दादा ने आजतक की सफलता को कभी अपने सिर चढ़ने नहीं दिया

दादा आखिरकार रिटायर हो गए. दादा यानि कमर वाहिद नकवी. मीडिया में बहुत दिन नहीं हुए. १० साल में इतना कुछ देखा, सुना और जाना कि अब और ज्यादा जानने की तमन्ना नहीं है. कोई पत्रकार दिल से इज्जत हासिल कर पाया हो, ऐसा भी नहीं है. जरनैल सिंह को दिल से प्यार करता हूँ. हमेशा उस खुद्दार आदमी से कहा भी कि भाई हर वक़्त तुम्हारे साथ हूँ, लेकिन जरनैल ने कभी बेहद मुश्किल वक़्त में भी मदद का एक लफ्ज नहीं बोला. पक्का सरदार. अच्छा इंसान और शानदार पत्रकार, लेकिन जरनैल को सफलता के पैमाने पर आंकें तो शायद बहुत बड़े ''असफल'' करार दिए जाएँ.

खैर, यहाँ प्रसंग दूसरा है. बात हो रही थी दादा की. कभी हमारी बात नहीं हुयी. बस किन्हीं सेमिनारों में उनको सुनने का मौका मिलता. जीभर सुनता, बड़ी-बड़ी लफ्फाजी नहीं करते थे, जितने सीधे थे शायद उतने ही सीधे तरीके से अपनी बात रखते, बस ''दादा'' की इसी सादगी ने जान ले ली. कहते हैं न कि ''सादगी भी तो कयामत की अदा होती है''. अब जब दादा के एक लम्बी पारी खेलकर आजतक से रिटायर होने की खबर पढ़ी तो अरसे से लगभग भूल चूका उनका चेहरा दिमाग के सामने घूम गया. ये सिर्फ मुझे और दादा को पता है कि कैसे हम हर त्यौहार और खास मौकों पर एक दूसरे को जीभर विश करते थे और वो भी दिल से.

मेरा नाम वैसे ही काफी कर्रा है, ''हृदयेंद्र'', आज तक लोग एक बार में बोल ही नहीं पाते, वहीँ दादा हर मैसेज का जवाब मेरे नाम से शुरू करते और पूरे दिल से घरभर को बधाई देते उस खास मौके पर. खास बात ये कि वो मैसेज रेडीमेड नहीं होते थे. दादा हर सन्देश का जवाब देते. भले करियर से जुड़ी कोई उलझन रही हो, कोई बधाई देना रहता हो या कुछ और, हमेशा सोचता यार जब मीडिया के बड़े-बड़े तुर्रम खान बेवजह मैसेज का जवाब न देकर, किसी छोटे कद के इंसान से बात न कर और ''व्यस्त'' होने का झूठा दंभ भरते नहीं थकते हैं, वहीँ ये इंसान बिना किसी तामझाम के आपकी क़द्र करता है, बिना ये जाने कि आपका कद क्या है?

मुझे ''आजतक'' में नौकरी कभी नहीं करनी थी, जो मैं ''नकवी सर'' को तेल मालिश करता और उनका दीवाना भी उनकी सादगी के चलते ही हुआ था. अच्छा लगा कि मीडिया में एक आदमी ''खोखला'' नहीं निकला. वो थे कमर वाहिद नकवी यानि क्यू . ए. नकवी. अच्छा लगा कि दादा आपने सफलता को अपने सर नहीं चढ़ने दिया. अच्छा लगा ह‍ि मीडिया में मुझ जैसे नौनिहाल की कई उलझनें सुलझाई. अच्छा लगा कि जब मैंने आपसे मिलने के लिए वक़्त माँगा आपने बेहद मशरूफियत के बाद भी दिया (वो अलग बात है कि मैं तय वक़्त पर आपसे मिलने नहीं जा सका). अच्छा लगा दादा कि आप अपनी ढेर सारी अच्छाइयों के साथ मीडिया में मौजूद हैं. आपसे कल न किसी चीज की ख्वाहिश थी न आज किसी चीज की ख्वाहिश है.

बस दादा आपको और आगे देखना चाहता हूँ, और आगे, ताकि इंसानियत, इमानदारी और भली चीजों में भरोसा कायम रह सके. शुक्रिया दादा, मेरे लिए इतने भले और प्यारे बने रहने का, शुक्रिया दादा आपमें मेरा भरोसा कायम रखने का. दादा आपसे ही हिम्मत मिली थी कि ''प्रेम विवाह'' करता. आपने अपने बड़प्पन का कभी ढिंढोरा नहीं पीटा लेकिन बड़ी ख़ामोशी से बहुत बड़ी बड़ी चीजें कर दी. यही थे आप……यानि कमर वाहिद नकवी….और हमारे दादा…थोड़ा भावुक हो रहा हूँ, इसलिए इतना ही. उम्मीद है मीडिया में मौजूद मेरे वरिष्ट इस बात को समझेंगे कि कैसे उनकी एक-एक बात पर एक जूनियर गौर करता है, और हर सीनियर में अपना आदर्श हम जैसे नौजवान खोजते हैं. काश मीडिया के स्वम्भू दिग्गज समझ पाते ''दादा'' होने का मतलब……आखिर में इतना ही ….लव यू दादा….मिलेंगे, मेरी किताब की लांचिंग पर जल्द. शुक्रिया यशवंत भैय्या…दादा को उनके हक का सम्मान भड़ास के जरिये पहुँचाने का.

लेखक हृदयेंद्र सिंह पेशे से पत्रकार हैं. गल्‍फ के कई अखबारों के लिए रिपोर्टिंग. लगभग सभी नामचीन मीडिया हाउस में काम करने के बाद फिलहाल सरकारी सेवा में.  

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