दरअसल, खबर बिकने की शुरुआत यहीं से हुई

 : चिट फंड कंपनियों के असल संरक्षक हैं, इस देश की व्यवस्था के बड़े लोग. परदे के पीछे रह कर उन्हें बढ़ानेवाले या पालने-पोसनेवाले. बंगाल में भी बड़े-बड़े नेताओं के नाम आ रहे हैं. एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री की पत्नी का नाम भी उछला है. एक मामले में वकील की भूमिका का निर्वाह करने के संबंध में. जेवीजी से लेकर सारधा ग्रुप तक, सारी कंपनियों के पीछे या इस तरह के धंधे में डूबी कंपनियों के असल प्राणदाता, समाज और व्यवस्था के प्रहरी हैं :

असल मुजरिम!

सारधा ग्रुप चिट फंड कंपनी प्रकरण का असली मुजरिम कौन है? सुदीप्त सेन या इस देश की व्यवस्था? सुदीप्त सेन तो महज एक मोहरा या पात्र है. असल मुजरिम तो इस देश के शासक हैं. याद करिए, उदारीकरण के तुरंत बाद शेयर बाजार में घोटालों और चिट फंड घपलों की बाढ़ आ गयी. हर्षद मेहदा प्रकरण, फिर केतन पारीख प्रकरण. उसी दौर में चिट फंड कंपनियों और पारा-बैंकिंग कंपनियों की भी बाढ़ आयी.

याद करिए, जेवीजी, हेलियस, कुबेर और न जाने कितनी ही चिट फंड कंपनियों का रातोंरात उदय हुआ. कुछेक ने हेलीकाप्टर से डिपॉजिट मोबलाइजेशन (जमा संग्रह अभियान) शुरू किया. इन्हें बड़े-बड़े नेताओं का संरक्षण था. इनके हेलीकाप्टरों में बड़े-बड़े नेता यात्रा करते थे. इन कंपनियों के पक्ष में अखबारों में बड़े-बड़े एडवरटोरियल (दरअसल, खबर बिकने की शुरुआत यहीं से हुई) छपते थे. तब प्रभात खबर ने सवाल उठाया कि अर्थशास्त्र का वह कौन-सा फामरूला या चमत्कार है कि तीन वर्ष में धन दोगुना हो जायेगा? यह सरासर ठगी है.

प्रभात खबर पर मुकदमे हुए. पर हमने लगातार रपटें छापीं. देशज मान्यता है कि लोभी के गांव में ठग उपास नहीं रहते. यही हुआ. लाखों लोग तबाह हुए. आत्महत्याएं हुईं. जेवीजी, हेलियस, कुबेर वगैरह के लोगों पर शुरू में कुछ कार्रवाई हुई, फिर कुछ पता नहीं. न धन उगाहनेवाली कंपनियों का और न ठगे गये लोगों का. जमशेदपुर में चंडीगढ़ की एक कंपनी ने 33 हजार निवेशकों को ठगा. वर्ष 2000 में. लगभग सौ करोड़ रुपये. 2007 में गोल्डन फारेस्ट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने झारखंड में 85 हजार लोगों को ठगा. 250 करोड़ रुपये उगाहे और गायब. झारखंड, बिहार और बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में न जाने कितनी चिट फंड कंपनियां, लोगों को ठगने का काम कर रही हैं. पर यह सिलसिला बंद नहीं हुआ. अब नया प्रकरण सामने है.

पूर्वी सिंहभूम के इलाके में सारधा ग्रुप के दो सौ एजेंट थे और लगभग पांच सौ निवेशक. दरअसल, मूल प्रश्न यह है कि 1994 के बाद बार-बार ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति क्यों हो रही है? आज सारधा ग्रुप है. पहले जेवीजी, हेलियस, कुबेर वगैरह थे. फिर कोई चंडीगढ़ की कंपनी थी. फिर कोई गोल्डन फारेस्ट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गयी. यानी 1994 के बाद से ठगी का यह धंधा लगातार चल रहा है. पात्र बदल रहे हैं. कंपनियों के नाम बदल रहे हैं. लेकिन ठगने का यह धंधा अबाध चल रहा है. पर यह तो सिर्फ और सिर्फ कानून-व्यवस्था से ही रुक सकता है.

एक चौकस व्यवस्था ही इस तरह की गतिविधियों पर पाबंदी लगा सकती है. पर यह क्यों नहीं हो रहा? यह काम तो इस देश की सरकार या राज्य सरकारें या राजनीति ही कर सकती है. संसद कर सकती है. विधानमंडल कर सकता है. उन फोरमों पर क्यों ऐसे कानून नहीं बने, जिनके होने से दोबारा कोई चिट फंड कंपनी इस तरह ठगी का काम नहीं कर सकती? लोगों के अरबों लुट जाने के बाद अब केंद्र सरकार की नींद खुली है. कारपोरेट मामलों के मंत्री सचिन पायलट ने 73 कंपनियों की जांच के आदेश दिये हैं. बंगाल विधानसभा अब इस विषय पर दो दिन बहस करनेवाली है. पर चाहे केंद्र सरकार हो या संबंधित राज्य सरकार, अब किस चीज का पोस्टमार्टम होगा? पहले ही सख्त कानून बने होते, तो आज यह नहीं होता.

हद तो तब हो गयी, जब ममता बनर्जी ने सारधा ग्रुप द्वारा ठगे गये लोगों के लिए पांच सौ करोड़ के राहत कोष की घोषणा की. वह भी दस फीसदी जनता पर टैक्स लगा कर. जब ऐसी कंपनियां लोगों को ठग रही थीं, तो ममता बनर्जी की सरकार या अन्य संबंधित सरकारें क्या कर रहीं थी? केंद्र सरकार क्यों खामोश रही? अब जो जनता ठगी गयी, उसी पर दोबारा टैक्स लगा कर, उसी से पैसे वसूल कर, उसे ही राहत दी जायेगी. दुनिया की कोई समझदार व्यवस्था ऐसा कदम नहीं उठा सकती. तंबाकू खानेवालों ने क्या अपराध किया है कि उन्हें पुन: कर देकर अपनी जेब खाली करनी होगी. वह भी शासकों की गलती के कारण. नेता-अफसर या शासक, जो इसके असल मुजरिम हैं, वे क्यों नहीं अपनी तनख्वाह-सुविधाओं से इस लूट की भरपाई करते?

दरअसल, माजरा कुछ और है. ऐसी चिट फंड कंपनियों के असल संरक्षक हैं, इस देश की व्यवस्था के बड़े लोग. परदे के पीछे रह कर उन्हें बढ़ानेवाले या पालने-पोसनेवाले. बंगाल में भी बड़े-बड़े नेताओं के नाम आ रहे हैं. एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री की पत्नी का नाम भी उछला है. एक मामले में वकील की भूमिका का निर्वाह करने के संबंध में. जेवीजी से लेकर सारधा ग्रुप तक, सारी कंपनियों के पीछे या इस तरह के धंधे में डूबी कंपनियों के असल प्राणदाता, समाज और व्यवस्था के प्रहरी हैं. इन धंधेबाजों की पार्टियों में बड़े-बड़े नेताओं की उपस्थिति देखिए. दरअसल, जब तक यह जाल नहीं टूटेगा, तब तक ठगी का यह धंधा नहीं रुकनेवाला. एक कंपनी जायेगी, दूसरी आयेगी. यह सिलसिला चलता रहेगा.

वोट के लिए!

इस देश में स्वस्थ बहस बंद है. असल सवाल उठाने के लिए कोई जोखिम लेने या सच कहने को तैयार नहीं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने आतंकवादी हमलों के अनेक आरोपियों के खिलाफ दायर मामले उठा लिये हैं. निर्दोष लोग चाहे किसी भी जाति, धर्म के हों, उनके खिलाफ ऐसा अभियान चले, तो व्यवस्था का मानवीय चेहरा दिखता है. पर वोट बैंक के लिए, जिन लोगों पर गंभीर आरोप हैं, उन्हें पूरी छानबीन के बगैर मुक्त कर देना कैसे सही है? देश में लाखों की संख्या में अंडरट्रायल बंदी हैं, उनके लिए कहीं आवाज नहीं. समाजवादी सरकार ने हूजी (हरकत-उल-जिहाद अल-इसलामी) के उग्रवादी तारी कासमी के खिलाफ आतंकवादी हमले के कई मामले वापस कर लिये हैं.

22.05.2007 को गोरखपुर में सीरियल विस्फोट हुए. आधा दर्जन से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए. फिर लखनऊ, फैजाबाद और बनारस के अदालत प्रांगणों में सीरियल विस्फोट हुए. इन सब मामलों में कासमी आरोपी है. मान लिया जाये कि कासमी निर्दोष है, पर गोरखपुर, लखनऊ, फैजाबाद और बनारस में जो सीरियल विस्फोट हुए, उनके लिए कोई न कोई तो गुनहगार है. दोषी है. उनमें जो घायल हुए या मारे गये या जो क्षति हुई, उसके लिए कोई न कोई तो मुजरिम है? फिर सरकार ने ‘निर्दोष’ कासमी को रिहा किया, तो इन घटनाओं के मुजरिमों को क्यों नहीं पकड़ा? यह किसका फर्ज है? आज अमेरिका में कोई आतंकवादी घटना होती है, तो अमेरिका कहता है कि हम घंटों में नहीं, घंटे में दोषी की पहचान कर लेते हैं.

हमारे यहां कई गंभीर देशतोड़क घटनाओं को हुए वर्षो गुजर गये, कोई गुनहगार ही नहीं पकड़ा गया. इसके अतिरिक्त हूजी के लगभग आधा दर्जन से अधिक लोगों के खिलाफ देशद्रोह या राजद्रोह या विश्वासघात के मामले दर्ज थे, वे भी वापस ले लिये गये हैं. यह घोषणा उत्तर प्रदेश के गृह सचिव ने की है. दरअसल, कानून-व्यवस्था या न्याय को हम जाति, धर्म और समुदाय की नजर में देखेंगे, वोट के पलड़े में तौलेंगे, तो इससे सबका अहित होगा. देश एक नहीं रहेगा. कानून का धर्म है, अपराध देखना. वह चाहे किसी का हो. अगर कोई बेकसूर है, तो राजधर्म से उसे संरक्षण मिलना जायज है. पर यदि घटनाएं हुई हैं, तो घटनाओं के मुजरिम या दोषी तो कोई हैं, उन्हें पकड़ने और सजा दिलाने का राजधर्म किसका है?

नहीं सीखेंगे!

हमारा दावा है कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं. पर लोकतंत्र की सर्वश्रेष्ठ खूबियों, मर्यादाओं, आत्मानुशासन के अनुपालन में हम कहां खड़े हैं? प्रसंग पुराना है. 2012 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान की बात. मित्र रवि वाजपेयी अच्छी-अच्छी चीजें पढ़ाते रहते हैं. उन्होंने ही यह प्रसंग आस्ट्रेलिया से भेजा है. घटना 2012 की है. राष्ट्रपति ओबामा मतदान के पहले शिकागो में अपना वोट डालने गये. शाम का समय था. तय चुनाव दिन से पहले वोट डालनेवाले वह पहले अमेरिकी राष्ट्रपति थे. जहां वह वोट देने गये, वहां एक महिला अधिकारी थी. वोट डालने के पहले उसने राष्ट्रपति ओबामा से उनका पहचान पत्र मांगा. ओबामा ने अपना ड्राइविंग लाइसेंस दिखाया और मजाक में कहा भी कि इस तसवीर को इग्नोर (नजरअंदाज) करें, क्योंकि इसमें सिर पर कोई सफेद या भूरा बाल नहीं है. यानी पहचान पत्र में लगी तसवीर थोड़ी पुरानी है.

इस घटना के संदर्भ में हम अपनी व्यवस्था का चेहरा देखें. आकलन करें. हवाई अड्डों पर बड़े-बड़े लोगों की सूची लगी है, जो बगैर सुरक्षा जांच के हवाई जहाज तक आते-जाते हैं. अपवाद छोड़ दें. भारत के किसी जिले में कोई ट्रैफिक सिपाही किसी डीसी, एसपी या किसी आइपीएस-आइएएस से ड्राइविंग लाइसेंस मांग सकता है? विधायक, सांसद या मंत्री से उनका पहचानपत्र पूछ सकता है? दरअसल, कहने को यह लोकतंत्र है.

असल में यह नेताओं का राजतंत्र है. मित्र रवि वाजपेयी ने यह भी लिखा कि 1996 में आस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री जान हावर्ड को सिडनी में दोपहर के भोजन अवकाश में अकेले सड़क पर पैदल चलते मैंने देखा था. 11 सितंबर की घटना के बाद उनके साथ कुछ सुरक्षाकर्मी होते थे. आज भी यही हाल इंग्लैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया के राजप्रमुखों की सुरक्षा का है. पर भारत अद्भुत देश है. यहां के नेताओं की सुरक्षा, राजशाही शैली देखिए. जब इनके काफिले सड़क से गुजरते हैं, सामान्य लोगों को हटना पड़ता है. ऐसी अनेक चीजें हैं, जो हम दुनिया की अन्य लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से सीख सकते हैं.

यह भी सही है कि कुछ बड़े नेताओं पर खतरे हैं, पर जिन्हें खतरा है, उन्हें सुरक्षा मिले. सभी को क्यों? सुरक्षा जांच में भेदभाव क्यों? सुरक्षा स्टेटस सिंबल क्यों? जो पद पर हैं, उन्हें विशेष लाभ क्यों? कानून तो सबके लिए एक है. लोकतंत्र को भारत में मजबूत बनना है, तो बिना समय खोये हमें ऐसे मौलिक सुधारों के बारे में सोचना चाहिए.

अगर अमेरिका में एक ही स्कूल में सब बच्चे पढ़ सकते हैं, तो भारत में गरीबों के बच्चों और अमीरों के बच्चों के लिए अलग-अलग स्कूल क्यों? समाज में भेद की शुरुआत की बुनियाद तो यहां से है. पहले राजनीतिक दल व्यवस्था में सुधार की लड़ाई लड़ते थे. सत्ता पाना उनका पहला या सर्वोपरि मकसद नहीं होता था, बल्कि समतापूर्ण समाज कायम करना, मानवीय व्यवस्था के लिए संघर्ष करना उनका प्राथमिक धर्म होता था. पर आज के भारत में सत्ता, धन-दौलत और भोग की बाढ़ में राजनीतिक दल अपने मूल फर्ज भूल गये हैं. उन्हें सिर्फ और सिर्फ सत्ता चाहिए, इसके लिए वह कोई भी कीमत चुका सकते हैं.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा कुछ समय पहले प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है.

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