दिल्ली की वरिष्ठ महिला पत्रकारों के साथ महाराष्ट्र में हुआ दुर्व्यवहार

: महाराष्‍ट्र की संत्रास यात्रा की कहानी, वरिष्ठ पत्रकार इरा झा की जुबानी : यह सम्मान था या संत्रास ? महाराष्‍ट्र सरकार प्रायोजित पुणे से मुंबई तक दस दिनों की बेतरतीब यात्रा से लौटे महिला पत्रकारों के जत्थे को तो यही अहसास हुआ है. दिल्ली की महिला पत्रकारों को महाराष्‍ट्र सरकार की नजरों में अपनी असल औकात का अहसास लंबी, थकाऊ और अनियोजित यात्रा के बाद मुंबई स्टेशन पहुंचने पर हुआ. वहां पता लगा कि पांच करोड़ लोगों की सरकार अपने करीब दर्जन भर मेहमानों का ट्रेन रिजर्वेशन ही कंफर्म नहीं करा पाई जबकि दिल्ली में रेल भवन में पत्रकारों के टिकट यूं भी कंफर्म हो जाते हैं. इंतिहा सूचना विभाग के वरिष्ठ अधिकारी कांबडे का दुर्व्‍यवहार रहा.

तभी हम लोग यह समझे कि महाराष्‍ट्र दोयम क्यों रह गया.  ऐसी भीषण अपमानजनक, अव्यवस्थित सरकार प्रायोजित यात्रा इस पत्रकार को अपने तीस वर्षीय करियर में कभी नहीं झेलनी पडी. शायद महाराष्‍ट्र में मीडिया की यात्रा का कोई प्रोटोकोल नहीं है.

सर मुंडाते ओले पड़े : महाराष्‍ट्र के प्रमुख नेताओं-शरद पवार, सुशील कुमार शिंदे, नारायण राणे, और महाराष्‍ट्र के संस्थापक वाई बी चव्हाण के जिलों की राज्य सरकार प्रायोजित यात्रा पर राजधानी दिल्ली की नौ महिला पत्रकारों का जत्था 16 मार्च की सुबह 22 घंटे लंबी ट्रेन यात्रा करके पुणे पहुंचा. वहां महिला पत्रकारों का ड्राइवरों के कमरे में ठहराने का इंतजाम था. काले तकिए, चीकट चादरें और बोसीदा गुसलखाने. जाहिर है कि पत्रकारों की थकान मिटना तो दूर नींद उड़ गई. इसका विरोध करने पर जवाब मिला-आपकी एक्सपेक्टेशंस बहुत ज्यादा हैं, मानों खैरात दे रहे हों. इस नाचीज ने वरिष्ठतम और अनुभवी होने के नाते इस पर एतराज किया तो हर जगह अलग से कमरा देकर खुश करने की कोशिश की गई. मना करने और सब को एक सी सुविधा देने की मांग करने पर दल में ही फूट डालने के बीज बो दिए गए. यह तो सिर्फ बानगी है.
 
न खुदा ही मिला न विसाले सनम : दिल्ली से ले जाते समय यह सब्जबाग दिखाए गए कि बारामती में शरद पवार की बेटी और सांसद सुप्रिया सुले और मुंबई में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण द्वारा खुद राजधानी की महिला पत्रकारों से बात करना तय है. दिल्ली में महाराष्‍ट्र सरकार की मीडिया कोऑर्डिनेटर अमर ज्योति अरोरा ने तय कार्यक्रम के बावजूद न सुले से मिलवाया और न ही मुख्यमंत्री से. मुंबई में जबरन अतिरिक्त एक दिन रोकने के बावजूद मुख्यमंत्री को हमसे मुखातिब नहीं किया गया. बहाना- सुप्रिया संसद के सत्र में और मुख्यमंत्री विधान सभा में व्यस्त हैं. कम से कम संसद और विधान सभा सत्र से तो ज्‍योति बखूबी वाकिफ रही होंगी. आखिर वह पिछले दस साल से दिल्ली में महाराष्‍ट्र सूचना केंद्र में काबिज हैं. फिर शायद इस बात की घबराहट भी होगी कि कहीं पत्रकार बदइंतजामी की पोल मुख्यमंत्री से न खोल दें.

बारामती में तो शरद पवार खुद मौजूद थे, मगर सूचना विभाग ने हमें उनसे नहीं मिलवाया. फिर शरद पवार के भतीजे अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा से मुलाकात का कार्यक्रम बना और टांय-टांय फिस्स हो गया. शायद सूचना विभाग यहीं से बिना तैयारी के हम पत्रकारों को घर की मुर्गी दाल बराबर समझ कर साथ ले गया था. अनाथों को सहारा देने वाली सिंधु ताई सपकाल से मिलाने जब उनके गांव सासवण पहुंचे तो पता चला कि वह हैं नहीं और उनकी बेटी ममता पुणे में हमारा इंतजार कर रहीं हैं, क्योंकि वहीं पर मुलाकात तय थी. लिहाजा बच्चों से तो मिले मगर उनकी सरपरस्त का संघर्ष जानने से वंचित रह गए. पुणे में महिला सहकार की आदर्श परियोजना लिज्जत पापड़ गृह उद्योग का दौरा यहीं से प्रस्तावित था. वहां पहुंच कर हम लोगों को महाराष्‍ट्र की आदिवासी औरतों की कामयाबी की उस गाथा से भी वंचित कर दिया गया. पूछने पर मिली टालमटोल.

मराठा गौरव पूर्व उप्रपधानमंत्री और महाराष्‍ट्र के पहले मुख्यमंत्री यशवंत राव बलवंत राव चव्हाण की समाधि पर दोपहर के बजाय रात के अंधेरे में ले जाया गया. उस समय उनके बारे में न तो कराड़ के लोगों से कोई बात हो पाई और न ही वहां मौजूद देश की दो प्रमुख नदियों कृष्णा और कोयना का संगम हम लोग देख पाए. रात के घुप अंधेरे में कराड़ की मलकापुर नगर पंचायत में जलापूर्ति परियोजना दिखाई गई. बद्इंतजामी आधी रात के बाद कोल्हापुर पहुंचे और आशियाने की तलाश में ही घंटा भर भटकते रहे. सूचना विभाग के पांच-पांच अधिकारियों के पास किसी का स्थानीय फोन नंबर भी नहीं था. पूछते-गछते सर्किट हाउस पहुंचे तो 42 डिग्री गर्मी और नींद से बेहाल पत्रकारों को समुचित ठंडक वाले कमरे भी नहीं दिए गए. बताया गया कि सारे कमरे वैसे ही हैं. फिर वही एतराज और कहा-सुनी का दौर चला तो दौड़धूप हुई और और तड़के ढाई बजे जाकर सबको ठंडक वाले कमरे मिल पाए. क्या मेहमाननवाजी है?

संत्रास की इंतिहा तो सिंधुदुर्ग में हुई. वहां के पहाड़ी घुमावदार रास्ते से चक्कर खाती, उलटी करती, महिला पत्रकारों को रात के साढ़े ग्यारह बजे कहीं आरामदेह जगह ठहराने के बजाए नारायण राणे के महिला विकास केंद्र पर ले जाकर पटक दिया गया. फिर एतराज और पस्त हालत की दुहाई दी गई तो आधी रात के बाद राणे के होटल में ही शरण दिलाई गई. ऐसा लगा मानो जान बची और लाखों पाए. गनीमत हम तो अगले दिन की ट्रेन से एसी थ्री टायर में आठ टिकटों पर दर्जन भर लोग लदकर दिल्ली लौट आए हैं पर भाऊ लोगों आप ये रिस्क मत लेना. महाराष्‍ट्र सरकार का न्यौता आपको कहीं हमसे भी भारी न पड़ जाए.

लेखिका इरा झा वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

 

 
 

 

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