दलाली की दुकानें भी सक्रिय हो चुकी हैं

Surendra Grover : कुछ लोग राजदीप और आशुतोष पर लगातार हो रही गालियों की बौछार से परेशान हो गए हैं. कई दलाली की दुकाने सक्रिय भी हो चुकी हैं. वे कहते हैं कि निशाना मालिक राघव बहल होना चाहिए, बेचारे संपादक तो गालियाँ खाने को ही रखे जाते हैं. अब इन मूर्खों से पूछिये कि ये सम्पादक इस मसले पर चुप क्यों हैं? क्या ये संपादक आज होने वाले इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनेगें?

Surendra Grover : मेरी खुद्दारी ने मुझे कभी नौकरी नहीं करने दी. मेरे पिता के स्वर्गवास के लम्बे अरसे बाद जैसे ही मैं बालिग हुआ, मेरे पिता के पास ड्राइवर रहे एक श्रीमान जयपुर डेयरी के एमडी के ड्राइवर थे और उन्होंने एमडी साहब से कहकर मुझे जयपुर डेयरी में नौकरी दिलवा दी पर अपने राम तो मनमौजी ठहरे, सो एक महीने में इस नौकरी को तिलांजलि दे आये और पत्रकारिता करने लगे. बरसों बाद हमारे मित्र सुधेंदु पटेल उन दिनों "चौथी दुनिया" के समाचार संपादक थे और वे हमें घसीटते हुए अपने साथ दिल्ली ले आये तथा "चौथी दुनिया" का उप मुख्य संपादक बनवा दिया. लेकिन नौकरी करने की कला हमने सीखी ही नहीं थी. नतीज़न मात्र तेईस दिनों में ही "चौथी दुनिया" के संपादक संतोष भारतीय की आंख की किरकिरी बन गए और हमें यहाँ से विदा लेने का बहाना मिल गया. मेरे इस निर्णय को सुन सुधेंदु पटेल की आँखों से आंसू छलक आये. इससे पहले मैंने कभी सुधेंदु की आँखों में आंसू नहीं देखे थे. मैंने उन्हें किसी तरह कन्विंस किया कि मेरा "चौथी दुनिया" से चले जाना ही सबसे बेहतर विकल्प है और उनसे स्वीकृति ले वहां से छुटकारा पा लिया. मेरे इस निर्णय को भाई अनंत मित्तल ने भी आसानी से स्वीकार नहीं किया था. मेरे उस समय के साथी मीडिया के शीर्ष पर बैठे हैं. खैर, आज जब मीडिया इंडस्ट्री से मालिकों द्वारा रातों रात सैंकड़ों मीडियाकर्मियों को निकाल दिए जाने के हादसे देखता हूँ साथ ही मेरे कई पुराने साथियों की इस मुद्दे पर चुप्पी से मुझे लगता है कि यदि उस समय मैं नौकरी करने के लक्खन सीख कर हर हाल में इस मीडिया इंडस्ट्री की नौकरी में टिका रहता तो आज मैं भी शायद अपने मुंह पर टेप चिपका कर चुप बैठ जाता. नहीं मैं चुप नहीं रहूँगा. मैं हर हाल में उन पत्रकारों/मीडियाकर्मियों के साथ खड़ा मिलूँगा जो शोषण के शिकार हैं.. सभी मतभेद भुला कर…

Vikas Chauhan : सीएनएन आईबीएन और आईबीएन 7 में हुई छंटनी उन हज़ारों युवाओं के हौसले पर गहरा आघात है जो पत्रकारिता की दुनिया में अपना करियर बनाना चाहते हैं! इस क्षेत्र में नौकरी पाने के लिए पहले से ही लोगों को जो मेहनत और मशक्कत करनी पड़ती है उसका विश्लेषण करना न तो ज़रूरी है और ना ही इस विषय का संदर्भ! बात अब साफ हो चुकी है कि मीडिया इंडस्ट्री पर कॉर्पोरेट जगत का मॅनेज्मेंट बैक डोर से एंट्री मार चुका है! सवाल उठता है कि क्या जिन लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है उनको लिखित में स्पष्‍ट रूप से उन सभी कारणों का विवरण दिया गया है जिसके आधार उनकी छंटनी हुई है! इसकी गारंटी कौन लेता है कि आने वाले दिनों में उन सभी पत्रकार साथियों को नौकरी मिल जायेगा! सवाल उनका ही नहीं हम सभी का है! कुछ सवाल और कुछ जबाव दोनों के साथ पत्रकार साथी कल एकजुट हो रहे हैं..कुछ बेहतर होने की उम्मीद में!!

Alok Nandan : टीवी 18 ग्रुप में छटनी की तलवार चलने के बाद के राजदीप और आशुतोष की थू थू हो रही है…अब तक पत्रकारिता में इन लोगों ने जो कुछ कमाया था गवां चुके हैं….प्लांटवादी पत्रकारिता के क्रूर चेहरा का प्रतीक बन चुके हैं….मुल्क में पत्रकारिता के जिस मॉडल का ये प्रतिनिधि बने हुये हैं उसके खिलाफ अब आवाज बुलंद होने लगी है..लेकिन अब इस मसले को सिर्फ पत्रकारों के रोजी रोटी तक सीमित करने की जरूरत नहीं है….छंटनी तो प्लांटवादी पत्रकारिता का महज एक छोटा सा हिस्सा है….इस प्यार व्यापक बहस छेड़ने की जरूरत है। प्लाांटवादी पत्रकारिता पर हमला अंदर से होना चाहिये…इसके पूरे मैकेनिज्म को खंगालने का वक्त आ चुका है.. दिल्ली से बाहर होने की वजह से आईबीएन 7 के दफ्तर के बाहर तो मेरी मौजूदगी नहीं होगी…लेकिन इस मुहिम मैं जेहनी तौर पर उन लोगों के साथ हूं जो प्लांटवादी पत्रकारिता के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं…. प्लांटवादी पत्रकारिता पत्रकारों का इस्तेमाल मशीन के कलपुर्जों की तरह करती है…जब तक कलपूर्जों के रूप में पत्रकार की उपयोगिता प्लांट में है तब तक रखते हैं, जरा सा खर्रखुर करने पर निकला फेंकते हैं और उनके स्थान पर दूसरे पत्रकारों को फिट कर देते हैं…इस तरह से प्लांट चलता रहता है..खबरों की कांट छांट और नक्काशी करने वालों को इस सिस्टम में तरजीह देता है…लेकिन बौद्धिक स्तर पर उन्हें कुछ भी सोचने की इजाजत नहीं होती है….पत्रकार पूरी तरह से मैकेनिकल हो जाते हैं…और इसे ही पत्रकारिता की हकीकत मान लेते हैं..पत्रकारिता की तमाम बातें कंप्यूटर की खटपट में गुम हो जाती है, जैसे कंप्यूटर और कैमरा के आने के पहले पत्रकारिता थी ही नहीं….प्लांटवादी पत्रकारिता में पत्रकारिता पर मशीन हावी हो गया है…जो मशीन को सही तरीके से हांक सकते हैं वे भी काबिल पत्रकार के रूप में शुमार होते हैं….प्लांटवादी पत्रकारिता में बेहतर पत्रकार बनने की पहली शर्त है बेहतर मशीन बनना और मशीन की गति के साथ खुद को चला पाना…प्लांटवादी पत्रकारिता सही मायने में प्रखर पत्रकारों को हतोत्साहित कर रही है….पूंजी इनवेस्टमेंट और प्रॉफिट इसका मूलमंत्र है….प्रॉफिट की हवश दिन प्रति बढ़ती ही जा रही है….दुनिया भर के तमाम प्रोडक्ट्स प्लांटवादी पत्रकारिता के पोषक हैं…विज्ञापनों के रूप में ये प्लांटवादी पत्रकारिता को खाद्य और पानी मुहैया कराती है…और जो पत्रकार इनकी राह में बाधा बनते हैं या फिर इनसे इतर सुर बघारते हैं उन्हें पत्रकारिता के बाजार से आउट कर देती है….क्रिकेट, क्राइम और सिनेमा प्लांटवादी पत्रकारिता के मुख्य विषय है…जनसरोकारों वाली खबरों की तरफ तब तक देखना तक गंवारा नहीं समझते जब तक लोग सड़कों पर उतर हंगमा नहीं काटने लगते…इन्हें फिल्मी तर्ज पर एक् शन चाहिए, अंदर खाते प्लांटवादी मानसिकता वाले पत्रकार सियासतदानों के हरम में लौंडा नाच भी खूब करते हैं….

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