दंगों से ‘उर्वरा’ हुई जमीन, वोट बैंक की खेती के लिए लग गई होड़!

सांप्रदायिक हिंसा में कई दिनों से जलते आ रहे मुजफ्फरनगर में अब हालात कुछ सामान्य होने लगे हैं। शहर में दिन-रात लगे रहने वाला कर्फ्यू का साया हट गया है। इसके बावजूद दहशत और आपसी अविश्वास का माहौल बना हुआ है। स्थानीय निवासी जल्द से जल्द हालात बदलने की बाट जोह रहे हैं। लेकिन, राजनीतिक दलों ने अपने वोट बैंक की फसल को लहलाने के लिए तरह-तरह के करतब शुरू कर दिए हैं।

एक-दूसरे के खिलाफ आरोपों और प्रत्यारोपों के निशाने साधे जाने लगे हैं। रविवार को प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा किया था। उन्होंने पीड़ित परिवारों की तमाम मदद करने के वायदे किए हैं। इनमें सरकारी नौकरियों का लुभावना पेकैज भी शामिल है। अगले ही दिन यानी, सोमवार को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने भी दौरा करके पीड़ितों को दिलासा दिया है। इस तरह से अब सियासी दलों के बीच दंगों से ‘उर्वरा’ हुई मुजफ्फरनगर की धरती में वोट बैंक की राजनीति तेज हो गई है। हिसाब लगाया जा रहा है कि इन दंगों का राजनीतिक फलित कितना किसके पक्ष में जाने वाला है? जिन्हें घाटा होता दिखाई पड़ रहा है, वे ‘डैमेज कंट्रोल’ में तेजी से जुटने लगे हैं।

दरअसल, मुजफ्फरनगर के ग्रामीण इलाके में सांप्रदायिक तनाव की शुरुआत, छेड़छाड़ की एक घटना से हुई थी। लेकिन, झगड़े में एक मुस्लिम युवक की मौत हो गई, तो इसे सांप्रदायिकता का रंग देने की कोशिश की गई। प्रतिक्रिया में दो जाट युवकों की हत्या कर दी गई थी। यह हादसा जिले के कवाल गांव हुआ था। इस बवाल से ही सांप्रदायिक नफरत की आग भड़काई जाने लगी।

3 दिन बाद मुजफ्फरनगर शहर में बसपा के सांसद कादिर राणा आदि ने एक पंचायत करके भड़काऊ भाषण दिया था। अल्पसंख्यक मोहल्ले में हुई इस पंचायत में कांग्रेस और सपा के भी कुछ नेताओं ने हिस्सेदारी की थी। इन लोगों ने कवाल में हुई हत्याओं को लेकर उकसावे वाले तमाम जुमले बोले थे। सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाने के लिए कुछ कट्टरवादी मौलानाओं ने भी लोगों का गुस्सा और भड़काने की कोशिश की थी। हैरानी की बात यह है कि जब ये जहरीले भाषण किए जा रहे थे, तो स्थानीय पुलिस भाषणबाज नेताओं की सुरक्षा इंतजामों में जुटी थी।

इस पंचायत की तमाम बातें बढ़ा-चढ़ाकर दूसरे पक्ष में प्रचारित की गईं। 31 अगस्त को जाट बिरादरी की खापों ने आगे की रणनीति बनाने के लिए एक पंचायत बुला ली थी। इसमें कई हजार लोगों का जमावड़ा किया गया। इस जमावड़े में संघ परिवार के कुछ जाने-माने प्रचारकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। पंचायत के दौरान कई वक्ताओं ने खुलकर जहरीले भाषण दिए। यहां तक कहा गया कि यदि सभी लोगों ने मिलकर मुकाबला नहीं किया, तो बहन-बेटियों की इज्जत सुरक्षित नहीं बचेगी। इस पंचायत में ही तय हुआ था कि 7 सितंबर को महापंचायत बुलाकर आर-पार फैसला किया जाएगा। हैरानी की बात यह है कि सांप्रदायिक तनाव की घटाएं घिरने के बाद भी स्थानीय प्रशासन ने दोनों तरफ के जमावड़ों पर रोक लगाने की कोशिश नहीं की।

पांच सितंबर तक स्पष्ट हो गया था कि दोनों पक्ष पंचायतों के बहाने सांप्रदायिक उन्माद बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा के स्थानीय नेताओं ने खुलकर जोर लगाया था कि ‘बहू-बेटियों की इज्जत बचाओ’ पंचायत में ज्यादा से ज्यादा लोग जुटें। लोगों की भावनाएं भड़काने के लिए पंचायत का नामकरण भी बहन-बेटियों की इज्जत से जोड़ा गया। ताकि, स्थानीय चौधरियों का गुस्सा ज्यादा से ज्यादा बढ़ सके। यही हुआ भी। बताया जा रहा है कि उस दिन इस पंचायत में करीब 1 लाख लोग जुट गए थे। पंचायत के दौरान भाजपा के विधायकों सहित कई वक्ताओं ने जमकर भड़काऊ भाषण किए थे। इस दौरान पुलिस की   भूमिका महज मूकदर्शक वाली बनी रही। दूसरी तरफ, अफवाहें फैला दी गई थीं कि पंचायत में फैसला किया गया है कि बदला लेने के लिए आर-पार का काम शुरू कर दो। इन अफवाहों के चलते पंचायत से लौटने वाले ट्रैक्टरों पर कई जगह हमला किया गया। कुछ ट्रैक्टरों को घेर कर नहर में डाल दिया गया। कई जगह हिंसक झड़पें हुईं। इसमें एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए। इसके बाद नौ सितंबर तक हिंसा का जमकर नंगा नाच हुआ।

मुजफ्फरनगर शहर के साथ जिले के कई ग्रामीण इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा की आग भड़कती रही। यहां तक कि बागपत, शामली व हापुड़ जैसे जिलों में भी छिटपुट हिंसा की घटनाएं होने लगीं। मुजफ्फरनगर के ग्रामीण इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा और अविश्वास के चलते बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यक परिवारों का पलायन हुआ। करीब 60 हजार लोग ग्रामीण इलाकों से पलायन कर गए हैं। एक तरह से मुजफ्फरनगर के आस-पास के गांवों में रहने वाले अल्पसंख्यक परिवार डर की वजह से अपना घर-बार छोड़कर भाग खड़े हुए हैं। प्रदेश सरकार ने इन परिवारों को शरण देने के लिए कई अस्थाई शिविर बना दिए हैं। जिला प्रशासन के अनुसार, इन शिविरों में करीब 45 हजार लोग शरण लिए हुए हैं। जबकि, हजारों लोग गाजियाबाद, दिल्ली व पड़ोस के शहरों में शरण लेने पहुंच गए हैं। इनमें से ज्यादातर लोग खेतिहर मजदूर हैं। जिनकी रोजी-रोटी गांव के कामकाज से ही चलती थी। लेकिन, अब इनका चौधरियों से भरोसा टूटा, तो वे वापस लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। जो राहत शिविर बनाए गए हैं, उनमें बदहाली की स्थिति है। प्रशासन के तमाम दावों के बावजूद यहां पर लोगों के पेट भरने के भी सही इंतजाम नहीं किए गए।

1987-88 के दौरान इस प्रतिनिधि ने मेरठ क्षेत्र में हुए भयानक सांप्रदायिक दंगों के हालात देखे थे। लगातार इनकी कवरेज भी की थी। मुजफ्फरनगर की ताजा हिंसा के मुकाबले उस दौर के दंगे ज्यादा भयानक थे। उस दौरान तो तमाम वर्दीधारी भी सांप्रदायिक हिंसा में लिप्त हो गए थे। पीएसी की एक टुकड़ी ने तो अल्पसंख्यकों के एक समूह का नरसंहार ही कर डाला था। ‘हाशिमपुरा कांड’ के नाम पर इसकी चर्चा लंबे समय तक होती रही थी। यह अलग बात है कि तमाम सबूतों के बावजूद वर्दीधारी गुनहगारों को अब तक कोई सजा नहीं मिल पाई है। यहां इस संदर्भ का खास उल्लेख इसलिए करना मौंजू लगता है, क्योंकि उस दौर में इतने बड़े पैमाने पर पलायन की नौबत नहीं आई थी। जबकि, इस बार यह नजारा आम हो गया है।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दौरे के बाद भी पलायन एकदम थमा नहीं है। प्रशासन की तमाम कोशिशों के बावजूद शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोग अपने गांवों में लौटने को तैयार नहीं हो रहे। इस प्रतिनिधि ने पिछले दिनों इस इलाके का एक जायजा लिया था। रास्तों में कई जगह ऐसे समूह मिले, जो अपने सिर पर गठरियां रखे शिविरों की तरफ बढ़ते नजर आए। ज्यादातर ने यही दोहराया कि अब आपस का विश्वास खत्म हो गया है, तो गांव में लौटने की हिम्मत नहीं होती। एका एक बंटवारे (भारत-पाक) के समय वाले दृश्य उभरते नजर आए। सपा नेतृत्व लगातार यह कह रहा है कि सरकार ने दंगा भड़काने वाले राजनीतिक तत्वों की पहचान कर ली है। 40 नेताओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमें दर्ज हो गए हैं। इनकी गिरफ्तारी कर ली जाएगी। इस ऐलान के बाद भी इनमें से अभी तक एक भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया है। भाजपा के 4 विधायकों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज है। पकड़ने के लिए कई बार छापेमारी भी की गई है। लेकिन, हैरानी की बात है कि कल लखनऊ में विधानसभा सत्र के दौरान इनमें से कई ‘वांटेड’ विधायक विधानभवन में भी देखे गए। इसको लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं।

कल दंगाग्रस्त इलाकों के दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा है कि उनकी सरकार दंगा पीड़ितों की मदद के लिए हर तरह का सहयोग प्रदेश सरकार को करने को तैयार है। सोनिया गांधी ने राहुल गांधी और प्रधानमंत्री के साथ कई राहत शिविरों का भी जायजा लिया। पीड़ितों के प्रति जमकर हमदर्दी जताई। राहुल गांधी ने प्रदेश सरकार की कार्यशैली पर जमकर कटाक्ष भी किए। यही संदेश देने की कोशिश की कि कांग्रेस के राज में ही सांप्रदायिक सद्भाव का वातावरण रह सकता है। जबकि, भाजपा ने मनमोहन और सोनिया के दौरे को ‘सेक्यूलर टूरिज्म’ करार किया है। इस आशय की टिप्पणी पार्टी के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने की है। रालोद प्रमुख अजित सिंह, इस बात से खफा हैं कि उन्हें इस क्षेत्र का दौरा नहीं करने दिया गया। जबकि, दूसरे लोग दौरे कर रहे हैं। चौधरी अजित सिंह ने खुलकर आरोप लगाया है कि वोट बैंक के ध्रुवीकरण के लिए सपा और भाजपा के बीच नापाक गठबंधन हो गया है। इस आरोप को लेकर सपा नेतृत्व ने गहरी नाराजगी जताई है। इसी बीच बागपत संसदीय क्षेत्र के सपा प्रत्याशी सोमपाल शास्त्री ने एक बड़ा राजनीतिक झटका दे दिया है। उन्होंने पत्र लिखकर सपा टिकट पर चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। क्योंकि, वे हिंसक घटनाक्रम से काफी क्षुब्ध हो गए हैं।

पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री ने ‘डीएलए’ से कहा कि उन्होंने यह फैसला बहुत सोच समझकर लिया है। क्योंकि, पूरे इलाके में प्रशासन के तौर-तरीकों को लेकर गहरी नाराजगी है। सरकार ने अपने नकारापन से दोनों समुदायों का विश्वास खो दिया है। उन्होंने कोशिश की थी कि पार्टी के नेतृत्व को जमीनी हकीकत बता दी जाए। कई बार फोन पर संपर्क करने की कोशिश की गई। लेकिन, संपर्क नहीं हो पाया। ऐसे में, उन्होंने यह निर्णायक फैसला लिया है। कल विधानसभा में भी मुजफ्फरनगर को लेकर जमकर हंगामा हुआ। बसपा प्रमुख मायावती ने ऐसे तेवर अपनाएं हैं, मानो सभी दलों में वही सबसे खांटी सेक्यूलर मिजाज वाली नेता हों। इस तरह से मुजफ्फरनगर के दंगों को लेकर सपा, बसपा, भाजपा व कांग्रेस के बीच सियासी दंगल तेज हो गया है। अजित सिंह भी ‘डैमेज कंट्रोल’ में जुट रहे हैं। वे जल्दी ही इलाके में सघन दौरे का कार्यक्रम बना रहे हैं।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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