दीपक चौरसिया बोले- पुण्य प्रसून ज्वाइन करेंगे, लेकिन पुण्य ने चुप्पी साधी

(कानाफूसी) : दीपक चौरसिया ने एक रिकार्डेड बातचीत में घोषणा कर दी है कि वे न्यूजएक्स ग्रुप में इडिटर इन चीफ होंगे और उनके साथ पुण्य प्रसून बाजपेयी समेत कई सीनियर बंदे ज्वाइन कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि न्यूजएक्स ग्रुप के कई हिंदी चैनल चल रहे हैं, जिसे रीलांच किया जाएगा. उन्होंने ये भी जानकारी दी कि आजतक में आउटपुट पर लंबे समय तक काम कर चुके दो सीनियर लोग भी उनके साथ जुड़ रहे हैं.

पुण्य प्रसून बाजपेयी की ज्वायनिंग की खुद घोषणा दीपक चौरसिया ने कर दी पर पुण्य प्रसून खुद इस पर चुप हैं. उनसे जब भड़ास4मीडिया ने बात की और सूचित किया कि दीपक चौरसिया ने आपके इंडिया न्यूज ज्वाइन करने की घोषणा कर दी है, तो अब इसे सच मान लिया जाए कि आप इंडिया न्यूज ज्वाइन करेंगे? इस पर पुण्य बोले- 'लेकिन मैं तो पुष्टि नहीं कर रहा.' 

सवाल अब लाख टके का हो गया है कि क्या सचमुच पुण्य प्रसून बाजपेयी ने दीपक चौरसिया के नेतृत्व में काम करने को रजामंदी दे दी है? उन दीपक चौरसिया के नेतृत्व में जो खुलेआम कह रहे हैं कि पत्रकारिता मिशन नहीं रह गई है. क्या सचमुच पुण्य प्रसून बाजपेयी उस मीडिया हाउस के साथ अपना जुड़ाव करने जा रहे हैं जिसके मालिक कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा हैं, जो मनु शर्मा के पिता हैं? सूत्रों का कहना है कि इन सवालों का जवाब जल्द ही मिलने जा रहा है, अगले कुछ घंटों के दौरान.

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि पुण्य प्रसून ने अगर विनोद शर्मा के ग्रुप को ज्वाइन कर लिया तो वह दूसरी बड़ी गल्ती करेंगे. पहली बड़ी गल्ती उन्होंने जी न्यूज में की थी, सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया के अरेस्ट किए जाने को इमरजेंसी से जोड़कर. हालांकि उन्होंने अपनी गल्ती का एहसास होते ही लंबी छुट्टी ले ली और बाद में इस्तीफा दे दिया. पर वे अब दीपक चौरसिया और विनोद शर्मा के नेतृत्व में काम करने जा रहे हैं तो शायद दूसरी बड़ी गल्ती करने जा रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पुण्य प्रसून बाजपेयी सरोकार और मिशन वाली पत्रकारिता के प्रतीक माने जाते हैं.

पुण्य प्रसून का जो दर्शकवर्ग, पाठकवर्ग है, वह उनसे हर मुद्दे पर बेबाकी की अपेक्षा करता है. पुण्य प्रसून बाजपेयी ब्लाग और अखबारों के जरिए भी अपनी बात कहते लिखते रहते हैं. उन्हें समकालीन मुख्यधारा पत्रकारिता के सबसे तेजस्वी और सरोकारी पत्रकारों में से एक माना जाता है. विनोद शर्मा और दीपक चौरसिया जैसे लोग तो चाहेंगे ही कि उनके साथ पुण्य जुड़ें क्योंकि इससे उनके न्यूज चैनलों की विश्वसनीयता बढ़ेगी, पर इस जुड़ाव से पुण्य की विश्वसनीयता कितनी घटेगी, इसका सही सही अंदाजा कर पाना मुश्किल है.

उधर, कुछ लोगों का कहना है कि टीवी जर्नलिस्टों के लिए बड़ा संकट 'माध्यम' का होता है. अगर उनके पास कोई टीवी चैनल नहीं है तो वे अपने आप में खुद को अकेला, बेचारा और ताकतहीन पाते हैं. इसलिए दीपक चौरसिया हों या राणा यशवंत हों या कोई अन्य टीवी पत्रकार व टीवी संपादक, इन्हें हर हाल में एक बुरा या अच्छा मालिक और उसका एक टीवी माध्यम चाहिए ताकि ये टीवी के जरिए जनता को दिखें और उसके जरिए जिंदा रहें. पर पुण्य प्रसून भी अगर इसी सोच के शिकार हो गए हैं, तो गलत है.

पुण्य के पास खुद में एक मीडिया हाउस जितनी ताकत है, बस उसे प्लान और नियोजित करने की जरूरत है. दरअसल कोई भी मीडिया हाउस जनता के भरोसे और विश्वास से बड़ा या छोटा होता है. अक्सर देखा गया है कि चिटफंडियों का चैनल कभी बड़ा नहीं बन पाता क्योंकि वहां क्या क्या नहीं दिखाना है, यह सब पहले से तय होता है. वहां कार्यरत नेतृत्व पत्रकारीय सरोकार की जगह लायजनिंग से उर्जा पाता है. ऐसे में वे चैनल बहुत ज्यादा पैसा खर्च करके भी एवरेज से नीचे रहते हैं.

कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा, जो हत्या में जेल काट रहे मनु शर्मा के पिता हैं, के चैनल की पाबंदियों-सीमाओं को समझा जा सकता है.  एक बड़ा कांग्रेसी नेता, जो बड़ा कारोबारी भी है, के नेतृत्व में काम करना कितना मुश्किल हो सकता है, इसे उस उदाहरण के जरिए जाना जा सकता है जिसमें उनके अखबार आज समाज के एक संपादक की नौकरी इसलिए चली गई क्योंकि उन्होंने रुटीन की कांग्रेस विरोधी खबर को उतने ही तवज्जो के साथ प्रकाशित किया जितना उस दिन अन्य अखबारों ने किया. विनोद शर्मा के साथ काम करने में दीपक चौरसिया को कोई दिक्कत नहीं हो सकती क्योंकि दीपक पत्रकारिता को खुलेआम तौर पर मिशन नहीं मानते बल्कि इसे बाजारू डिमांड और सप्लाई का गेम मानते हैं.

दीपक चौरसिया की छवि भी बाजारू पत्रकार की रही है जो गुणवत्ता की जगह टीआरपी देने को सबसे बड़ा सच मानते हैं. पर इसी के खिलाफ पुण्य प्रसून बाजपेयी गुणवत्ता के जरिए टीआरपी देकर दीपक चौरसिया के मिथ को ध्वस्त करते दिखते हैं. ऐसे में अगर कभी दीपक के नेतृत्व में और विनोद शर्मा के नेतृत्व में पुण्य को काम करने की मजबूरी हुई तो इससे न सिर्फ साफ सुथरी पत्रकारिता करने वालों को बुरा लगेगा बल्कि यह सच साबित होगा कि टीवी पत्रकार चाहे जितना बड़ा सरोकारी हो, अंततः उसे बुरी पूंजी, बुरे आदमी, बुरे बाजार के आगे सरेंडर करना पड़ता है.

देखना है कि पुण्य किस करवट जाते हैं.

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