दागदार हैं निजी बैंकों के दामन

ऑनलाइन बेबपोर्टल कोबरा पोस्ट द्वारा आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक और एक्सिस बैंक के विरुद्ध धन शोधन का आरोप लगाया गया है। कोबरा पोस्ट के एसोसिएट संपादक सैयद मसरुर हसन ने स्टिंग ऑपरेशन की सहायता से एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाई है, जिसका फिल्मांकन उन्होंने देश भर में निजी बैंकों की 40 शाखाओं में जाकर किया है। इस फिल्म के सूत्रधार तो स्वंय हसन साहब हैं, जिनका कहानी में नाम राजेश शर्मा है। अन्य किरदारों में तीन प्रमुख निजी बैंक के शाखा प्रबंधक, रिलेशनशिप प्रबंधक एवं क्षेत्रीय प्रबंधक हैं। सभी अधिकारी मध्यम एवं वरिष्ठ श्रेणी के हैं, जिन्हें नासमझ तो कदापि नहीं कहा जा सकता है।

बैंक में वरिष्ठ श्रेणी के अधिकारी को प्रबंधन का हिस्सा माना जाता है। इसलिए आला अधिकारियों द्वारा यह कहना कि बैंक की शाखाओं में चल रहे इस तरह की गैरकानूनी गतिविधियों से वे अनजान थे, महज कोरा गप है, क्योंकि इस तरह का बयान देना किसी बैंक प्रमुख का बैंक बिजनेस से अनजान होने के समान है। आम लोगों के लिए कोबरा पोस्ट की यह खबर सनसनीखेज हो सकती है, लेकिन जानकारों की मानें तो इस तरह के आरोप निजी बैंकों के खिलाफ शुरू से ही लगते रहे हैं। हाल ही में इसी तरह का आरोप खुलासामैन श्री अरविंद केजरीवाल ने एचएसबीसी बैंक के विरुद्ध लगाया था। कुछ दिनों तक हो-हल्ला मचा, फिर सरकार के ठंडे रवैये के कारण मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

गौरतलब है कि निजी बैंक, बैंकिंग कार्य अधिकांशतः एजेंटों की मदद से करते हैं। खर्चे में कटौती के नाम पर वहाँ स्थायी अधिकारियों की बहाली कम की जाती है। संविदा पर भर्ती किये गये मानव संसाधन या एजेंट के द्वारा निजी बैंकों का परिचालन किया जाता है। ठेका संस्कृति की पैरोकारी करने की वजह से लाभ कमाने के लिए वे किसी भी हद तक चले जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में भले ही निजी बैंकों की शाखा नगण्य है। फिर भी उनके एजेंट गाँव-गाँव घूमकर ट्रैक्टर बाँट देते हैं। साथ ही, किस्त या ब्याज की अदायगी में चूक करने पर डंडे की जोर पर किसानों से वसूली भी कर लेते हैं।

इतना ही नहीं बचत एवं चालू खाते के संचालन में भी उनके द्वारा नियमों की अवहेलना की जाती है। क्रेडिट कार्ड के मामले में तो वे महाजनों को भी मात दे देते हैं। बैंकिंग नियमों की अवहेलना करना उनकी फितरत में शामिल है। आहिस्ता-आहिस्ता वे रिजर्व बैंक एवं अन्य नियंत्रणकर्त्ता एजेंसियों द्वारा मुकर्रर नियमों की अवहेलना करने के आदी हो चुके हैं। वे जानते हैं कि स्पीड मनी के बलबूते पर मामला रफा-दफा हो जाएगा। लिहाजा गलती पकड़े जाने पर आतंरिक जाँच की रस्म अदायगी कर उन्हें मामले से छुटकारा मिल जाता है। गौरतलब है कि इस कांड में भी आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक और एक्सिस बैंक ने मामले की आतंरिक जाँच करवाने की बात कही है और वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने उक्त प्रस्ताव पर संतोष जाहिर किया है, जबकि मामले की गंभीरता के अनुपात में सरकार द्वारा उठाये गये कदम को प्रर्याप्त नहीं माना जा सकता है।

यहाँ पर सवाल उठना लाजिमी है कि निजी बैंकों के द्वारा क्यों बार-बार नियंत्रणकर्त्ता एजेंसियों के नियमों को ताक पर रख करके मनमानी की जाती है। जाहिर सी बात है बिना किसी बड़ी वजह के वे ऐसा कदापि नहीं करेंगे। मौजूदा परिदृष्य में किसी भी कार्य को करने के लिए मनी को सबसे बड़ा उद्दीपक माना जा सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में निजी बैंक का भी उद्देश्‍य है अकूत लाभ अर्जित करना, जोकि रिजर्व बैंक, सेबी, इरडा, फेमा, आयकर, बैंकिंग एवं अन्यान्य नियमावलियों में बंधकर संभव नहीं है।

निजी बैंक जानते हैं कि प्रारंभिक स्तर पर बैंकिंग कार्यों को भले ही एजेंटों के जरिये अमलीजामा पहनाया जा सकता है, लेकिन उनसे काम करवाने के लिए कुशल एवं प्रतिबद्ध मानव संसाधन की जरूरत होगी। लिहाजा भारी-भरकम पैकेज पर निजी बैंकों में कुशल एवं अनुभवी बैंककर्मियों की भर्ती की गई, जिनमें से अधिकांश सरकारी बैंकों से पलायन करने वाले अधिकारी थे, जो मोटी तनख्वाह के एवज में नियम से हटकर भी काम करने के लिए तैयार थे। बता दें कि सरकारी बैंक के अधिकारी निजी बैंक के अपने समकक्ष अधिकारियों से कम वेतन पाते हैं, लेकिन काम वे नियमानुकूल करते हैं, क्योंकि नियंत्रणकर्ता प्राधिकरणों के दिशा-निर्देशों की अवहेलना करने की स्थिति में उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दी जाती है। गंभीर मामलों में उन्हें नौकरी से बर्खास्त भी कर दिया जाता है, जबकि निजी बैंकों में ऐसा करने पर उन्हें पुरस्कृत किया जाता है।

बैंक में सामान्यतः प्रत्येक शाखा को वित्तीय वर्ष के आरंभ में बजट आवंटित किया जाता है, जिसकी समीक्षा साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक आधार पर की जाती है। बिजनेस ग्रोथ के आधार पर प्रबंधकों को इन्क्रीमेंट, बोनस एवं प्रोन्नति दी जाती है। किसी शाखा का बिजनेस ग्रोथ यदि अप्रत्याशित रूप से बढ़ता है, तो शाखा प्रबंधक को ईनाम के तौर पर प्रोन्नति तक दी जाती है। कई निजी बैंकों में अच्छा पदर्शन करने वाले अधिकारियों की वेतनवृद्धि नियम के विरुद्ध की जाती है। कई मामलों में बैंक के उच्च पद पर आसीन अधिकारी उत्कृष्ट कार्य करने वाले प्रबंधकों को नगद पुरस्कार भी देते हैं। इस तरह के पुरस्कार समारोह में खराब प्रदर्शन करने वाले प्रबंधकों को जलील भी किया जाता है, नौकरी से निकालने तक की धमकी तक दी जाती है, जिसके कारण दूसरे प्रबंधक बैंकिंग नियमावली की अनदेखी करने के लिए प्रेरित होते हैं।

बीते दिनों निजी बैंकों ने एनपीए में कमी करके सरकार की खूब वाहवाही लूटी थी और सरकारी बैंकों को इस मुद्दे पर जलील होना पड़ा था, पर किसी ने यह जानने की जहमत नहीं उठाई कि एनपीए कम करने के लिए निजी बैंकों ने किस तरह के विकल्पों का सहारा लिया था। अमूमन निजी बैंक के लिए डूबत खातों में रकम वसूलने का कार्य रिकवरी एजेंट करते हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि निजी बैंकों के द्वारा अधिकृत रिकवरी एजेंटों की पृष्ठिभूमि अपराधी प्रवृति की होती है, जो वसूली हेतु हर तरह के हथकंडे अपनाते हैं।

वर्तमान परिवेश में बैंक के शाखा स्तर पर मूलतः तीन तरह के कार्य किये जाते हैं। जमा स्वीकार करना, ऋण वितरित करना और क्रास सेलिंग के द्वारा आय अर्जित करना। क्रास सेलिंग के अंतर्गत मुख्य रुप से बैंकों के द्वारा अनुषंगी कंपनियों के बीमा उत्पादों को बेचा जाता है। इसके अलावा विगत वर्षों में बैंकों द्वारा ग्राहकों को विभिन्न तरह की सेवा उपलब्ध करवाने का चलन भी बढ़ा है। इस तरह की सेवा के बदले ग्राहकों से शुल्क लिया जाता है। मोटे तौर पर बैंकों को वर्णित बैंकिंग कार्यकलापों के माध्यम से परिचालित किया जाता है, पर कभी-कभी निजी बैंकों के अधिकारियों द्वारा टारगेट पूरा करने के लिए लीक से हटकर भी कार्य किया जाता है। कोबरा पोस्ट के खुलासे में भी इसी तरह की बात कही गई है। कोबरा पोस्ट के एसोसिएट संपादक सैयद मसरुर हसन के द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक और एक्सिस बैंक की शाखाओं में अधिकारीगण उन्हें बीमा उत्पाद, रिटायरमेंट प्लॉन एवं विविध बेनामी उत्पादों के नाम पर धन शोधन करने का लालच दे रहे थे। उनके द्वारा बिना केवाईसी नियमों के अनुपालन के लॉकर सुविधा देने का भी प्रस्ताव रखा गया था। वर्ष, 2011 में भी कुछ विदेशी बैंकों के द्वारा धन शोधन करने एवं हवाला के माध्यम से पैसा विदेश भेजने का मामला प्रकाश में आया था। स्टैण्डर्ड चार्टड बैंक के धन प्रबंधकों ने भी धन प्रबंधन के मामले में गड़बड़ी की थी। उसी साल सिटी बैंक में 500 करोड़ रुपये के फर्जीवाड़ा को अंजाम दिया गया था। इस फ्राड का मास्टरमाइंड था शिवराज पुरी, जिसने शेयर, डेरीवेटिव एवं फर्जी निवेश स्कीम के नाम पर ग्राहकों को ठगा था।

इसमें दो राय नहीं है कि आज बैंकिंग क्षेत्र में गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा है, लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि निजी बैंक बैंकिंग के स्थापित मानकों को दरकिनार करते हुए आपराधिक घटना को अंजाम दें। तीन प्रमुख निजी बैंकों द्वारा की जा रही अनियमतता को सिर्फ धन शोधन तक सीमित नहीं माना जा सकता है। किसी भी व्यवसाय से लाभ अर्जित करना तार्किक हो सकता है, लेकिन इस क्रम में यदि बैंककर्मियों के द्वारा अपराध को बढ़ावा दिया जाता है या फिर उनके कृत्य से आंतकवादियों को देश में पैर पसारने का मौका मिलता है तो उसे कदापि देश के हित में किया गया कार्य नहीं मान सकते। अस्तु इस मामले की जाँच एक स्वतंत्र एजेंसी से करवाने की जरूरत है, ताकि सच्चाई की तह तक पहुँचा जा सके। इस बाबत सीबीआई एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है, क्योंकि यह आर्थिक अपराध के अतिरिक्त देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ मामला भी हो सकता है।

लेखक सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से हिन्दी पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह से satish5249@gmail.com या मोबाईल संख्या 08294586892 के जरिये संपर्क किया जा सकता है।

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