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लखनऊ

‘दलित दस्तक’ के पत्रकार के साथ लखनऊ में सिपाही ने की गुंडई

Akhilesh Krishna Mohan : दिल्ली से प्रकाशित दलित चिंतन की मैग्जीन 'दलित दस्तक के लखनऊ संवाददाता दिव्यांशु आज लखनऊ के अलीगंज से गुजर रहे थे तो उनके स्कूटर का पुलिसकर्मी जे. उपाध्याय ने यह कहते हुए चालान कर दिया कि तुम 'दलित दस्तक' का प्रेस स्टीकर लगाकर कैसे चल सकते हो। गाड़ी के सभी कागज मौजूद थे, दिव्यांशु हेलमेट भी लगाए हुए थे और जो लखनऊ में नहीं देखा जाता पॉल्यूशन का कागज भी दिव्यांशु के पास था। खबर है कि पुलिसकर्मी जे. उपाध्याय ने दलित विरोधी शब्द भी बोले। पत्रकार ने एसएसपी और मुख्यमंत्री से गुंडई करने वाले सिपाही जे. उपाध्याय की शिकायत करने की तैयारी की है। एक भी कागज ऐसा नहीं था जो दिव्याशु के पास नहीं था। वो हेलमेट भी पहने थे। इसके बाद भी सिपाही ने यह कहते हुए चालान किया कि तुमने 'दलित दस्तक' का स्टीकर क्यों लगाया। ऐसी गुंडई तो अगर पुलिस वाला कर रहा है तो फिर बाकी दबंग करेंगे ही।

Akhilesh Krishna Mohan : दिल्ली से प्रकाशित दलित चिंतन की मैग्जीन 'दलित दस्तक के लखनऊ संवाददाता दिव्यांशु आज लखनऊ के अलीगंज से गुजर रहे थे तो उनके स्कूटर का पुलिसकर्मी जे. उपाध्याय ने यह कहते हुए चालान कर दिया कि तुम 'दलित दस्तक' का प्रेस स्टीकर लगाकर कैसे चल सकते हो। गाड़ी के सभी कागज मौजूद थे, दिव्यांशु हेलमेट भी लगाए हुए थे और जो लखनऊ में नहीं देखा जाता पॉल्यूशन का कागज भी दिव्यांशु के पास था। खबर है कि पुलिसकर्मी जे. उपाध्याय ने दलित विरोधी शब्द भी बोले। पत्रकार ने एसएसपी और मुख्यमंत्री से गुंडई करने वाले सिपाही जे. उपाध्याय की शिकायत करने की तैयारी की है। एक भी कागज ऐसा नहीं था जो दिव्याशु के पास नहीं था। वो हेलमेट भी पहने थे। इसके बाद भी सिपाही ने यह कहते हुए चालान किया कि तुमने 'दलित दस्तक' का स्टीकर क्यों लगाया। ऐसी गुंडई तो अगर पुलिस वाला कर रहा है तो फिर बाकी दबंग करेंगे ही।

Shiv Das अखिलेश भाई। आपकी सूचना में दो बातें हैं जिसे मैं रखना चाहता हूं। पहले यह कि माननीय न्यायालय के आदेशों के तहत प्रेस, पदनाम या अन्य किसी प्रकार के स्टिकर को वाहन पर चस्पा कर चलना गैर-कानूनी है। दूसरा, यह कि अगर पुलिसकर्मी जे. उपाध्याय ने 'दलित दस्तक' शब्द की उल्लेख दुर्भावनापूर्ण ढंग से किया है तो फिर इसके खिलाफ लड़ाई लड़नी चाहिए। इस लड़ाई में हम आपके साथ हैं। हालांकि यह स्पष्ट कैसे होगा, यह जरूरी विषय है।

 Akhilesh Krishna Mohan शिवदास जी हम लोग तो इसी में उलझे रहते हैं कि हाईकोर्ट ने क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा। अरे भाई जब प्रेस लगाकर फर्जी पत्रकार चल रहे हैं कोर्ट और पुलिस कुछ नहीं बोल रही है बल्कि सलूट कर रही है तो हम लोग तो काम करते हैं सचिवालय विधानसभा की रिपोर्टिंग करते हैं। इस तरह की बाते हम लोग करते हैं तभी कुछ नहीं कर पाते हैं केवल चिल्लाते रहते हैं बस।  जे उपाध्याय ने अपनी गलती मानते हुए हेलमेट सिर पर न होने या ठीक से नहीं देखने की दलील दी है। खैर मामला एससपी या डीजीपी तक जाने से बच गया लेकिन एक बात रही दलित दस्तक के मुद्दे पर जे उपाध्याय ने कहा कि हमारे लिए दलित दस्तक या दैनिक जागरण, अमर उजाला सब बराबर है। मैं ऐसा नहीं कर सकता। खैर चालान का उपाध्याय ने तुरंत थाने में ही निपटारा करवाया। मामले का पटापेक्ष हो गया है। लेकिन दोस्तों आवाज गलत लोगों के खिलाफ दबनी नहीं चाहिए। चाहे कोई कितना भी बड़ा हो लेकिन हमें एक होकर मुकाबला करना ही है।

अखिलेश कृष्ण मोहन के फेसबुक वॉल से.

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