दलित सरपंच को मटका नहीं छूने देता सवर्ण ग्राम सेवक!

: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की दो दिवसीय जनसुनवाई के सामने उजागर हुए दलित अत्याचार के मामलों में उपेक्षा के कारनामे : ‘मैं गांव का सरपंच हूं परंतु मेरा ग्राम सचिव जो मेरे अधीन है, मुझे पानी का मटका छूने तक नहीं देता, क्योंकि वह ब्राम्हण है और मैं नीची जात का दलित।’गिरधारीलाल मौर्य की यह बात सुनते ही उस मीटिंग हाल में सन्नाटा छा गया। गिरधारी लाल मौर्य राजस्थान की राजधानी जयपुर की जमवारामगढ़ तहसील की ग्राम पंचायत खरकड़ा का सरपंच है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सुनवाई कार्यक्रम में उसे भी अपनी व्यथा सुनाने का मौका मिला था। आयोग अध्यक्ष न्यायमूर्ति केजी बालाकृष्णन समेत आयोग के सदस्य और राजस्थान के मुख्य सचिव सीके मैथ्यू समेत आला अधिकारी उसकी बात सुनकर अवाक रह गए।

गिरधारी ने आगे बताया, ‘उंची जात वालों सवर्ण की रसोई में कुत्ते-बिल्ली जाकर खा-पी सकते हैं, परंतु दलितों को आज भी अंदर झांकने तक नहीं दिया जाता। आजादी के 66 साल बाद भी दलित उनके मटके से पानी नहीं पी सकते। उनकी मौजूदगी में खाट पलंग या चारपाई पर बैठना अपराध है। ऐसे कई मामले हैं अगर हममें से कोई जात-पांत भेदभाव या छूत-अछूत की बात कहता है तो हमारे खिलाफ सरकारी कामकाज में बाधा के झूठे मुकदमे दर्ज करवाकर थाने में बंद करवा देते हैं।’

मानवाधिकार आयोग अपनी पूर्व निर्धारित दलितों की जनसुनवाई में 13 व 14 सितंबर 2012 को लगातार दो दिन राजस्थान की ऐेसी कई दर्दनाक हकीकतों से रूबरू हुआ जो इस तथ्य का जीता जागता सबूत थीं कि सदियों से कुछ नहीं बदला है। सुनवाई हरीशचंद्र माथुर राजस्थान राज्य लोक प्रशासन संस्थान में आयोजित की गई थी। इसके लिए अखबारो में विज्ञापन के जरिए 25 जुलाई तक राजस्थान के दलितो से सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए गए अत्याचार या उनके द्वारा अत्याचार रोकने में बरती गई लापरवाही की शिकायत मांगी गई थी।

यदि और कोई अवसर होता या किसी और वर्ग पर अत्याचार की बात होती तो शायद मीडिया आधा पेज से ज्यादा कवरेज देता और टीवी चैनल के लिए गिरधारी लाल की बात ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बन जाती परंतु यह सुनवाई मीडिया की उपेक्षा की शिकार का उदाहरण बन गई। राजस्थान पत्रिका जैसे अखबार के मालिक गुलाब कोठारी जो हर हफते अपने अखबार में मानवीय संवेदना और संस्कृति की लम्बी-चैड़ी बातें लिखते हैं परंतु आरक्षण को लेकर अपनी सवर्ण मानसिकता छिपा नहीं पाते ने भी इस सुनवाई को लगभग पूरी तरह उपेक्षित कर अपनी मानसिकता जाहिर कर दी।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृह जिले जोधपुर के शेरगढ़ उपखंड के जेठानिया गांव के सात परिवारों ने हुक्का-पानी बंद होने की व्यथा सुनाई। मिनी बस की टक्कर से एक युवक की मौत के बाद उसके रिश्तेदारों ने बस वाले से जुड़े सात परिवारों का सामाजिक बहिष्कार करवा रखा है। हालांकि पुलिस ने दुर्घटना के आरोप में ड्राईवर समेत तीन लोगों को गिरफतार कर जेल में डाल दिया फिर भी वे पांच लाख रूपए मुआवजे की मांग पर अड़ गए। जब देने में असमर्थता बताई गई तो उन पर दूसरे तरीके से अत्याचार शुरू कर दिए गए।

पीड़ित पक्ष के शुगर मरीज बाबूलाल की तबियत बिगड़ने पर कोई उन्हें इलाज के लिए जोधपुर अस्पताल ले जाने के लिए तैयार नहीं हुआ, परिणामस्वरूप 31 अगस्त को 40 साल के बाबूलाल ने दम तोड़ दिया। इतना ही नहीं 36 घंटे तक गांव में अंतिम संस्कार नहीं करने दिया गया, उसकी लाश पड़ी रही। आखिरकार 42 किलोमीटर दूर चतुरपुरा गांव जाकर दाह-संस्कार करना पड़ा। सामाजिक बहिष्कार के चलते गांव के 12 बच्चों को शिक्षकों ने स्कूल में पढ़ाने से मना कर दिया है। इस मामले में पीडि़तो की ओर से 42 लोगों के खिलाफ पुलिस में मुकदमा दर्ज करवाया हुआ है परंतु पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही क्योंकि विधायक बाबू सिंह राठौड़ आरोपियों के साथ हैं।

राजधानी जयपुर के फागी उपखंड के रामेदव बैरवा के मामले में जयपुर के जिला कलेक्टर नवीन महाजन ने कहा कि जमीन बेचान की रजिस्ट्री रद्द कराने के लिए अलग कानून है। आयोग सदस्य सत्यव्रत पाल ने पूछा, कौन सा कानून है? तो महाजन जवाब नहीं दे सके। सांभर तहसील में भूमि आंवटन के मामले में फटकार के बाद कलेक्टर महाजन ने माना कि गलत आवंटन हो गया है। अपने नंबर बढ़वाने आए राज्य के श्रम आयुक्त राजेश यादव का नंबर आया तो उनसे पूछा गया कि मुक्त कराए गए बंधुआ मजदूरों की जाति क्या है? तो वे बोले कि ऐसी सूचना नहीं रखी जाती। दलित मजदूर होने का जिक्र आया तो आयोग सदस्य ने यादव को कानून पढ़कर मुआवजे की राशि बताई।

राजधानी जयपुर से सटे जिले दौसा की श्रीमती सजना देवी के पति की छह साल पहले हत्या हो गई थी। दर-दर भटकने के बावजूद उसे आज तक सरकारी मदद नहीं मिल पाई है। आयोग सदस्य बीसी पटेल के सामने जब यह मामला आया तो उन्होंने दौसा कलेक्टर आरएस जाखड़ की जमकर खिंचाई की। उन्होंने इस ढिलाई पर नाराजगी जताते हुए जिला प्रशासन पर कानून का मखौल उड़ाने और मामला ठंडे बस्ते में डाल देने आरोप लगाया। इस पर कलेक्टर जाखड़ ने मृतक के बच्चों की पढ़ाई और विधवा को तीन हजार महीना पेंशन के इंतजाम की बात कही।

पाकिस्तान से सटे बालोतरा निवासी गणपत लाल ने बताया कि पश्चिमी राजस्थान में नाई दलितों के बाल नहीं काटते। गोपाल केशावत ने कहा कि सांसी, नट, कंजर, बावरिया आदि जाति के महिला-पुरूषों को पुलिस आए दिन गिरफतार कर थाने में बंद कर देती है।
राजस्थान में किस हद तक दलित अत्याचार है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आयोग को सुनवाई के लिए करीब 300 शिकायतें मिलीं परंतु उन्होने 114 का ही चयन किया। इन 114 में भी आयोग को सुनवाई के लिए 17 सदस्यीय दल लाना पड़ा जिनकी दो बैंच बनानी पड़ी और राजस्थान के 32 जिलों में से 25 जिलों के पुलिस अधीक्षक और 17 जिले के कलेक्टरों को दलित अत्याचार के मामले में सुनवाई के दौरान उपस्थित रहने, जवाब देने और समाधान करने के लिए बुलाना पड़ा।

हैरानी की बात है कि सुनवाई के पहले आयोग अध्यक्ष मुख्य न्यायाधिपति ने यह रहस्योद्घाटन किया कि राजस्थान में दलित अत्याचार की दर राष्ट्रीय औसत दर से करीब तीन गुना अधिक है। मुख्य सचिव सीके मैथ्यू ने भी माना कि प्रदेश में दलितों पर अत्याचार के मुकदमे अधिक दर्ज हो रहे हैं जबकि सजा की दर काफी कम है। 

राजेंद्र हाड़ा राजस्थान के अजमेर के निवासी हैं. करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं. उनसे संपर्क 09549155160, 09829270160 के जरिए किया जा सकता है.

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