दीपकजी! अंध भक्ति वाले सच नहीं जान सकते

दीपकजी, आपने प्रभात किरण के संपादक प्रकाश पुरोहित के व्यक्तित्व, संपादक के रूप में उनकी निष्पक्षता और अखबार के रूप में प्रभातकिरण की विश्वसनीयता की खूब सारी बातें बेहद भावुक होकर कही हैं। अब मुश्किल यह है कि शुरुआत में ही आपने स्पष्ट कर दिया कि आप प्रकाश पुरोहित के अंध भक्त हैं। अब आप इतना तो जानते ही होंगे कि जो भक्ति अंधी होती है, वह अतार्किक हो जाती है।

जैसे धृतराष्ट्र को कुछ समझाया नहीं जा सकता था या वे दुर्योधन के बारे में कुछ सुनना ही नहीं चाहते थे, वैसा ही किसी भी अंध भक्त के साथ होता है। आप जैसा दृष्टि युक्त व्यक्ति भी अंधा होना चाहे तो यह वैसा ही हो जाएगा जैसा गांधारी ने किया था। याने धृतराष्ट्र तो जन्मांध थे, लेकिन गांधारी तो अच्छी-भली आंख वाली होकर आपकी तरह अंध भक्ति के चलते ही अंधत्व भोगने को अभिशप्त हो गई थीं और धृतराष्ट्र की हां में हां मिलाती रही और अंतत: पूरे कौरव वंश का नाश होकर रहा। बहरहाल।

अब चूंकि आपने कुछ मुद्दे उठाए हैं तो आप भी जान लीजिए कि वास्तविकता क्या है?

1- आपने लिखा- प्रकाशजी की प्राथमिकता पठनीय अखबार निकालना है और अगर उनका बेटा सुधांशु अच्छा लिखता है तो सुधांशु क्यों नहीं? तो क्या अच्छा सिर्फ सुधांशु ही लिखता है? सुधांशु के जिस मुफ्त पर्यटन की बातें आप कर रहे हैं, उनका खर्च संस्थान पर तो वैसे भी नहीं आना था, क्योंकि ये यात्राएं गुजरात और राजस्थान पर्यटन विकास निगम के सौजन्य से आयोजित की गई थीं। इन पर जाने का हक प्रभात किरण के किसी पत्रकार का होता है, सुधांशु का नहीं। वह अपन खर्च पर देश-दुनिया घूमकर लिखे ना, कौन रोकता है? सुधांशु, सुदीप, प्रज्ञा मिश्रा को छापना वैसा ही है, जैसे दावत का आपको न्यौता मिले और आप पड़ोसियों को भी ले जाएं। फिर, जब घर का आदमी अच्छा है और उसे बढ़ावा देना है तो जनाब राहुल गांधी, अखिलेश यादव जैसों के आगे आने पर अंगुली क्यों उठाते हो? उनकी पार्टी अच्छा जानकर ही उन्हें माथे पर बैठा रही है। आप सहित तमाम अखबार वाले परिवारवाद का राग आलापना बंद कर दें।

2- आपने प्रभात किरण को महान अखबार बताते हुए लिखा है कि इसमें खूब सारी समीक्षाएं छपती हैं। यही तो सबसे बड़ी गड़बड़ है कि यह अखबार सभी कार्यक्रमों की समीक्षा करता है, खबर नहीं देता। पूरा अखबार संपादकीय लगता है, खबरें तो चंद ही होती हैं। भारत लोकतांत्रिक मुल्क है और अभिव्यक्ति की आजादी है याने आप ही पूरे शहर को बताएंगे कि कार्यक्रम में कौन वक्ता बकवास कर रहा था, कौन चापलूसी कर रहा था, कौन जमावट कर रहा था। किसी भी कार्यक्रम में बकौल प्रभात किरण कुछ अच्छा होता ही नहीं।

3- आप लिखते हैं कि आदिल सईद ने क्या गलत लिख दिया कि आपका घमंड चोटिल हो गया? तो दीपकजी हमने ऐसा क्या लिख दिया कि आपका घमंड चोटिल हो गया? क्यूं प्रभात किरण और संपादक की इतनी पैरवी कर रहे हैं, जबकि आप वहां काम नहीं कर रहे। हमारी बातों का जवाब देने में संपादक और प्रबंधन का अहम आड़े क्यों आ रहा है जो आपको ढाल बना दिया? वैसे हमें उनसे कोई जवाब चाहिए भी नहीं। वह यदि इंदौर प्रेस क्लब या प्रेस क्लब टाइम्स को लेकर अर्नगल प्रलाप करेंगे तो हम जरूर जवाब देंगे। उनसे पूछिएगा कि लोकतंत्र के पैरोकार आपके अखबार और संपादक ने हमारा पूरा पत्र क्यों नहीं छापा, उसे संपादन कर क्यों छापा? फिर वह 365 दिन क्या लिखता है और उस पर किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की इससे हमारा कोई संबंध नहीं। वैसे भी इतना तो आप भी जानते होंगे कि जो अपनी लड़ाई लडऩा नहीं जानता या चाहता उसकी पैरवी भी कोई नहीं करता। दूसरे, अन्य किसी ने कभी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की तो गनीमत समझिए कि लोग पत्रकारिता के पेशे का अभी-भी सम्मान करते हैं और उनका सोच प्रभात किरण के संपादक और प्रबंधन की तरह विघ्न संतोषी, आत्म मुग्ध, परपीड़ा देने और किसी को भी आहत करने का नहीं हुआ, वरना..।

4- आपने लिखा है- एक अखबार ने यदि कुछ अनचाहा लिख भी दिया तो लिख दिया होगा। बाकी दस तो तारीफ कर ही रहे हैं। उनकी तारीफ बड़ी है या एक की आलोचना? तो दीपकजी, हमने भी आपके प्रिय अखबार और उसके संपादक को पत्र लिख दिया तो लिख दिया, आप क्यों इतने विचलित हो गए कि उनकी ओर से जवाब दे मारा? और सुन लीजिए-हम किसी भी आलोचना से विचलित नहीं होते, लेकिन जो आपने पहले कहा था न कि प्रभात किरण तो 365 दिन ऐसा ही लिखता है, कोई आपत्ति क्यों नहीं लेता? तो हमने बेहद लोकतांत्रिक तरीके से आपत्ति ही तो दर्ज कराई है तो आपको इतना बुरा क्यों लग गया? फिर, एक बात ध्यान रखिए कि किसी क्रिया की प्रतिक्रिया कैसे होगी यह आप तय नहीं कर सकते। जैसे आप किसी रास्ते चलते को हलकी-सी टक्कर लगने पर थप्पड़ मार दें और बदले में वह पलटकर आपको चाकू मार दें तो आप यह तय नहीं कर सकते कि वह भी आपको थप्पड़ ही मारे। हो सकता है गोली मार दे। हो सकता है आपके पूरे कुनबे को ही खत्म कर दे। यह इस पर निर्भर करता है कि वह कितना आहत हुआ है और चीजों को देखने का उसका नजरिया क्या है?

5- एक बिन मांगी सलाह-जिस प्रभात किरण और उसके संपादक के आप मुरीद हैं, उन्हें बताइये कि पत्रकारिता का मतलब यह नहीं होता है कि आप हर कार्यक्रम की सिर्फ आलोचना करें, उसमें कमियां ढूंढें, उसका नकारात्मक पक्ष ही उभारें। यह तो ऐसा ही हुआ कि किसी महिला ने बालिका को या विकलांग बच्चे को जन्म दिया तो आप मां की कोख को ही दोष दें कि क्या वह एक स्वस्थ बच्चा नहीं जन सकती थी? जैसे एक औरत की प्रसव पीड़ा को कोई दूसरा नहीं जान सकता, वैसे ही किसी कार्यक्रम को आयोजित करना भी एक तरह की प्रसव पीडा़ ही है। पहले कोई संरचना कीजिए, निर्माण कीजिए, जो बन चुका है, जो सृजित हो चुका है, उसमें सिर्फ खामी मत देखिए। आप सराहना भी मत कीजिए। समाज में अभी-भी ऐसा बहुत कुछ हो रहा है, जिसे खोज और शोध के जरिए उजागर करने की जरूरत है। जो लोग फुटपॉथ पर बगीचा बनाकर कब्जा कर लें, लेकिन एक छत के अभाव में फुटपॉथ पर सोने वालों या अपनी आजीविका चलाने के लिए छबड़ी-ठेला लगा लेने वालों को अतिक्रमणकर्ता मानें या जो सरकारी सौजन्य यात्राओं पर अपने परिवार वालों को भेज दें उनसे किसी नैतिकता के उपदेश या नसीहत की हमें जरूरत नहीं है।
 
प्रवीणकुमार खारीवाल                                                                   कमल कस्तूरी

अध्यक्ष-इंदौर प्रेस क्लब                                                              संपादक-प्रेस क्लब टाइम्स


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