थोड़ी सी पी शराब, थोड़ी उछाल दी… कुछ इस तरह से हमने जवानी निकाल दी…(सुनें)

एक जमाने में इसे खूब सुनता गाता था… थोड़ी सी पी शराब, थोड़ी उछाल दी… कुछ इस तरह से हमने जवानी निकाल दी… लेकिन काफी समय से इसे सुना नहीं और गाया भी नहीं. आज अचानक इस ग़ज़ल की लाइनें याद आ गईं. नेट पर सर्च किया तो भड़ास ब्लाग का लिंक मिला जिस पर मैंने इस पूरी ग़ज़ल को लिख मारा हुआ है. सन 2008 में बीस फरवरी को भड़ास ब्लाग पर इस ग़ज़ल की लाइनों को पोस्ट किया था. आप भी देखें इस लिंक पर क्लिक करके… भड़ास ब्लाग पर एक ग़ज़ल.

आज यूट्यूब पर इस गाने को खोजा, डाउनलोड किया और भड़ास4मीडिया पर अपलोड किया. लाइनें यूं हैं…


थोड़ी सी पी शराब

थोड़ी उछाल दी

कुछ इस तरह से हमने

जवानी निकाल दी
 

हमने सिया है इश्क में होठों को इस तरह

जिसने भी दी जहां में हमारी मिसाल दी

थोड़ी सी पी शराब….
 

अब डर नहीं किसी का जमाने में दोस्तों

हमने तो दुश्मनी भी मोहब्बत में ढाल दी

थोड़ी सी पी शराब….
 

मैं चूर हूं नशे में, मुझे कुछ खबर नहीं

मुझपे निगाहे शोख कब तुमने डाल दी

थोड़ी सी पी शराब….


साथ ही आजकल के दिनों का मेरा एक प्रिय गाना भी यहां अपलोड किया है, मेरा इश्क सूफियाना…  असल में आज गांधी शांति प्रतिष्ठान (दिल्ली) गया हुआ था, एक व्याख्यान में. वहां से एक मित्र के साथ हिंदी भवन चला गया जहां चार्टर्ड एकाउंटेंट लोगों का सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था और एक बैंड गाना-बजाना कर रहा था. उसी में गायिका अंशुमाला झा ने जब सुनाया… मेरा इश्क सूफियाना.. तो मैं भी गाने लगा. घर आकर इसे दुबारा तिबारा सुना. जबर्दस्त है यह.

हिंदी भवन में गायिका अंशुमाला झा के शो का एक दृश्य.


कुछ दिन पहले जाने क्या हुआ कि अचानक गुनगुनाने लगा… वो रुलाकर हंस ना पाया देर तक… यह भी मेरी पसंदीदा गज़लों में से है. इसको गूगल पर हिंदी में लिखकर सर्च करने पर एक लिंक भड़ास ब्लाग का मिला. देखा तो पता चला कि नवाज देवबंदी लिखित इस ग़ज़ल की सारी लाइनों को मैने भड़ास ब्लाग पर लिख मारा है… आप भी देखें इस लिंक पर क्लिक करके… भड़ास ब्लाग पर वो रुलाकर…  इस ग़ज़ल को ब्लाग पर तीस जून दो हजार आठ को अपलोड किया है, एक टिप्पणी के साथ. तो, सोचा कि चलो इसे भी भड़ास4मीडिया पर अपलोड कर देते हैं. लाइनें यूं हैं..


वो रुला कर हंस न पाया देर तक

जब मैं रो कर मुस्कुराया देर तक
 

भूलना चाहा कभी उसको अगर

और भी वो याद आया देर तक
 

ख़ुद ब ख़ुद बे-साख्ता मैं हंस पड़ा

उसने इस दर्जा रुलाया देर तक
 

भूखे बच्चों की तसल्ली के लिए

माँ ने फिर पानी पकाया देर तक
 

गुनगुनाता जा रहा था इक फक़ीर

धूप रहती है न छाया देर तक
 

कल अन्धेरी रात में मेरी तरह

एक जुगनू जगमगाया देर तक

-नवाज़ देवबंदी


आज इन तीनों को सुन रहा हूं और कई दिनों तक गाहे-बगाहे सुनूंगा क्योंकि ये तीनों ग़ज़लें इकट्ठे एक जगह अपलोड कर देने से सुनने की इच्छा होते ही क्लिक…

इच्छा हो तो इनका आप भी आनंद लें. नीचे तीनों ग़ज़लें क्रम से हैं.

कोई फेवरिट सा गाना ग़ज़ल आपके पास हो तो हमको भी सुनाएं, मेल से एमपी3 अटैच करके भेज दें या गाने का लिंक मेरे पास सेंड कर दें. मेरा निजी पता yashwant@bhadas4media.com है. –यशवंत


थोड़ी सी पी शराब…..

 

मेरा इश्क सूफियाना…….

 

वो रुलाकर हंस ना पाया देर तक…

 


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