दावोस से उपजे सवाल : विश्व के बड़े आर्थिक मंच पर भारत की घटती प्रासंगिकता

दावोस में हो रही विश्व आर्थिक फोरम की बैठक से खबर आई है कि इस बैठक में भारत को तवज्जो नहीं दी जा रही है जबकि भारत ने पिछले कुछ सालों में दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। भारत के लिए यह कितनी विकट स्थिति है कि जब इस बैठक में अलग-अलग थीम पर 260 सेशन हो रहे हैं जिसमें मात्र एक सेशन भारत पर फोकस होगा। बात सिर्फ इतना ही नहीं है इस बैठक में 20 से भी कम वक्ताओं को शामिल किया गया है। दरअसल विश्व के बड़े आर्थिक मंच पर भारत की भूमिका उसकी घटती प्रासंगिकता का प्रमाण है।

यह कोई संयोग नहीं है जब अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर भारत को दरकिनार किया जा रहा है। इसके पीछे भारत की परिस्थितियां और अर्थक्षेत्र में हुई अनियमितताएं ही जिम्मेदार हैं। इस वर्ष भारत की आर्थिक विकास दर 5.5 के आसपास रहने का ही अनुमान लगाया गया है और इसी आधार  पर ग्लोबल रेटिंग एजेन्सियों ने भारत की रेटिंग भी घटा दी है और आगे भी चेतावनी दी है कि अगर ऐसा ही होता रहा तो परिस्थितियां और भी विषम हो सकती हैं। हालांकि बात सिर्फ आर्थिक विकास दर की ही नहीं है हम ये क्यों भूल जाते हैं कि भारत में पिछले तीन साल में एक से बढ़कर एक घोटाले सामने आते रहे हैं, भ्रष्टाचार ने अपना जाल इतना व्यापक कर लिया है कि सरकार ही पंगु हो गई। इतना ही नहीं पुअर्स एंड स्टैण्डर्ड्स की वो टिप्पणी कैसे भूली जा सकती है जब उसमें कहा गया था कि ‘भारत में नीति-निर्धारण  में काफी सुस्ती बरती जाती है जिसका असर भारत के ग्लोबल रेटिंग पर पड़ता है।’

इसका अभिप्राय तो स्पष्ट है कि दावोस में भारत के विपरीत जो परिस्थितियां विकसित हुई हैं उसके लिए अंततः जिम्मेदार हमारे अर्थवेत्ता और सरकार में बैठे हुक्मरान ही हैं। अभी हाल के वर्षों तक भारत को लेकर विदेशी निवेशक काफी उत्साहित नजर आते थे लेकिन वे अभी कहां हैं शायद उनका आना अभी शेष है। इस बैठक में भारत की उपेक्षा इस बात का प्रमाण है कि भारत विकसित देशों के लिए चिंता का सबब नहीं है, भारत उनके लिए न तो आज चुनौती है न पहले कभी था। यानि विकसित देशों की प्राथमिकता और चिंता का विषय कुछ और ही है।

हालांकि इस वैश्विक मंच की सालाना बैठक की बात है जहां भारत को ज्यादा तरजीह न मिली हो लेकिन वास्तविक स्थिति में वैश्विक रूप से भारत की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। क्योंकि जो वैश्विक निवेशक भारत से अन्यत्र विकल्प की तलाश कर रहे थे वे अब भारत में ही रुकने का मन बना चुके हैं। साथ ही सरकार ने भी कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जिससे आर्थिक सुधार  की उम्मीद की जा सकती है। इसमें अव्वल तो गार का टालने का ही फैसला है। लेकिन इन सबसे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता और यह नहीं भुलाया जा सकता कि पिछले कुछ सालों में भ्रष्टाचार, कालाधन  और घोटालों की जो कलई खुली है उससे देश की आर्थिक साख को अपूरणीय क्षति हुई और दावोस में भारत की उपेक्षा इसी का परिणाम है। 

लेखक अजय पाण्डेय अमर भारती में वरिष्ठ उप संपादक के पद पर कार्यरत हैं

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