‘दामिनी’ को एक युवा साहित्यकार की श्रद्धांजलि

महोदय, मेरा नाम आशीष सिंह 'मनमौजी' है. मैं उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले का निवासी हूँ. साहित्य मैं रूचि होने के कारण कविताएं लिखता हूँ. पिछले वर्ष २९ दिसम्बर २०१२ को देश जिस शोक में डूबा था, उस दामिनी के बाद ना जाने आज भी कितनी दामिनी काण्ड हो रहे हैं. मैंने उस घटना को महसूस किया और दामिनी को अपनी बहन मानते हुए एक कविता लिखी और चाहा कि समाचार पत्रों में इसे स्थान मिले. मैं इसे लेकर कई समाचार पत्रों के कार्यालयों पर गया पर हर जगह एक ही बात सुनने को मिली 'चुनाव चल रहे हैं ऐसी चीज़ें छापने के लिए स्थान नहीं है'. फिर मेरे एक मित्र ने आपको इस बारे में सूचित करने को कहा सो मैंने मेल कर दिया. जो दामिनी के माता पिता ने खोया उसे तो लौटा नहीं सकता पर चाहता हूँ कि इस रचना के माध्यम से उनके दर्द को बांटा जा सके. 
 
मेरी बहना 'दामिनी'
 
'द' से द्रोपदी 'द' से दामिनी, दोनों ने अपनी लाज समेटी
एक थी हस्तिनापुर की रानी, दूजी भारत माँ की बेटी
भरी सभा में दुष्ट दुःशासन, को श्री कृष्ण अकेले रोकने आये
शर्म करो अरबो में भी होकर, हम उन पाँचो का कुछ ना कर पाये
 
एक पुकार सुन द्रोपदी की, भाई कृष्ण दौड़ा-दौड़ा आया
पर अफ़सोस ये है कि 'दामिनी' बचाने, कोई भाई पहुंच न पाया
मेरी गुड़िया चली गयी, अब मैं किससे राखी बंधवाऊंगा
किसके घर मै तीज, खिचड़ी और भैया दूज को जाऊंगा
 
मैंने डोली नहीं उठायी, जनाजा उसका उठाया है
उसके सर को गोद में रखकर, सिंगापुर से लाया है
भारत आने तक उसे जगाया, पर मेरी बहना जगी नहीं
तेरह दिन उसके साथ रहा, मुझे रातो को नींद भी लगी नहीं 
 
चीख-चीखकर मेरी बहना, जीने की फरियादें करती थी
एक मेरे सामने कराह-कराह कर, वो लम्बी आहे भरी थी
कहती थी भैया तुम मुझे बचा लो, मैं भी दुल्हन बनना चाहती हूँ
सज-सँवर कर अपने हाथो में, मेंहदी लगवाना चाहती हूँ
 
पर आधी रात को घडी के कांटे, दो पर जाकर अटक गये
उसके सजाये सभी अरमां, भय के पथ पर भटक गये
मेरे सामने मेरी बहना, बिस्तर पर दम तोड़ रही थी
मानो जैसे उसकी सांसे, उसका दामन छोड़ रही थी
 
बोली भैया कसकर हाथ पकड़ लो मेरा, वर्ना मैं मर जाऊंगी
पापा से कहना मैं अब फिर मस्ती, करने घर नहीं आऊंगी
बस 'भईया' चीखकर उसकी बोली, ठुण्डी सासों में बदल गयी
पूरे माउन्ट अस्पताल में, सन्नाटे की लहरे पसर गयी
 
अब पापा ने अफसर बिटिया को, अपने सीने से लगा लिया
फिर धीर से ये कहकर उसको, वापस बेड पर सुला दिया
सब चुप हो जाओ वर्ना, मेरी दामिनी उठ जाएगी
और अभी फिर मेरी बेटी, जोरों से चिल्लायेगी
पापा मेरा कन्यादान करो, जरा मेरा भी सम्मान करो
ऐ मेरे भारत के सभी भाईयों, जरा मेरा भी सम्मान करो।
 
॥———- श्रद्धांजालि———- ॥
 
आशीष सिंह "मनमौजी"
 
युवा साहित्यकार
 
जौनपुर, उत्तर प्रदेश
 
मो०- 09506881328
ईमेल- ashish.ravishankar@gmail.com

 

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