देश पर हावी है यूपी की राजनीति, पता नहीं किस करवट बैठेगा ऊंट

देश में सबसे बड़े राज्य का दर्जा उत्तर प्रदेश को प्राप्त है। पूरे प्रदेश में अब 75 जिले बन चुके हैं। जिसमें 403 सीटों पर चुनाव होना है। सबसे बड़ा प्रदेश होने के कारण यहां की राजनीति से पूरे देश पर फर्क पड़ता है। राजनीतिक पार्टियों से लेकर आम आदमी की नजर भी चुनावी हलचल पर टिकी हुई है। इस चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने दांव-पेंच लड़ाने में लगी है। पर राजनीतिक पतंगबाजी में किसकी पतंग कटेगी और किसी पतंग कटेगी यह हर किसी के लिए सवाल बना हुआ है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव कई मायनों में अहम हैं। नेता भी अपना सबकुछ दांव पर लगाकर चुनावी मैदान में कुद गए हैं। प्रदेश की विधान सभा में बहुमत से आनी वाली सरकार केंद्र पर भी प्रभावी होती है। यह बात हर बड़े नेता की नजर में है। इसीलिए राजनीतिक रूप से उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव अहम और संवेदनशील है। यहां कामयाब होने वाली पार्टी का दबदबा देश की राजनीति पर पड़ता है और केंद्र में मजबूत दावेदारी भी रखता है। यही वजह है कि चुनाव भले यूपी में हो रहा है, निगाह पूरे देश की टिकी हैं। प्रदेश में चुनावी हलचल के चलते छोटी मोटी पार्टियों ने बसपा, सपा, भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों की हवा खराब कर रखी है।

चुनावी उद्घोष होते ही चुनाव आयोग ने भी पूरे प्रदेश में आचार संहिता लागू कर चुनाव की सरगर्मियों को और तेज कर दिया है। अब पार्टियों को प्रचार के लिए छोटी से छोटी सभा करने के लिए अनुमति लेनी होगी। वहीं चुनाव प्रचार पर होने वाले खर्चे का ब्योरा भी देना होगा। इन सब बातों ने प्रत्याशियों के हाथ पैर और भी फुला दिए हैं। ऐसे में बड़ी पार्टियों की स्थिति जीने मरने की बन गई है। इन पार्टियों के भावी प्रत्याशियों का करियर दांव पर लगा है। इस बार तो चुनावी राजकुमारों की हालत भी खस्ता नजर आ रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजकुमार छोटे चौधरी भी आए दिन जनसभा कर जन समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं पूर्व में सपा के राजकुमार अखिलेश भी अपनी सत्ता को वापस लाने के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं। राजनीति के राजकुमार की हालत बुंदेलखंड पहुंचते- पहुंचते खराब हो गई। बुंदेलखंड की राहुल की रैली में भीड़ न जुट पाना कांग्रेस के गाल पर खरा तमाचा है।

ऐसा शायद इसलिए भी हुआ क्योंकि बुंदेलखंड लगभग तीन दसक से सूखे की मार झेल रहा है। वहीं पैकेज के नाम पर केंद्र भी चंद रुपए भेज अपना पल्ला झाड़ लेती तो दूसरी ओर वही मुट्ठी भर रुपए के लिए प्रदेश में बंदर बांट होता है। आम आदमी को इसका भी कोई लाभ नहीं मिल पाता है। पेरशान बुंदेलखंडियों ने अपने घरों को छोड़ आसपास के महानगरों में रोजगार की तलाश के लिए डेरे जमा रखे हैं। उधर पूरे के पूरे गांव खाली पड़े हैं। जमीने भी बंजर होती जा रही है। बुंदेलखंडियों को भी समझ में आ गया कि विकास के नाम पर उनके साथ हमेशा की तरह इस बार भी केवल मोहरा बनाया जा रहा है। जीतने के बाद यह प्रत्याशी उनके दर पर झांकने भी नहीं पहुंचेंगे जिसके परिणाम स्वरूप झांसी में हुई राजकुमार की महारैली पर लोग कुर्सियां गिनते नजर आए।

अब आखिर इस परिसीमन में किसको मौका दिया जाए। किसको देश के सबसे बड़े प्रदेश की कमान दी जाए जो इसका जीर्णोद्धार करे। यह प्रश्न हर आम आदमी के दिमाग में कौंध रहा है। जनता ने सभी पार्टियों को मौका दिया। निवर्तमान पार्टी से भी दलितों को खासी उम्मीदें थी, लेकिन उसने भी विकास के नाम पर करोड़ों के राजस्व को पार्कों पर कुर्बान कर दिया। इस बार विधान सभा चुनाव में जातीय मुद्दा भी लागू होता नजर नहीं आ रहा। सभी जात-बिरादरी के लोग भी समझ गए हैं कि जात-बिरादरी का नारा लगाने वाले नेता भी बिरादरी से ज्यादा अपने भले की बात सोचते हैं। वो प्रदेश के विकास से ज्यादा अपने विकास पर ध्यान देते हैं।

चुनाव में अब किसके जीतने की बारी है, अब कौन होगा जो इस प्रदेश को सबसे बड़े होने के साथ सबसे सम्पन्न होने का मुकाम हासिल कराएगा। उम्मीद के नाम पर एक भी किरण नजर नहीं आ रही है। प्रदेश में उभरती हुई पार्टियों पर नजर दौड़ाई जाए तो पीस पार्टी, जेडीयू, तृणमूल कांग्रेस जैसे कुछ विकल्प सामने आने वाले हैं, लेकिन किसी भी पार्टी के पास इतना समर्थन नहीं है कि वो बहुमत जुटाकर सम्पूर्ण सत्ता में आ सके। आंकड़े और आम जन में चल रही कानफूसी भी यही कह रही है प्रदेश में इस बार कोई भी पार्टी पूर्ण बहुमत नहीं जुटा पाएगी। परिणाम स्वरूप आने वाली सरकार गठबंध से बनेगी। गठबंधित सरकार प्रदेश के स्वरूप को किस हद तक बदल सकेगी यह तो भविष्य की गर्त में है।

लेखक जितेंद्र कुमार नामदेव मेरठ में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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