दिल्‍ली को खेतमुक्‍त बनाना चाहती हैं शीला दीक्षित!

दोपहर तीन बजे का समय। साथ में बुजुर्ग किसान बाबा। मन में यह इच्छा हुई कि दिल्ली में किसी खेत को देखा जाए। मैंने बाबा से निवेदन किया कि अगर आपको तकलीफ न हो तो क्या आप खेत दिखा सकते हैं? मना नहीं कर सके थे मेरे निवेदन को बुजुर्ग किसान बाबा। मयूर विहार फेस- एक से आधा एक किलोमीटर पैदल चलकर खेत को आसानी से देखा जा सकता है, परखा जा सकता है छूकर भी और चलकर भी।

चिलचिलाती धूप में खेत देखने की प्रबल इच्छा ने पांव की गति को तेज कर दिया था। कदम बढ़ते ही जा रहे थे। खेत पहुंचकर मन को सुकून मिला। चारों ओेर की हरियाली ने मन शांत कर दिया था। हरी भरी सब्जी देश की वास्तविक तस्वीर बयां कर रही थी। ककड़ी, खरबूज, खीरा, पालक ने लू के थपेड़ों को मजबूर कर दिया था हारने पर। बाबा ने एक ककड़ी को खेत से तोड़ते हुए हाथ में दिया ककड़ी को बोरिंग के ठंढे पानी से धेाकर खाया तो पेट की आग शांत हो गई। खेतों में खेतिहर के झोपड़ीनुमा घर आकर्षण का केंद्र था। मन हुआ कुछ पल इसी घर में आराम किया जाए। सब कुछ भूल चुका था। छोड़ आया था उस शहर को जिसने दमघोंटू जिंदगी के सिवा कुछ भी नहीं दिया था। फिर चर्चा होने लगी थी खेत, कृषि, किसान और दिल्ली के रिश्‍ते पर। मैं हर उस पहलू को ढूंढने की कोशिश कर रहा था, जिसमें मेट्रो शहर या देश की राजधानी में किसानों की वास्तविक स्थिति को जाना जा सके और देश के सामने किसानों की सच्चाई को रखी जा सके।

ऐसा कहा जाता है कि देश की दिशा और दशा यहीं से तय होती है। लेकिन तय करने वाले कभी खेत या पिछड़े इलाके में आकर दशा और दिशा देने के लिए पंचवर्षीय योजना बनाते हैं, नहीं शहर के ब्रांडेड रेस्त्रां या  होटल में ये योजना बनाते हैं, जहां एक कप चाय की कीमत 100 रुपये से अधिक होती है। बहरहाल, धूप में चलते चलते कदम थक गऐ थे। खेत में चलने की आदत बचपन में ही भूल गया था। एक झोपड़ीनुमा घर के बाहर 5-6 किसानों से परिचय पाती के बाद पेड़ की छांव में खटिया पर बैठ कर राहत महसूस कर रहा था। चांपाकल का पानी करीब दो साल के बाद पीकर आत्मा तृप्त सा हो गया था। डीडीए और बिसलेरी का पानी पी पी कर पानी से नफरत सा होने लगा था। और फिर जोरदार चर्चा हुई खेत, किसान और शीला दीक्षित पर। ये प्रत्यक्ष अनुभव था खेत किसान और देश की कृषि को दिल्ली के आधार पर जानने का। वैसे तो ग्रामीण पृष्‍ठभूमि होने से कुछ तथ्यों से वाकिफ था।

खेत के बीच नए मेट्रो पिलर के खंभे को देखकर मैंने एक किसान भाई से पूछा कि ये क्या है? किसान भाई ने कहा पत्रकार जी देख क्या रहे हैं अब तो खेत भी न दिखेगा कुछ समय बाद, अब यहां मेट्रो ट्रेन चलेगी, सड़क पर लंबी लंबी गाडिया चलेंगी। इनकी बातों को सुनकर भगत सिंह की उस बात पर चिंतन और मनन करने लगा। भगत सिंह ने बार -बार चेतावनी दी थी कि ’’कांग्रेस के रास्ते पर चलकर मिलने वाली आजादी 10 फीसदी उपर के लोगों की आजादी होगी, पूंजीपतियों-साहूकारों की आजादी होगी, देश के 90 फीसदी मजदूरों -किसानों की जिंदगी को शोषण से आजादी नहीं मिलेगी।’’ सही कहा था। आज यही कमोवेश स्थिति पूरे देश में किसानों और मजदूरों की वैसी ही है। पूंजीवादी व्यवस्था और साम्राज्यवादी सोच देश में अमीरी और गरीबी की खाई इतनी चौड़ी कर दी है कि इसे पाटने में शायद अब 100 वर्ष से ज्यादा लग जाए। इस तरह की खाई से मन पीड़ा से भर जाता है। एक ओर कुत्ते जैसे जानवरों केा 2 लीटर दूध पिलाने वाला तबका है तो दूसरी ओर ऐसा भी तबका है जो अपने बच्चे को दूध की जगह सस्ते चावल को पीसकर पिलाने पर मजबूर है।

मसलन, मैंने कुछ पल के लिए अपने को शांत कर पुनः किसान भाई से पूछा कि मुआवजा मिला है इस खेत की बर्बादी का। इसका जवाब नहीं मिला। चिलचिलाती धूप में न सुनकर लगा कि धूप की गर्मी बर्फ बन गई हो। मैंने कहा हां, शीला जी यह भी नहीं जानती हैं कि दिल्ली में किसान और खेत भी हैं। मसलन, सवाल अब यह कि क्या सही में दिल्ली को कांग्रेस और शीला जी खेतमुक्त दिल्ली बनाना चाहती हैं या इसकी रूपरेखा तैयार है, ये पता नहीं? सवाल यह भी क्या खेतों को उजाड़कर मेट्रो, सड़क, रेस्त्रां, पार्क बनाकर दिल्ली से किसान, खेतीहरों को विस्थापित करना विकास के मापदंड पर खरा उतरता है? दिल्ली और दिल्लीवासियों को इस सवाल का जवाब ढूंढना चाहिए। किसानों के मेहनत, खून-पसीने पर शीला सरकार ने कॉरपोरेट जगत को हंसने का एक और अवसर दिया है।

लेखक जितेंद्र कुमार ज्‍योति पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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