कई बार मजदूर भी तो अपनी बात नहीं करते, वो ठेकेदारों से पंगा लेने के बजाय कहीं और दीहाड़ी खोजने चले जाते हैं लेकिन तब हमारा खबर हर कीमत पर, आपको रखे आगे, सबसे तेज..उनके बारे में बात करते है न..सोशल मीडिया का काम बदलाव की चिंता के बजाए उन खबरों को सार्वजनिक करना तो है ही जो शादी-ब्याह,पार्टी-कॉकटेल से अलग फेसबुक और ट्विटर के बीच होने की मांग करते हैं.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *