दूसरों की धोती खोलने की स्पर्धा हमें कहीं नहीं ले जानेवाली?

: बीते दिनों की बातें : जिस समाज में यह तलाशा गया कि किस तरह का अन्न आप खाते हैं? उसका स्त्रोत पवित्र है या अपवित्र? खुद आपके श्रम से उपार्जित है, ईमानदारी से है, आपकी कमाई से आया अन्न है या बगैर परिश्रम, दान-मुफ्त में मिला अन्न है, जहां जीवन में यह मापदंड था, उस समाज में कितनी गहराई रही होगी? : लोग पूछते हैं कि, आपका तर्क है कि राजनीति ही बदलाव का स्त्रोत है, तो वह कौन-सी और कैसी राजनीति है? यानी कैसी राजनीति देश, समाज, सभ्यता और संस्कृति को झकझोर सकती है? एक नये मानव समाज की बुनियाद रख सकती है.

उस राजनीति की कसौटी गांधी ने तय की थी. गांधी का सीधा-सरल फार्मूला था, सार्वजनिक जीवन में साधन और साध्य की एकता का. पवित्र साधन से ही श्रेष्ठ साध्य पाये जा सकते हैं. कर्म और वचन के बीच एका से ही राजनेता विश्वसनीय बनते हैं. आज राजनीति को अपनी साख लौटानी है, तो उसे इसी राह पर लौटना होगा. हाल में कोलकाता यात्रा के दौरान श्रद्धेय कृष्णबिहारी जी ने सार्वजनिक जीवन के दो प्रसंग सुनाये. डाक्यूमेंटेड चीजें. ज्ञान, सादगी, विद्वता, विनम्रता की प्रतिमूर्ति कृष्णबिहारी जी खांटी गांधीवादी हैं. उनके सुनाये दोनों तथ्यात्मक प्रसंग मन को छू गये.

1946 की घटना है. गांधी नोआखाली में थे. उनका रोज का काम था, दंगा प्रभावित इलाकों या गांवों में जाना. तब उनके सचिव थे, मशहूर गांधीवादी और एंथ्रोपालाजिस्ट, निर्मल बोस. वह भी साथ थे. निर्मल बोस की बड़ी चर्चित किताब भी है, उसी यात्रा के संदर्भ में, गांधी के साथ मेरे दिन (माइ डेज विद गांधी). एक दिन किसी गांव में मीटिंग थी. गांधी जी किसी कस्बानुमा जगह में ठहरे थे. शाम को उन्हें एक प्रभावित गांव में जाकर सभा में शिरकत करनी थी. प्रार्थना सभा में भाग लेना था.

एक रोज वह निर्मल बोस के साथ उक्त प्रभावित गांव के रास्ते में थे. नाव में सवार होकर जा रहे थे. कुछ दूरी तय करने के बाद वह नाव में ही अचेत हो गये. निर्मल बोस ने व्यावहारिक विवेक से काम लिया. मल्लाह से कहा, वापस लौटो. जहां से हम चले थे. यानी गांधी जी जहां ठहरे थे, वह लौटती यात्रा शुरू हो गयी. नाव कुछ दूर पीछे लौटी होगी कि गांधी जी को होश आया. उन्होंने सहज भाव से निर्मल बोस से पूछा, कितनी दूर और जाना है? हम समय से पहुंचेंगे न? (याद रखिए गांधी जी सेकेंड में समय का हिसाब रखते थे और समय के अत्यंत पाबंद इंसान थे) निर्मल बाबू ने कहा, बापू आपकी तबीयत ठीक नहीं है. इसलिए जहां से चले थे, वही वापस लौट रहे हैं.

बापू की ढृढ़ आवाज गूंजी. निर्मल! तुम इतने दिनों से मेरे साथ हो, पर मुझे समझ नहीं सके. मैं मर भी जाऊं, तो मेरी डेड बाडी (शव) उस जगह पहुंचनी चाहिए. नियत समय पर ही, ताकि लोगों का गांधी पर भरोसा रहे कि गांधी झूठ नहीं बोलता. इस एक वाक्य की कसौटी पर आज पूरी राजनीति और राजनेताओं को परख-तौल लीजिए. फिर इस राजनीति के प्रति उपजी अनास्था को समझिए. गांधी युग की अन्य बातों को दरकिनार भी कर दें, तो इस एक कसौटी ने एक नयी राजनीतिक संस्कृति दी. गांधी रूपवान नहीं थे, न ही वे सबसे अच्छे वक्ता थे. न ही सबसे होनहार छात्र थे, न सबसे अमीर थे, न राजा थे, तब उनमें क्या था कि उस निहत्थे इंसान की पहल से दुनिया में कभी अस्त नहीं होने वाला ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज अस्त हो गया? वह था, चरित्र!

आज हमारे सार्वजनिक जीवन की प्रतिस्पर्धा कहां है? हर कोई एक दूसरे को चरित्रहीन (यौन मामलों के संदर्भ में नहीं) सिद्ध करने पर तुला है. ओछेपन की प्रतियोगिता है. झूठ, छल, प्रपंच में आपसी होड़ है. क्या हममें साहस है कि एक समूह या समाज के तौर पर हम कबूलें कि हमारे पूरे देश-समाज के सार्वजनिक जीवन में यह कमी है. और हम मिल कर यह अवगुण दूर करेंगे. कोइ थोड़ा अधिक, कोई थोड़ा कम बुरा हो सकता है, पर बुराई या अवगुण से कितने लोग मुक्त हैं? खासतौर से जो वर्ग रहनुमाई करता है, जिसके चरित्र का दूसरों पर असर पड़ता है, वह कैसा है? वह खुद को जांचे. देश के सार्वजनिक जीवन में हम उस मुकाम पर पहुंच गये हैं कि अब आलोचना या भंडाफोड़ या दूसरों की धोती खोलने की स्पर्धा हमें कहीं नहीं ले जानेवाली? न परनिंदा-परचर्चा से इस देश की मुक्ति होनेवाली है?

पूर्व राष्ट्रपति कलाम ने सही कहा है कि महज लोकायुक्त बन जाने से भारत में मूल्य वापस नहीं होनेवाले या भ्रष्टाचार खत्म नहीं होनेवाला. जेलें भर जायेंगी, फिर भी भ्रष्टाचारी बाहर रहेंगे. इसलिए कलाम का सुझाव है कि घरों से और स्कूलों से नयी शुरुआत हो, मूल्यों की वापसी के लिए. घर और स्कूल से तो शुरुआत हो ही, पर राजनीति में कुछ लोग निकलें, जो कहें कि देश गढ़ना हमारा मकसद है, सत्ता पाना नहीं. इस देश को किन लोगों ने गढ़ा? उनके मूल्य क्या थे, यह भी लोगों को बताये? श्रद्धेय कृष्णबिहारी जी ने दूसरा प्रसंग सुनाया. पंडित मदन मोहन मालवीय जी का.

मदन मोहन मालवीय जी के भोजन के लिए ‘दानवीर’ कहे जानेवाले शिवप्रसाद गुप्त जी के यहां से अन्न आता था. आजादी की लड़ाई में गुप्त जी और उनके परिवार का अद्भुत योगदान है. मालवीय जी बनारस में जहां रहते थे, वहां उनकी रसोई अलग बनती थी. साथ में परिवार के जो लोग थे, उनका भोजन अलग रसोई में बनता था. एक ही छत में संयुक्त परिवार के दो रसोई घर. एक दिन की घटना है कि मालवीय जी के एक पौत्र की परीक्षा थी. उसे समय से जाना था. घर की रसोई में खाना तैयार नहीं था. मालवीय जी की रसोई में खाना बन गया था. मालवीय जी के महाराज (कुक) ने जब देखा कि मालवीय जी का पौत्र बिना खाये परीक्षा देने जा रहा है, तो उसने कहा, बचवा, बाबू (मालवीय) जी का भोजन तैयार है. आओ, इसी में से खिला दें.

मालवीय जी बगल में ही थे, उन्होंने यह बात सुन ली. बुला कर अपने पौत्र से कहा कि जहां तुम्हारा परीक्षा केंद्र है, वहां फल-मिठाई मिलते हैं. फिर पास से कुछ पैसे दिये और कहा, जाओ वहीं खा लेना. परीक्षा केंद्र के आस-पास कुछ खास मिला नहीं. पौत्र भूख से पटपटा रहा था. परीक्षा केंद्र से घर लौटा, तो सूचना मिली कि मालवीय जी आज भूखे हैं. खाना नहीं खाया है, अपने पौत्र का इंतजार कर रहे हैं.

उनका पौत्र जैसे ही परीक्षा केंद्र से लौट कर घर में घुसा, महाराज ने कहा, जल्दी हाथ-पांव धो लो. बाबू (मालवीय जी) भूखे बैठे हैं. फिर दोनों साथ खाना खाने बैठे. मालवीय जी का खाना उनकी रसोई से आया और उनके पौत्र का खाना उनके घर के लोगों के लिए तय रसोई से आया. जब दोनों खाने बैठे, तब पौत्र ने पूछा, दादाजी आपने भोजन क्यों नहीं किया? महामना ने कहा, तुमको बिना खाये भेजा, तो खुद कैसे खा लेता? फिर पौत्र ने कहा, एक दिन मैं आपकी ही रसोई में बना खाना खा लेता, तो मैं भी भूखा न रहता और आप भी अब तक भूखे नहीं रहते.

तब मालवीय जी ने जवाब दिया. वह अद्भुत है, अतुलनीय है, पूरी आजादी की लड़ाई का चरित्र, सत्व, संस्कृति और मर्म समझने में मदद करता है. किस चरित्र ने इस गुलाम और सोये देश को जगाया, वह चरित्र पता चलता है. मालवीय जी ने कहा, मेरा भोजन बाबू शिवप्रसाद गुप्त के घर से आये अन्न से बनता है. इसे वह दान स्वरूप भेजते हैं. मैंने देश की थोड़ी सेवा की है, इसलिए मुझे दान का यह अन्न पच जायेगा. मेरे परिवार के लोगों ने देश की सेवा नहीं की है, इसलिए उनके लिए दान का यह अन्न क्षतिकर सिद्ध होगा. और कौन संवेदनशील व्यक्ति होगा, जो अपने परिवार की क्षति चाहेगा?

दान में आये अन्न के प्रति जहां यह सजगता थी. जहां नैतिक स्तर का यह मापदंड था, वह मुल्क अब कहां है? यह तो खुद से पूछने का प्रसंग है. मालवीय जी की यह बात सुन कर महाभारत का एक प्रसंग याद आया. भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर थे. हर शाम उनका प्रवचन होता था. कौरव-पांडव दोनों पक्ष के लोग उसमें रहते थे. द्रौपदी नहीं जाती थीं. एक दिन कृष्ण ने कहा, द्रौपदी, तुम भी चलो. पितामह का अद्भुत प्रवचन होता है. वह हिचकिचायीं, पर कृष्ण की बात थी, इसलिए वह गयीं.

उस दिन भीष्म पितामह, न्याय-अन्याय, वचन, कर्म और पौरुष वगैरह के बारे में बोल रहे थे. द्रौपदी बीच में ही बोल पड़ीं. सब हक-बक. क्योंकि पितामह की सभा में कोई बोलता नहीं था. द्रौपदी ने कहा, पितामह, एक सवाल पूछना चाहती हूं. सारी सभा सन्न. पता नहीं, द्रौपदी क्या पूछ बैठें? द्रौपदी ने कहा, पितामह, आज आप कह रहे हैं कि जो पुरुष न्याय-अन्याय के समय मौन रहता है, बोलता नहीं है, हस्तक्षेप नहीं करता, उसके पौरुष-तेज का क्षय होता है. पर मेरा जब चीरहरण हो रहा था, तो कौरव सभा में आप क्यों मौन रह गये?

पितामह ने बड़े धैर्य से कहा, बेटी उन दिनों मेरे पेट में पाप का अन्न था. इसलिए मेरी बुद्धि भी विचलित थी. भटक गयी थी. मैं कौरव पक्ष का अन्न खाता था. कौरवों का पक्ष अन्याय के साथ था. इसलिए मेरी बुद्धि भटक गयी थी. पितामह के इस जवाब के बाद द्रौपदी ने माना, पितामह आप सचमुच महान हैं. बेलौस होकर खुद का निर्मम विवेचन करनेवाले विरले होते हैं. जिस समाज में यह तलाशा गया कि किस तरह का अन्न आप खाते हैं? उसका स्त्रोत पवित्र है या अपवित्र? खुद आपके श्रम से उपार्जित है, ईमानदारी से है, आपकी कमाई से आया अन्न है या बगैर परिश्रम, दान-मुफ्त में मिला अन्न है, जहां जीवन में यह मापदंड था, उस समाज में कितनी गहराई रही होगी?

आज अगर ऐसे सवालों पर चर्चा हो, तो हमारे प्रगतिशील राजनीतिज्ञ इन प्रश्नों को पोंगापंथी कहेंगे. कुछ लोग इन्हें छद्म सेक्यूलरिज्म या सामंतवाद की परिभाषा पर तौलेंगे. कुछ आधुनिकता और परंपरावादी दृष्टि से परखेंगे. पर क्या हम यह एहसास करने को तैयार हैं कि एक देश-समाज के रूप में हम कहां पहुंच गये हैं? कहां खड़े हैं? हमारा स्वउद्यम क्या है? क्या हम सिर्फ सरकार के भरोसे समाज बना सकते हैं या खुद भी कुछ पहल कर सकते हैं? हमारे समाज में पश्चिम जैसा सृजन क्यों नहीं है? क्यों महज नकारात्मक चीजों से ही हमलोग प्रेरित और संचालित हैं? दूसरे अच्छा करते हैं, तो हम उनका मनोबल बढ़ाने के बजाय टांग क्यों खींचते हैं? क्यों ईष्र्या, जलन, द्वेष के हम शिकार हैं? किसी के बारे में कुछ भी कह देना, तथ्यहीन बातें करना, यह अगंभीरता या नकारात्मक मानस क्यों है?

पश्चिम का हाल का उदाहरण है. टाइटेनिक जहाज के डूबने के सौ साल हो रहे हैं. उस अवसर पर स्वउद्यम से लोगों ने लगभग दो सौ से अधिक किताबें लिखी हैं. उस घटना की तह में जाने के लिए. उस वक्त की परिस्थिति-मौसम की एक -एक बात जानने के लिए. जापान में सूनामी आयी, तो अब वहां के वैज्ञानिक समुद्र के सबसे निचले तल पर जा रहे हैं. यह पता करने के लिए कि सूनामी आयी ही क्यों? यह भूख, यह बेचैनी, यह जिद या यह संकल्प या यह उद्यम, आज भारत की सबसे बड़ी जरूरत है. यह शिष्टता-संयम या आचरण राजनीति तक ही नहीं था. जीवन के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में एक अनुशासन-मर्यादा थी.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. यह खबर प्रभात खबर में छप चुका है वहीं से साभार लिया गया है.

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