दिल्ली में प्रेस क्लब के संडास महाराष्ट्र सरकार के रिलीफ फंड से बने हैं

Om Thanvi : आज के 'हिन्दू' में पहले पन्ने पर छपी उस खबर को आप योजना आयोग में दो संडासों के पुनरुद्धार पर पैंतीस लाख के खर्च के बरक्स भले मत देखिए, पर खबर है सनसनीखेज. दिल्ली में पत्रकारों के ठिये प्रेस क्लब के संडास महाराष्ट्र सरकार के रिलीफ फंड अर्थात सहायता कोष के धन से बने हैं. हम दूसरों पर अंगुली उठाते हैं तो खुद की तरफ उठने वाली अंगुली के प्रति भी सजग रहना चाहिए. पत्रकार सरकार के अंग नहीं हैं, पर सरकार से वे मुफ्त मकान, ज़मीन, यात्रा, शिक्षा, बीमा, चिकित्सा आदि सुविधाओं की मांग करते रहते हैं, कुछ ले भी लेते हैं. ऐसे में एक दिन शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है, जैसा कि आज की इस खबर के बाद हो रहा होगा. दूसरे पर उठी अंगुली में जान तभी होगी जब खुद का दामन साफ़ हो. मैं कभी किसी प्रेस क्लब का सदस्य नहीं रहा, न उधर जा पाता हूँ. कभी किसी सभा-शोकसभा में गया तो गया. क्लब वाले कहते हैं कि क्लब का खर्चा पूरा नहीं पड़ता, इसलिए मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों को बुलाते हैं और वे जो धन दे जाते हैं ले लेते हैं. जहाँ तक मुझे जानकारी है, इसकी मांग की जाती है. देश के और भागों में भी प्रेस क्लब इसी तरह पल्लवित हो रहे हैं. मांगने वाले को क्या जो मेहरबानी की रकम अकाल राहत की है या बाढ़ राहत की. सुनते हैं प्रेस-क्लबों में खाना-पीना नितांत सस्ता है. दान-अनुदान से चलेगा तो सस्ता क्यों न होगा. हाल ही मुझे एक क्लब में सम्मानित किया गया. पर सम्मान का बोध जाता रहा जब राज्यपाल और मंत्रियों की मौजूदगी के चलते क्लब की ओर से पत्रकारों के कल्याण के लिए सरकारी सुविधाओं की एक अंतहीन सूची पेश की गयी. पिछले कुछ वर्षों में पत्रकार अपने आचरण के कारण वैसे ही चर्चा का विषय बने हुए हैं. संडास की सड़ांध विपरीत हवा का ताज़ा — अर्थात नवीन — झोंका है.

        Anil Attri थानवी जी हम अपने गिरेबान में झांकने के आदी हैं ही नहीं…मैंने इस तरह के कई पोस्‍ट फेसबुक पर साझा किए लेकिन लोगों ने कमेंट करने या सहमति दिखाने की बजाए अनदेखा करना उचित समझा..
 
        Charan Sharma patrakar kota jai ho
 
        Parag Mandle पर उपदेश कुशल बहुतेरे ……… पत्रकार भी औरों की तरह पैदा होते हैं, अवतरित नहीं होते। इसलिए अपनी आँख की किरकिरी नहीं देखेंगे……दूसरों पर नज़रें गड़ाए रहेंगे।
   
        Gagan Joshi वाह जिंदगी ! थानवी जी …जीवन में इतना साफ गोई से अपनी(*अपने ही प्रोफेशन से) कमियों को कबूलना और वो भी इस तरह से सरे आम ! ये भावनाओ का ईश्वरीय स्वरुप है … इस ईश्वरीय भावना स्वरुप के दर्शन करवाने के लिए आप को जितना भी धन्यवाद् दूँ कम है ! शुद्ध रूप से मेरी निजी भावनाएं .. ओरों को इसमें बिलकुल भी शामिल नहीं करूँगा.. ये दुसरे खुद समझे और कहें तो कहें !
    
        अंशुमाली रस्तोगी संडास-मय लाभ उधर भी हैं इधर भी…
     
        Nand Bhardwaj ये आत्‍म-समीक्षा पसंद आई। इसकी जरूरत सभी समझ लें, तो सफाई काफी आसान हो सकती है।
      
        Sanjay Kareer बात तो सही है पर एक सवाल भी है… पत्रकारों (या मीडिया) से ही सदाचरण की उम्‍मीद क्‍यों की जाती है? पूरा समाज, हर तबका, सरकारी से लेकर निजी सेक्‍टर तक जहां जैसा मौका मिलता है लूट कर निकल लेता है… तो पत्रकार क्‍या एलियन हैं… वे भी तो इसी समाज का हिस्‍सा हैं। वे ऐसा कुछ करते हैं तो नैतिकता का पाठ पढ़ाने और सीख देने वालों के साथ कोसने वालों का पूरा कोरस चल पड़ता है… अजीब हिपॉक्रेसी है…
        
        Mohan Shrotriya और गहरे जाएंगे तो प्रेस क्लबों की सडांध चकित कर देगी. दारूबाज़ी के अड्डे हैं ये.कुछेक साहित्यकार हर प्रेस क्लब के मानद सदस्य होते हैं…
         
        Ravindra Bajpai मीडिया के भीतर भी एक माफिया पनप चुका है जो लोकतंत्र की सारी खुरचन में बराबरी का बटवारा करने पर आमादा है. मीडिया को चौथा स्तम्भ कहने वालों को किसी शायर की इस पंक्ति में छुपा अर्थ समझ लेना चाहिए कि …वाह रे खम्बे तेरी कुदरत..जिस छत से लगा वो छत गिर गयी…
        
        Vikram Jit उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
        जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

        नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
        कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

        थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटे
        सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

        बहुत बेबाक आँखों में त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता
        मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

        सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
        जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

        मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
        कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
        Om Jee Kash poetic justice hota……
 
        Amit Sharma सही कहा मोहन सर ने, गहराई में तो बुत ज्यादा गंदगी है
 
        Atul Chaturvedi सच कह रहे हैं आप , आपने अपने लेख में जनसत्ता के चंडीगढ़ प्रसंग में भी सरकारी सुविधाएं न लेने का जिक्र किया था । लेकिन आज मीडिया का एक वर्ग सुविधापरस्त हो गया है उनके लिए पत्रकारिता एक मिशन नहीं रौब-दाब का तरीका है या फिर आजीविका का साधन वहां नैतिक शुचिता ढूंढना बेमानी है साहब ।
   
        Aflatoon Afloo आपने सही इशारा किया ,Om Thanvi जी,बधाई। कोलकाता में आप जितनी बड़ी मोटर में घूम रहे थे उससे भी लोग चकराए थे ।
    
        Parmeshvar Sharma sach me …!!!
    
        Asrar Khan प्रतिशत के हिसाब से देखा जाय तो पत्रकारिता में सबसे ज्यादा दलाल मिल जायेंगे और वे अपने लिए तथा अपने रिश्तेदारों के लिए सरकार तथा निजी क्षेत्र से सबसे ज्यादा सुविधाएँ लेने की कोशिश में रहते हैं ….और ले भी लेते हैं ….सच कहूँ कि पत्रकारिता तो उसी रोज खत्म हो गई जब यह व्यवसाय बन गया और बड़े-बड़े कारपोरेट इसके मालिक बन गए …
        कितने शर्म की बात है कि बरखा दत्त जैसी पत्रकार को पद्मश्री दे दिया गया और जब उनका नाम सत्ता के गलियारे में हाई लेबल की दलाली करने का मामला प्रकश में आया तो NDTV ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं किया …इसी तरह पक्षपातपूर्ण पत्रकारिका करने के लिए नीती के खिलाफ कोई एक्सन नहीं लिया गया …खैर मेरा मानना है कि पत्रकारिता जगत की यह कोई बड़ी समस्या नहीं है कि उन्होंने टायलेट बनवाने के लिए महाराष्ट्र सरकार के किसी कोष का पैसा ले लिया जो बातें मैंने सामने रखा है बल्कि असली समस्या वो है ….
    
        Om Thanvi अफ़लातून जी, मोटर तो दिल्ली में भी है, पर सरकारी नहीं है. कोलकाता में स्थानीय आयोजकों की रही होगी.

वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.

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