दिल्ली में कांग्रेस आक्रोश की लहर में डूब गई

कांग्रेस की हथेली से दिल्ली इस तरह फिसल जाएगी यह अप्रत्याशित और चौकाने वाली बात है। इसका विश्लेषण राजनीतिक विशेषकों ने पहले कभी नहीं   किया था। यह चौकाने वाली बात इसलिए है कि मुख्यमंत्री रूप में शीला दीक्षित का यहां विवादस्पद नहीं रही है। दिल्ली के नवनिर्माण का जो सशक्त अभियान चलाया था, वह अलग से रेखांकित करने लायक है। कांग्रेस ने अन्य राज्यों में चाहे जैसी भी भूमिका निभायी हो, जनता की आशाओं आकांक्षाओं को भले ही पूरा नहीं किया हो लेकिन शीला दीक्षित के साथ वह अध्याय नहीं खुलता है। 
 
दिल्लीवासियों के अलावा किसी दूसरे प्रदेश को यह गौरव प्राप्त नहीं है कि विकास हर दिशा में हुआ हो। फ्लाईओवर हो या प्रदूषण, दिल्ली की भीड़ को दृष्टि-पथ में रखते हुए वाहनों को नियंत्रित रूप में कम अवधि में एक दूसरे स्थान पर ले जाने की सुविधा मुहैया कराने की बात हो या दिल्ली के सुंदरीकरण की बात हो सारे कार्यों को शीला दीक्षित ने बड़े ही अनुकरणीय ढंग से ऐसे किया था, जो मिसाल बन गए थे। अन्य महानगरों के वासी इस बात  के लिए तरसते रहे कि दिल्ली की तरह उन्हें मेट्रो, वाहनों को तेज गति से ले जाने की सुविधा मिलती। अपने महानगर को सुन्दर और आकर्षक रूप में देखने को मिलता। 
 
इन उपलब्धियों के बावजूद कांग्रेस की जब अप्रत्याशित हार दिल्ली में हुई, तो किसी भी मुख्य मंत्री को अब सोचना पड़ेगा वह कौन-सा हथकंडा अपनाए कि चुनाव में जीत सुनिश्चित कर सके। उसके मन में यह बात जरूर आयेगी कि विकास से वह यह काम नहीं कर सकता। 
 
शीला दीक्षित के नेतृत्व में दिल्ली में कांग्रेस की हार का एक पक्ष यह भी है कि रुपये खर्च कर केवल रईसों के जीवन को सुखी बनाया गया। दूसरा आक्रोश फूटा कांग्रेसी सरकार में महंगाई और भ्रष्टाचार बढ़ने की वजह से। सब जगह कांग्रेस के खिलाफ जो आक्रोश था, वह दिल्ली में भी नजर आया। 
 
               लेखक अमरेन्द्र कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे सम्पर्क 123.amrendrakumar@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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